ताज़ा खबर
 

संपादकीयः अनिश्चितता के बीच

कमल हासन के राजनीतिक दल बनाने की घोषणा पर शायद ही किसी को हैरत हुई हो, क्योंकि राजनीति में आने का इरादा वे पिछले साल ही जता चुके थे।

Author Published on: February 23, 2018 4:33 AM
कमल हासन ने लॉन्च की नई पार्टी

कमल हासन के राजनीतिक दल बनाने की घोषणा पर शायद ही किसी को हैरत हुई हो, क्योंकि राजनीति में आने का इरादा वे पिछले साल ही जता चुके थे। पर यह खासकर तमिलनाडु की राजनीति की एक बहुत अहम घटना है। बुधवार को उन्होंने अपनी पार्टी का नाम घोषित कर दिया- मक्कल नीति मय्यम। इसका अर्थ होता है, जन न्याय केंद्र। यही नहीं, उन्होंने अलग से यह कहना भी जरूरी समझा कि उनकी पार्टी जन-असंतोष से जनमी है। पार्टी की राजनीतिक दिशा या विचारधारा को लेकर उन्होंने संकेतों और सूत्रों में कुछ और बातें भी कहीं। जहां द्रविड़ विचारधारा या आंदोलन को अपनी बुनियाद बताया, वहीं दक्षिणपंथी राजनीति पर एतराज भी जताया। उन्होंने कहा कि तिरंगे के तीन रंगों में केवल एक रंग भगवा है, जबकि उसे पूरे झंडे पर फैलाने की कोशिश हो रही है। इस तरह इसमें कोई संदेह नहीं रह जाता कि यह सब भाजपा को नागवार गुजरेगा। पर मक्कल नीति मय्यम का गठन अन्नाद्रमुक और द्रमुक को भी शायद ही रास आएगा, क्योंकि दोनों पार्टियां नहीं चाहेंगी कि द्रविड़ विरासत पर कोई और दावा ठोंके। अलबत्ता आपसी मुकाबले में कमजोर पड़ने पर दोनों में से कोई भी पार्टी कमल हासन की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ा सकती है। पर यह तो बाद की बात है। अभी सवाल यह है कि कमल हासन के आने से तमिल राजनीति पर क्या असर पड़ेगा।

तमिलनाडु एक ऐसा राज्य है जिसकी सियासत को सिनेमा के सितारों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है। एमजी रामचंद्रन, जयललिता और करुणानिधि फिल्मी दुनिया से आए थे। इस इतिहास को देखते हुए स्वाभाविक ही कमल हासन की नई भूमिका को लेकर लोगों में काफी उत्सुकता और दिलचस्पी है। सितंबर 2005 में भी ऐसा ही मंजर था, जब सिनेमा की दुनिया से आकर विजयकांत ने अपनी नई भूमिका शुरू की थी। वे भी लोकप्रिय थे और उनकी पार्टी एमडीएमके का थोड़ा-बहुत जनाधार भी बन गया, पर जयललिता और करुणानिधि का विकल्प बनने की उनकी हसरत पूरी नहीं हो पाई। कमल हासन ने ऐसे वक्त राजनीति में कदम रखा है जब जयललिता इस दुनिया में नहीं हैं और अन्नाद्रमुक अनिश्चितताओं से घिरी हुई और धड़ों में बंटी हुई है। दूसरी तरफ, लगातार दो चुनाव हारने और वयोवृद्ध करुणानिधि की निष्क्रियता से द्रमुक की भी हालत खस्ता है। रही-सही कसर आरके नगर के उपचुनाव ने दोनों पार्टियों को आईना दिखा कर पूरी कर दी। इस तरह, कोई लोकप्रिय शख्सियत तमिलनाडु की राजनीति में कदम रखे, पृष्ठभूमि इसके एकदम अनुकूल है। पर सुपरस्टार कहे जाने वाले रजनीकांत भी राजनीति में आने का अपना इरादा औपचारिक रूप से घोषित कर चुके हैं। उन्होंने अपना राजनीतिक रुझान उस तरह से अभी तक साफ तौर पर जाहिर नहीं किया है, जिस तरह से कमल हासन कर चुके हैं।

केवल एक अनुमान है कि भाजपा को रजनीकांत रास आ सकते हैं। लेकिन रजनीकांत ने थोड़ा-बहुत दक्षिणपंथी झुकाव दिखाया, पर भाजपा से हाथ नहीं मिलाया, तो चुनाव में भाजपा को लाभ होगा या नुकसान? वैसी सूरत में भाजपा को रजनीकांत मित्र नजर आएंगे, या खतरा? बहरहाल, इस तरह के सारे सवाल यही बताते हैं कि दशकों से दो ध्रुवों में बंटी रही तमिलनाडु की राजनीति अभी पूरी तरह अनिश्चितता के दौर से गुजर रही है। यह भी निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि विधानसभा चुनाव तय समय पर ही यानी 2022 में होंगे, क्योंकि सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक भीतर ही भीतर विभाजित है। फिलहाल निश्चित तौर पर यही कहा जा सकता है कि नए समीकरण बनेंगे, दलों को लेकर भी, और उनके सामाजिक जनाधार को लेकर भी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

Next Stories
1 संपादकीयः निवेश की आस