Opinion about Differences in Communist Party of India - Jansatta
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संपादकीयः माकपा में मतभेद

अमूमन वामपंथी पार्टियां खासकर अहम मसलों पर आम राय के लिए जानी जाती हैं। लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति की कोलकाता में हुई बैठक में अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रणनीति को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण उभरे।

Author January 23, 2018 3:17 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर

अमूमन वामपंथी पार्टियां खासकर अहम मसलों पर आम राय के लिए जानी जाती हैं। लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की केंद्रीय समिति की कोलकाता में हुई बैठक में अगले लोकसभा चुनाव के मद्देनजर रणनीति को लेकर दो अलग-अलग दृष्टिकोण उभरे। खूब बहस-मुबाहिसा हुआ। पर अंत तक मतभेद सुलझाए नहीं जा सके। आखिरकार मतदान का सहारा लेना पड़ा। राजनीतिक प्रस्ताव के दो मसविदे पेश किए गए। एक मसविदा पार्टी महासचिव सीताराम येचुरी का था। दूसरा मसविदा पार्टी के पूर्व महासचिव प्रकाश करात द्वारा समर्थित था। करात धड़े के मसविदे को ही पार्टी की केंद्रीय समिति के बहुमत का समर्थन मिला। उनके मसविदे को पचपन वोट मिले तो येचुरी के मसविदे को इकतीस वोट। माकपा के इतिहास में यह एक विरल घटना है। कोई चार दशक बाद ऐसा हुआ कि पार्टी महासचिव के राजनीतिक प्रस्ताव को केंद्रीय समिति में हार का मुंह देखना पड़ा। इससे पहले, उन्नीस सौ पचहत्तर में तब के महासचिव पी सुंदरैया अपना राजनीतिक प्रस्ताव पारित नहीं करा पाए थे। येचुरी का प्रस्ताव गिर जाने को पार्टी के आंतरिक संकट का प्रतिबिंब माना जा रहा है। माकपा में प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के रूप में दो धड़े होने की बात बरसों से कही जाती रही है। तब भी कही जाती थी जब करात महासचिव थे।

बहरहाल, येचुरी के प्रस्ताव में अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने के लिए कांग्रेस के साथ मिल कर एक वाम लोकतांत्रिक मोर्चा बनाने की वकालत की गई थी। जबकि बहुमत वाले यानी करात समर्थित प्रस्ताव में कांग्रेस के साथ तालमेल या मेलजोल की संभावना को खारिज किया गया था। अलबत्ता वर्तमान अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के विश्लेषण से लेकर आर्थिक नीतियों तक दोनों प्रस्ताव समान दृष्टिकोण के थे। दोनों में भाजपा को हराने की जरूरत जोर देकर रेखांकित की गई थी। पर कांग्रेस को लेकर माकपा के भीतर मतभेद पहली बार सामने नहीं आए हैं। 2016 के बंगाल विधानसभा चुनाव में भी करात धड़ा कांग्रेस के साथ किसी प्रकार के तालमेल के खिलाफ था, जबकि पार्टी की बंगाल इकाई ने कांग्रेस के साथ अनौपचारिक सहयोग की रणनीति अपना रखी थी। नतीजे आए, तो यह रणनीति नाकाम साबित हुई। अगले लोकसभा चुनाव में भाजपा को हराने की जरूरत शिद््दत से महसूस करने के बावजूद, कांग्रेस को लेकर माकपा में गहरी दुविधा या दो राय होने के पीछे बंगाल का यह अनुभव भी रहा होगा। करात और येचुरी के द्वंद्व को पार्टी में बंगाल इकाई और केरल इकाई के द्वंद्व के तौर पर भी देखा जा रहा है। करात धड़े के प्रस्ताव को केंद्रीय समिति में शामिल केरल के सभी सदस्यों ने समर्थन दिया, सिर्फ वीएस अच्युतानंदन अपवाद थे। जबकि केंद्रीय समिति में शामिल बंगाल के अधिकतर सदस्यों ने येचुरी के प्रस्ताव का साथ दिया।

अब द्वंद्व का अगला मोर्चा अप्रैल में होगा, जब पार्टी की अगली कांग्रेस होगी, जो कि हर तीन साल में होती है। अगली कांग्रेस में 2019 की रणनीति को लेकर फिर जोरदार बहस होगी, और लिहाजा राजनीतिक प्रस्ताव पर भी। ये सारे बहस-मुबाहिसे और मतभेद माकपा के भीतर छाए गहरे संशयों और ऊहापोह की तरफ इशारा करते हैं। कुछ लोगों को इसमें शख्सियतों की टकराहट भी दिखाई दे सकती है। शायद कुछ लोग इसे बस माकपा की मुसीबत के रूप में देखें। लेकिन इस सब को एक और कोण से भी देख्रा जा सकता है। ऐसे समय, जब अधिकतर पार्टियां परिवारों की जागीर बन चुकी हैं, और बाकियों में भी आंतरिक लोकतंत्र नाम की कोई चीज नहीं बची है, कम्युनिस्ट पार्टियों में सैद्धांतिक और रणनीतिक मुद््दों पर खुलकर इतनी चर्चा होती है और पार्टी के शीर्ष नेता से अलग भी राजनीतिक प्रस्ताव स्वीकार किया जा सकता है!

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