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संपादकीयः असहमति की जगह

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बुधवार को जो कहा वह यों तो हमेशा कहे जाने लायक है, पर आज के भारत के संदर्भ में यह कहीं ज्यादा प्रासंगिक है।

लोकतंत्र को लेकर वेकैंया नायडू का बयान

उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने बुधवार को जो कहा वह यों तो हमेशा कहे जाने लायक है, पर आज के भारत के संदर्भ में यह कहीं ज्यादा प्रासंगिक है। बुधवार को राजधानी दिल्ली में एक समारोह को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि लोकतंत्र सिर्फ संख्या नहीं, बल्कि एक दूसरे के विचारों को समझना और सराहना है। राज्यसभा के सभापति के तौर पर अपने अनुभव बताते हुए उपराष्ट्रपति नायडू ने यह भी कहा कि चर्चा और संवाद, विचारों का आदान-प्रदान और विभिन्न मतों में असहमतियों के बीच सहमति बनाना एक स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र का मौलिक तत्त्व है। पर यह बेहद अफसोस की बात है कि यह तत्त्व दिनोंदिन कमजोर होता जा रहा है। यह आम धारणा बनती जा रही है कि लोकतंत्र का मतलब केवल संख्याबल है। सत्ता में बैठे लोगों के किसी कृत्य पर सवाल उठें, तो वे यह दलील देने से बाज नहीं आते कि वे चुनाव जीत कर आए हैं, उन्हें जनादेश मिला हुआ है। इस तरह की धारणा और इस तरह की दलीलों से बहुमतवाद और बहुसंख्यकवाद लोकतंत्र के पर्याय बनते गए हैं।

यह सही है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था या संसदीय प्रणाली बहुमत के आधार पर चलती है और चलनी चाहिए। पर इसका यह अर्थ नहीं कि चुनाव या संख्याबल लोकतंत्र की एकमात्र कसौटी है। लोकतंत्र का मतलब यह भी होता है कि हम मानवाधिकारों, अभिव्यक्ति की आजादी या असहमति के अधिकार का कितना सम्म्मान करते हैं और संवाद व सौहार्द को अपने व्यवहार में कितनी जगह देते हैं। इन कसौटियों पर हमारा लोकतंत्र कहां खड़ा है?

लोकतंत्र सब तरह के अल्पसंख्यकों की रक्षा और असहमति के अधिकार का भरोसा दिलाता है। पर आज भारत में असहमति को सहजता से नहीं लिया जाता। असहमत व्यक्ति की नीयत पर शक किया जाता है, या उस व्यक्ति को संदेहास्पद रूप में प्रचारित किया जाता है। राष्ट्र के प्रति उसकी निष्ठा संदिग्ध बताई जाती है। इस तरह की हरकतों से उस व्यक्ति की छवि को तो नाहक ठेस पहुंचती ही है, हमारा लोकतंत्र भी कमजोर होता है। जहां संख्याबल का हवाला देकर सिर्फ हां बोलने की इजाजत हो, वह जीवंत लोकतंत्र नहीं हो सकता। सच तो यह है कि असहमति को सहजता से लेना कोई लोकतांत्रिक रियायत या मेहरबानी नहीं है, असहमति जाहिर करने का अधिकार हर व्यक्ति का नैसर्गिक व बुनियादी अधिकार है और इससे लोकतंत्र प्राणवान बनता है। रचनात्मकता और ज्ञान के विकास के लिए भी यह जरूरी है।

असहमति हमेशा रचनात्मकता का शक्ति-स्रोत रही है, और असहमति के बिना ज्ञान का विकास हो ही नहीं सकता। कई वर्तमान आम धारणाएं केवल रूढ़ियां होती हैं, उनके साथ संख्याबल भले हो, सत्य का बल नहीं होता। कोई उन धारणाओं का खंडन करने और सच बताने के लिए उठ खड़ा होता है, तो यह तत्कालीन समाज को या उस समाज के बहुत सारे लोगों को रास नहीं आता। पर सच्चाई की अपनी ताकत होती है और वह धीरे-धीरे लोगों को अपनी निराधार धारणाएं बदलने पर मजबूर कर देती है। ज्ञान का विकास इसी तरह से, आरंभिक असहमतियों के जरिए ही होता रहा है। जो असहमति को कुचलना चाहते हैं, आश्चर्य नहीं कि वे रचनात्मकता और ज्ञान के भी खिलाफ होते हैं। बहरहाल, नागरिक अधिकार ही हमारे हमारे संविधान का मूलाधार हैं, और अगर असहमति के अधिकार पर हमला होता है तो वह हमारे संविधान पर चोट है।

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