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संपादकीयः संकट और सवाल

हिमाचल और उत्तराखंड दोनों ही राज्यों की भौगोलिक स्थिति भी कम जोखिम भरी नहीं है। कहा जा रहा है कि इस बार हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और इसके आसपास जितनी बरसात हुई है, उतनी सत्तर साल में कभी नहीं हुई। यानी रिकार्ड तोड़ बारिश हुई और आने वाले दिनों में भी ऐसी बारिश का अनुमान है।

Author Published on: August 20, 2019 2:43 AM
बाढ़ से डूबा देश का आधा हिस्सा फोटो सोर्स- इंडियन एक्सप्रेस

अभी महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक और केरल की भयावह बाढ़ का पानी उतरा भी नहीं है कि पहाड़ी राज्य- हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड इस प्राकृतिक आपदा की चपेट में आ गए हैं। हिमाचल में बारिश और इससे हुए हादसों में बाईस लोग मारे जा चुके हैं, जबकि उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले में बादल फटने से बीस से ज्यादा लोगों की मौत की खबर है। पिछले कुछ सालों से पहाड़ी इलाकों में बारिश का मौसम बड़ा कहर बन कर टूटता रहा है और जानमाल का भारी नुकसान देखने को मिला है। पहाड़ी इलाकों में भारी बारिश और बाढ़ से सबसे ज्यादा खतरा जमीन धंसने और पहाड़ों के टूट-टूट कर गिरने का होता है। समस्या तब और विकराल रूप धारण कर लेती है जब दूरदराज के इलाकों में इस तरह की आपदाओं में लोग फंस जाते हैं और उन तक राहत नहीं पहुंच पाती है। बड़ी-बड़ी चट्टानें रास्तों को अवरुद्ध कर देती हैं। कच्चे-पक्के घर तक चट्टानों के नीचे दब जाते हैं। पहाड़ों का जीवन यों भी मुश्किलों भरा होता है, ऐसे में बारिश, बाढ़, भूस्खलन जैसे कुदरती संकट जिंदगी को और कठिन बना देते हैं।

हिमाचल और उत्तराखंड दोनों ही राज्यों की भौगोलिक स्थिति भी कम जोखिम भरी नहीं है। कहा जा रहा है कि इस बार हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला और इसके आसपास जितनी बरसात हुई है, उतनी सत्तर साल में कभी नहीं हुई। यानी रिकार्ड तोड़ बारिश हुई और आने वाले दिनों में भी ऐसी बारिश का अनुमान है। मौसम विभाग को इतनी ज्यादा बारिश का अनुमान पहले नहीं रहा होगा, वरना चेतावनी जारी होती और प्रशासन समय रहते बचाव के उपाय करता। बारिश और भूस्खलन से हिमाचल प्रदेश के कई जिलों में सड़कें और पुल पानी में बह गए हैं और रास्ते बंद हो गए हैं। शिमला शहर में ही कई जगहों पर जमीन धंसने की घटनाएं हुईं जिनमें बड़ी संख्या में वाहन दब गए। दूरदराज के इलाकों में लोग जान जोखिम में डालते हुए अपने स्तर पर ही बचाव के तरीके अपनाते हैं। लेकिन कई बार इसी में जान भी चली जाती है।

नदी-नालों का तेज बहाव लोगों को भी बहा ले जाता है। पहाड़ी इलाकों में सबसे बड़ी समस्या यही होती है कि रास्ते बंद हो जाने से ज्यादातर हिस्सों का एक दूसरे से संपर्क टूट जाता है और किसी अनहोनी की खबर तक नहीं मिल पाती। पहाड़ी इलाकों में इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं अब ज्यादा गंभीर रूप इसलिए भी लेने लगी हैं कि लोगों ने प्रकृति के साथ खिलवाड़ करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। औसत से ज्यादा बारिश होने को लेकर एक मोटी धारणा यह बनी है कि यह जलवायु संकट यानी धरती के बढ़ते तापमान का दुष्परिणाम है और इसी वजह से हिमालयी क्षेत्र में होने वाले परिवर्तन भी इससे अछूते नहीं हैं। ऐसे में भारी बारिश या हिमपात से कोई नहीं बचा सकता।

हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्य पर्यटन के बड़े ठिकाने हैं। पहाड़ों पर बहुमंजिला इमारतें, होटल जिस कदर छा रहे हैं, वह चिंताजनक है। इनमें से ज्यादातर निर्माण अवैध होते हैं। बारिश के बाद भूस्खलन जैसी घटनाएं पहाड़ों पर बढ़ते ऐसे ही दबाव का नतीजा हैं। जंगलों के दोहन ने बाढ़ जैसी समस्याओं को न्योता दिया है। सरकार और प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती यह है कि अब प्राकृतिक आपदाएं जिस तरह से आती हैं और संकट खड़े करती हैं उनसे बचाव के नए तरीके खोजें। पिछली घटनाओं से सबक लें, ताकि जानमाल के नुकसान को न्यूनतम किया जा सके। लोगों को बचाना है तो इसके लिए पहले पहाड़ों को बचाना होगा।

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