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संपादकीयः अर्थव्यवस्था की तस्वीर

बजट सत्र शुरू होते ही, जैसी कि रिवायत है, सरकार ने सालाना आर्थिक सर्वे संसद में पेश कर दिया।

आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम

बजट सत्र शुरू होते ही, जैसी कि रिवायत है, सरकार ने सालाना आर्थिक सर्वे संसद में पेश कर दिया। इस सर्वे के आधार पर यह अंदाजा लगाया जाता है कि अर्थव्यवस्था किस मुकाम पर और किस हालत में है। साथ ही, इससे पता चलता है कि पिछले साल बजट में जो घोषणाएं की गई थीं, जिन मदों में जो आबंटन तय किए गए थे और इन सबसे जो मंसूबे बांधे गए थे वे कहां तक पूरे हुए। चूंकि आर्थिक सर्वे के आंकड़े खुद सरकार द्वारा दिए गए होते हैं, इसलिए अकादमिक तथा विश्लेषणात्मक अध्ययन के लिहाज से भी आर्थिक सर्वे काफी उपयोगी माना जाता है। अलबत्ता, अर्थव्यवस्था संबंधी आंकड़ों के लिए साल बीतने का इंतजार कोई नहीं करता। सूचना के इस युग में हर तरह के आंकड़े थोड़े-थोड़े अंतराल पर आते रहते हैं।

बहरहाल, इस बार आर्थिक सर्वे को लेकर कोई खास बात है तो यही कि यह नोटबंदी से पैदा हुई अफरातफरी निपट जाने तथा जीएसटी लागू होने के बाद का सर्वे है, और इसका सबसे बड़ा दावा यही है कि हमारी अर्थव्यवस्था में औपचारिक क्षेत्र का हिस्सा बढ़ रहा है। सर्वे के मुताबिक कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, कर्मचारी राज्य बीमा निगम जैसी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के तहत पंजीकृत लोगों का गैर-कृषि श्रम-शक्ति में अनुपात इकतीस फीसद तक हो गया है।

इसी तरह, ‘औपचारिकीकरण’ को जीएसटी नेट के दायरे से परिभाषित करें, तो ऐसे उद्यमों का अनुपात तिरपन फीसद तक पहुंच गया है। अर्थव्यवस्था में औपचारिक क्षेत्र का हिस्सा पिछले एक साल में तेजी से बढ़ने का तथ्य रेखांकित करने के साथ ही यह दावा भी किया गया है कि अप्रत्यक्ष करदाताओं की संख्या में पचास फीसद का इजाफा हुआ है। सर्वे ने प्रत्यक्ष करों में भी बढ़ोतरी का हवाला दिया है, पर इसी के साथ यह असंतोष भी जताया है कि राज्यों और स्थानीय निकायों का प्रत्यक्ष कर-राजस्व बहुत कम है। सर्वे ने कई ऐसे कारकों पर भी प्रकाश डाला है जो सीधे आर्थिक नहीं हैं, पर अर्थव्यवस्था को गहरे प्रभावित करते हैं। जैसे, जलवायु बदलाव से कृषि पर पड़ रहे प्रतिकूल प्रभाव की चर्चा की गई है। इसी तरह, यह बताया गया है कि गांवों से शहरों की तरफ हो रहे पलायन के फलस्वरूप खेती दिनोंदिन महिलाओं पर अधिक आश्रित होती जा रही है। सर्वे में दिल्ली के प्रदूषण को लेकर भी चिंता जताई गई है और लैंगिक अनुपात बिगड़ने को लेकर भी। सर्वे का आकलन है कि चालू वित्तवर्ष में वृद्धि दर 6.7 फीसद रहेगी, और यह उम्मीद जताई गई है कि अगले वित्तवर्ष में वृद्धि दर सात से साढ़े फीसद होगी।

सर्वे के मुताबिक मौजूदा वित्तवर्ष में चालू खाते का घाटा डेढ़ से दो फीसद होगा, और राजकोषीय घाटा 3.2 फीसद रहने का अनुमान है। लेकिन सर्वे में न तो कृषि पैदावार का वाजिब दाम न मिल पाने की वजह से किसानों की कर्जग्रस्तता और खुदकुशी की चर्चा है और न ही बेरोजगारी बढ़ने की। शिक्षा तथा इलाज के दिनोंदिन और महंगे होते जाने की कड़वी हकीकत से भी सर्वे ने आंख चुरा ली है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम में पिछले दिनों हुई बढ़ोतरी और यह रुझान बने रहने पर स्वाभाविक ही चिंता जताई गई है, मगर इसके फलस्वरूप महंगाई और लोगों की रोजमर्रा की तकलीफें बढ़ने का कोई जिक्र नहीं है। चिंता बस यह है कि कच्चा तेल कहीं अगले वित्तवर्ष में वृद्धि दर की उम्मीद पर पानी न फेर दे। सर्वे में अदालतों पर मुकदमों के बोझ को लेकर भी चिंता मिल जाएगी। पर सवाल है कि न्यायिक तंत्र की क्षमता बढ़ाने के लिए सरकार ने अब तक क्या किया है!

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