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संपादकीयः सहमति और संशय

भारत, रूस और चीन के विदेशमंत्रियों की सोमवार को नई दिल्ली में हुई बैठक सकारात्मक ही कही जाएगी।

Author December 13, 2017 3:31 AM
भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज, चीन के विदेशमंत्री वांग यी और रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव के बीच हुई बातचीत

भारत, रूस और चीन के विदेशमंत्रियों की सोमवार को नई दिल्ली में हुई बैठक सकारात्मक ही कही जाएगी। इस बैठक की सबसे बड़ी उपलब्धि यह रही कि तीनों देशों ने पहली बार आतंकवाद के खिलाफ समान दृष्टिकोण और एकजुटता का इजहार किया है। भारत की विदेशमंत्री सुषमा स्वराज, चीन के विदेशमंत्री वांग यी और रूसी विदेशमंत्री सर्गेई लावरोव के बीच हुई बातचीत में यों तो आपसी कारोबार समेत अन्य मुुद्दों पर भी चर्चा हुई, पर आतंकवाद का मुद््दा ही प्रमुख रहा। तीनों देशों ने आतंकवाद के हर स्वरूप की निंदा करते हुए मिलजुल कर इसे रोकने और इसका मुकाबला करने का प्रस्ताव पारित किया है। तीनों देशों के विदेशमंत्रियों की पंद्रहवीं बैठक के बाद जारी साझा बयान में दुनिया के दूसरे देशों का भी आह्वान किया गया है कि वे आतंकवाद के हर रूप की निंदा करें और आतंकवाद को रोकने और उसको माकूल जवाब देने की प्रतिबद्धता दोहराएं। तीनों देशों ने संयुक्त राष्ट्र में अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर समग्र संधि (सीसीआइटी) को जल्द स्वीकार करने का भी आह्वान किया, ताकि वैश्विक आतंकवाद से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानूनी ढांचा तैयार किया जा सके। सारी बातचीत के लब्बोलुआब और साझा बयान से आतंकवाद के मसले पर भारत के रुख की पुष्टि ही हुई है। पर सहमति की सतह के नीचे संशय की मौजूदगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह संशय चीन के अब तक के रवैए की वजह से है।

गौरतलब है कि चीन ने पिछले महीने के शुरू में, जैश-ए-मोहम्मद का नाम आतंकवादी संगठनों की सूची में शामिल करने की ब्रिक्स घोषणापत्र में जताई गई सहमति के कोई दो महीने बाद, जैश के सरगना मसूद अजहर को प्रतिबंधित करने के प्रस्ताव को पलीता लगा दिया था। पिछले साल से यह चौथी बार था जब मसूद अजहर का बचाव चीन ने किया। चीन के शियामेन शहर में सितंबर में हुई ब्रिक्स बैठक में संबंधित देशों का प्रतिनिधित्व उनके राष्ट्राध्यक्षों ने किया था। इसलिए स्वाभाविक ही ब्रिक्स की इस बैठक में बनी सहमति को ज्यादा अहमियत दी गई। लेकिन भारत को जल्दी ही निराश होना पड़ा। आरआइसी यानी रूस, भारत और चीन के विदेशमंत्रियों की ताजा बैठक में बनी सहमति की भी सच्चाई छिपी नहीं रह सकी है। भारत की विदेशमंत्री ने भी, आतंकवादी संगठनों का जिक्र करते समय जैश-ए-मोहम्मद का नाम नहीं लिया। खुद सुषमा स्वराज ने बताया कि आतंकवाद की चर्चा करते हुए उन्होंने तालिबान, अल कायदा, आइएस और लश्कर-ए-तैयबा जैसे आतंकी संगठनों की गतिविधियों में बढ़ोतरी के संदर्भ में अपनी बात रखी। लेकिन जैश-ए-मोहम्मद का नाम क्यों छूट गया? क्या यह सिर्फ संयोग से हुई चूक थी, या चीन के अब तक के रवैए को ध्यान में रख कर उन्होंने जैश का नामोल्लेख नहीं किया।

हर अंतरराष्ट्रीय बैठक या सम्मेलन के मौके पर आतंकवाद से मिलजुल कर लड़ने की कसम खाई जाती है। यह एक कूटनीतिक चलन-सा हो गया है। यहां तक कि पाकिस्तान भी ऐसे अनेक अंतरराष्ट्रीय संकल्पों में शामिल हो चुका है। खुद इस्लामाबाद में जारी हुए सार्क के एक घोषणापत्र ने दो टूक एलान किया था कि सार्क का कोर्ई भी सदस्य-देश आतंकवादी गतिविधियों के लिए अपनी जमीन का इस्तेमाल नहीं होने देगा। सार्क में सर्वसम्मति से पारित इस संकल्प के बरक्स हकीकत क्या रही है, दुनिया जानती है, और भारत तो उसका भुक्तभोगी ही है। इसी तरह का विरोधाभास अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद के खिलाफ अमेरिका की लड़ाई में भी दिख्रता है। अमेरिका की अगुआई वाले आतंकवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय गठबंधन में पाकिस्तान भी शामिल रहा है। दुनिया के दूसरे सबसे ताकतवर देश यानी चीन का रवैया जैश-ए-मोहम्मद और मसूद अजहर के मामले में हम कई बार देख चुके हैं। आतंकवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय रणनीति की अनेक खामियां हो सकती है, पर सबसे बड़ी खामी है दोहरा मापदंड और चुनिंदा कार्रवाई। यह खामी ही आतंकवाद विरोधी अंतरराष्ट्रीय संकल्पों की राह की सबसे बड़ी बाधा है।

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