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संपादकीयः महंगाई की मार

अर्थव्यवस्था के गुलाबी सपने दिखाती आ रही और विकास दर को आठ फीसद तक पहुंचाने का उत्साह पाले केंद्र सरकार के लिए महंगाई और औद्योगिक विकास दर के ताजा आंकड़े निस्संदेह झटका देने वाले हैं।

Author December 14, 2017 02:45 am
फाइल फोटो

अर्थव्यवस्था के गुलाबी सपने दिखाती आ रही और विकास दर को आठ फीसद तक पहुंचाने का उत्साह पाले केंद्र सरकार के लिए महंगाई और औद्योगिक विकास दर के ताजा आंकड़े निस्संदेह झटका देने वाले हैं। अक्तूबर-नवंबर जैसे मौसम में, जब साग-सब्जी की पैदावार बाजार में बहुतायत में उपलब्ध रहती है, इनकी कीमतों में बाईस फीसद से ऊपर उछाल दर्ज किया गया। पिछले महीने उपभोक्ता वस्तुओं के थोक सूचकांक में एक फीसद की बढ़ोतरी का आंकड़ा दर्ज हुआ था। अब अंडे, सब्जियां, र्इंधन जैसी खुदरा वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से महंगाई की दर 4.88 प्रतिशत तक पहुंच गई है। यह पिछले पंद्रह महीनों में सबसे ऊंचा स्तर है। एक साल पहले यह दर 3.63 थी। दावा किया जा रहा था कि जीएसटी लागू होने के बाद उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतों में कमी आएगी, मगर यह आकलन गलत साबित हो रहा है। खाने-पीने की वस्तुओं की कीमतों में अप्रैल के बाद काफी बढ़ोतरी हुई है। सब्जियों पर जीएसटी नहीं लागू है, पर मसालों पर है। इसलिए भी लहसुन, धनिया जैसी कई वस्तुओं को सब्जी के बजाय मसाला मान कर जीएसटी के दायरे में रख दिया गया है। हालांकि इस भ्रम की वजह से सभी सब्जियों के दाम बढ़ने का दावा नहीं किया जा सकता। इसकी दूसरी वजहें साफ हैं।

जिन खुदरा वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी दर्ज की गई है, उनमें दरअसल उत्पादन और ढुलाई की लागत बढ़ गई है, जिसका सीधा असर उनकी खुदरा कीमतों पर पड़ी है। जिस समय सरकार महंगाई की दर नीचे खिसकने के दावे कर रही थी, उस वक्त भी बाजार में खुदरा उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें काफी बढ़ी हुई थीं। मगर चूंकि सरकार कीमतों का आकलन अब उपभोक्ता सूचकांक के बजाय थोक खरीद के आधार पर करने लगी है, इसलिए हकीकत सामने नहीं आ पाती। दालों के मूल्य जरूर कम होने शुरू हो गए हैं, पर इसकी वजह फसल की आवक बढ़ना भी है। हर चीज पर जीएसटी लागू होने से किसानों को फसलों के उत्पादन पर पहले से अधिक खर्च करना पड़ रहा है। हकीकत यह भी है कि कृषि क्षेत्र को अतार्किक जीएसटी दरों की मार अधिक सहनी पड़ रही है। इसके अलावा लगातार डीजल और पेट्रोल की कीमतें बढ़ती रहने का नतीजा यह हुआ कि माल ढुलाई पर खर्च बढ़ गया। इसका असर यह हुआ कि साग-सब्जी, अंडे वगैरह की कीमत बाजार तक पहुंचते-पहुंचते पहले की अपेक्षा कई गुना बढ़ गई। इसी तरह रसोई गैस की कीमत लगातार बढ़ने से आम आदमी की जेब पर बुरा असर पड़ा।

इसके बरक्स औद्योगिक उत्पादन में वृद्धि दर लगातार नीचे का रुख किए हुए है। विनिर्माण क्षेत्र में सुधार नहीं हो पा रहा। भवन निर्माण के क्षेत्र में रफ्तार धीमी होने की वजह से इससे जुड़ी सामग्री का उत्पादन रेंगता हुआ हो पा रहा है। नोटबंदी के चलते लाखों लोगों को रोजगार से हाथ धोना पड़ा, तो जीएसटी लागू होने के बाद बहुत सारे छोटे और मंझोले कारोबारी दूसरे रास्ते तलाशने पर विवश हुए। ऐसे में जब एक तरफ लोगों की कमाई के स्रोत सूख रहे हैं, उत्पादन दर धीमी पड़ी हुई है, वस्तुओं की कीमतों में बढ़ोतरी लोगों पर दोहरी मार की तरह पड़ रही है। सरकार के पास इस समस्या से पार पाने का कोई उपाय फिलहाल नजर नहीं आ रहा। महंगाई पर काबू पाने के लिए अगर व्यावहारिक कदम नहीं उठाए गए, तो सरकार की मुश्किलें और बढ़ेंगी

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