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संपादकीयः संकट का जेट

जेट एअरवेज को संकट से निकालने के लिए भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाला बैंकों का समूह अगर मदद का कोई पैकेज देता है तब भी इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि कंपनी फिर से खड़ी हो पाएगी। ऐसी फौरी मदद कोई स्थायी समाधान नहीं सुझाती।

Author April 16, 2019 2:42 AM
सही मायनों में कहा जाए तो जेट एअरवेज फिलहाल एकदम कंगाली की हालत में है। ताजा हालात बता रहे हैं कि कंपनी के पास तीन-चार दिन के परिचालन के लिए ही पैसा बचा है।

जेट एअरवेज को संकट से निकालने के लिए भारतीय स्टेट बैंक के नेतृत्व वाला बैंकों का समूह अगर मदद का कोई पैकेज देता है तब भी इस बात की उम्मीद बहुत कम है कि कंपनी फिर से खड़ी हो पाएगी। ऐसी फौरी मदद कोई स्थायी समाधान नहीं सुझाती। जेट एअरवेज का यह संकट कोई अचानक नहीं खड़ा हुआ है, पिछले कई महीनों से कंपनी की ऐसी ही डांवाडोल स्थिति बनी हुई है। जेट के संकट की गंभीरता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि शनिवार को प्रधानमंत्री कार्यालय को आपात बैठक बुलानी पड़ गई। कंपनी के ज्यादातर विमान खड़े हैं और घरेलू के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द हो गई हैं। ऐसे में सबसे ज्यादा मुश्किल में यात्री हैं। हालत यह है कि शनिवार को केवल ग्यारह विमान परिचालन में थे। कंपनी न तो कोई वैकल्पिक सेवा मुहैया करवा रही है, न लोगों के पैसे लौटा रही है। ऐसे यात्रियों की संख्या काफी ज्यादा है, जिन्होंने कंपनी के विशेष पैकेज के तहत कई महीने पहले बुकिंग करा ली थी। लेकिन अब इन लोगों का पैसा नहीं लौटाया जा रहा। टिकट रद्द करने वाले यात्रियों के करीब साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए कंपनी को लौटाने हैं। जेट के यात्रियों की मदद के मामले में दूसरी विमानन कंपनियों ने हाथ खड़े कर दिए हैं।

सही मायनों में कहा जाए तो जेट एअरवेज फिलहाल एकदम कंगाली की हालत में है। ताजा हालात बता रहे हैं कि कंपनी के पास तीन-चार दिन के परिचालन के लिए ही पैसा बचा है। ऐसे में कौन मदद के लिए आगे आएगा? जेट का संकट पिछले महीने उस वक्त सार्वजनिक हुआ था जब इसके पायलटों और इंजीनियरों ने वेतन नहीं मिलने के विरोध में हड़ताल की धमकी दे डाली थी। पिछले तीन महीने से पायलटों को वेतन नहीं मिल रहा। अब ज्यादातर पायलट दूसरी विमानन कंपनियों में नौकरी तलाश रहे हैं। हालत यह है कि दूसरी कंपनियां आधे वेतन में काम पर रखने का प्रस्ताव दे रही हैं। जेट एअरवेज पर करीब साढ़े आठ हजार करोड़ रुपए का कर्ज है। कंपनी कई महीनों से नगदी संकट से जूझ रही है। जेट ने जिन कंपनियों से विमान किराए पर लिए हुए हैं उन्हें भी पैसा नहीं चुकाया गया है। इसलिए ज्यादातर विमान खड़े करने पड़ गए। हाल में एम्सटर्डम में जेट के एक विमान को इसलिए रोक लिया गया था कि उसका किराया नहीं चुकाया गया था। ऐसे में कंपनी को किसी भी तरह का पैकेज देना किसी जोखिम से कम नहीं है।

जेट एअरवेज जैसी कंपनियों का संकट हमारे विमानन उद्योग की अदूरदर्शिता और असफलता को बताने के लिए काफी है। भारत की एक भी विमानन कंपनी ऐसी नहीं है जो मुनाफा कमा रही हो, जिसने संकट का रोना नहीं रोया हो, कर्ज के जाल में नहीं फंसी हो। एअर इंडिया जैसी सरकारी कंपनी पचास हजार करोड़ के कर्ज में डूबी है। यह हालत तब है जब भारत में हवाई यात्रा करने वालों की तादाद तेजी से बढ़ रही है, विमानन क्षेत्र को नई उंचाइयां देने के दावे किए जा रहे हैं और भारत के कई शहरों को हवाई मार्ग से जोड़ने की कवायद चल रही है। तब सवाल उठता है कि विमानन कंपनियों पर नजर रखने वाला नियामक आखिर इस संकट को भांप क्यों नहीं पाया! जितना बड़ा सवाल और भारीसंकट इन कंपनियों के भीतरी कुप्रबंधन का है, उससे कहीं ज्यादा यह उस तंत्र को भी कठघरे में खड़ा करता है जिसके कंधों पर विमानन क्षेत्र को संचालित करने की जिम्मेदारी है। लगता है हमने विजय माल्या की कंपनी किंगफिशर के प्रकरण से कोई सबक नहीं लिया है।

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