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संपादकीयः कठुआ और कानून

जम्मू क्षेत्र के कठुआ जिले में आठ साल की बच्ची के साथ दरिंदगी और फिर उसकी हत्या के मामले में दायर दो आरोपपत्रों में जो खुलासा हुआ है, वह वीभत्स और शर्मनाक है।

Author April 19, 2018 3:50 PM
ये वो जगह है जहां पर अगवा की गई बच्ची को रखा गया था। (Express Photo: Nirupama Subramanian)

जम्मू क्षेत्र के कठुआ जिले में आठ साल की बच्ची के साथ दरिंदगी और फिर उसकी हत्या के मामले में दायर दो आरोपपत्रों में जो खुलासा हुआ है, वह वीभत्स और शर्मनाक है। और भी दुखद यह है कि इस मामले को अब पूरी तरह से सांप्रदायिक और राजनीतिक रंग दे दिया गया है। हालांकि पहली नजर में ही मामला सीधा-सीधा पूर्वनियोजित अपराध का है। सबसे हैरान करने वाली बात तो यह है कि इस पूरी घटना को अंजाम देने में पुलिस न केवल अपराधियों के साथ मिली रही, बल्कि आपराधिक कृत्य में भी भागीदार बनी। घटना इस साल दस जनवरी की है जब बक्करवाल समुदाय की आठ साल की एक लड़की को कुछ लोगों ने अगवा कर एक मंदिर में छिपा लिया था और वहां उसके साथ कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। इसके बाद उसकी हत्या कर दी गई; शव को जंगल में फेंक दिया गया और उसके सिर को पत्थर से कुचल दिया गया। यह सब फोरेंसिक जांच में साबित हो चुका है। आरोपपत्र में पुलिस ने कहा है कि घटना का असली साजिशकर्ता मंदिर कापुजारी था, जिसने अपने बेटे, भतीजे, पुलिस के एक एसपीओ (विशेष पुलिस अधिकारी) और उसके दोस्तों के साथ हफ्ते भर इस जघन्य अपराध को अंजाम दिया। इसके अलावा, दो पुलिसवालों ने पुजारी से घटना के सबूत करने नष्ट करने के लिए चार लाख रुपए लिए।

इस घटना ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में तूफान ला दिया है। राज्य सरकार में खेमेबंदी उजागर हो गई है। भाजपा खुल कर आरोपियों के पक्ष में उतर आई है तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने की बात कहते हुए भरोसा दिलाया है कानून अपना काम करेगा। चौंकाने वाली बात तो यह है कि आरोपियों के समर्थन में जो रैली निकाली गई और बंद रखा गया उसमें भाजपा के दो मंत्री भी शामिल हुए। घटना को अंजाम देने वाले डोगरा समुदाय के हैं और हिंदूवादी संगठनों से जुड़े हैं। कुछ वकीलों ने पुलिस को आरोपपत्र दाखिल करने से रोकने की कोशिश की। कठुआ की घटना जमीन विवाद को लेकर बताई जा रही है जिसे पुजारी खाली कराना चाहता था। इसीलिए उसने इस पूरी वारदात को अंजाम दिया। बक्करवाल मुसलिम समुदाय की अनुसूचित जनजाति है। प्रदेश की कुल मुसलिम आबादी में गुर्जर और बक्करवाल ग्यारह फीसद हैं। ये पशुपालक हैं और इनका स्थायी ठिकाना नहीं है। ये लंबे समय से केंद्रीय वनाधिकार कानून-2006 को जम्मू-कश्मीर में भी लागू करने की मांग कर रहे हैं। भाजपा को लग रहा है कि अगर यह कानून लागू हो गया और गुर्जर-बक्करवाल समुदाय को जंगल की जमीन का हक देना पड़ गया तो इससे जम्मू क्षेत्र में ‘हिंदू समुदाय खतरे में पड़ जाएगा’। जबकि पीडीपी खेमा इन जनजातियों के साथ है।
कठुआ कांड दहला देने वाला है। आरोपियों के बचाव में जिस तरह से भाजपा के मंत्री तक उतर आए, उससे साफ है कि भाजपा हिंदू-मुसलिम का खेल खेलने के लिए किस हद तक जा सकती है। कुछ वकीलों का आरोपियों के पक्ष में उतरना भी चिंताजनक है। इस कांड को लेकर जिस तरह की प्रतिक्रियाएं हो रही हैं उससे प्रदेश की राजनीति में सांप्रदायिकता को ही बढ़ावा मिलेगा। ऐसे में, मुख्यमंत्री कैसे इन हालात से निपटती हैं और पीड़ित पक्ष को न्याय सुनिश्चित करा पाती हैं, यह बड़ी चुनौती तो है ही!

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