Opinion about Cop, gym trainer had argued over payment for clothes - Jansatta
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संपादकीयः वर्दी पर दाग

नोएडा में शनिवार रात एक जिम ट्रेनर को एक प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर ने गोली मार दी। वह जिम ट्रेनर गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है।

Author February 6, 2018 4:49 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

नोएडा में शनिवार रात एक जिम ट्रेनर को एक प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर ने गोली मार दी। वह जिम ट्रेनर गंभीर हालत में अस्पताल में भर्ती है। यह वाकया पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खडे़ करता है। उपर्युक्त जिम ट्रेनर का कोई आपराधिक रिकार्ड नहीं था। फिर, वह भाग नहीं रहा था। प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर से किसी बात पर कहासुनी जरूर हुई थी। पर सब इंस्पेक्टर के साथ कई सहकर्मी भी थे। पुलिस को अगर कुछ गड़बड़ लग रहा था, तो उस व्यक्ति को बड़ी आसानी से गिरफ्तार किया जा सकता था। लेकिन बहुत सारे पुलिसकर्मियों की ऐसी मानसिकता बन गई है और बना दी गई है मानो वे कानून से ऊपर हैं और चाहे जब चाहे जिस हद तक ताकत का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्हें बल प्रयोग का अधिकार जरूर हासिल है, पर यह कर्तव्य पालन, यानी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए है और इसकी स्थितियां परिभाषित हैं। अगर पुलिस इस मर्यादा को ध्यान में नहीं रखती, तो वह रक्षक नहीं भक्षक बन जाती है।

ताजा मामले में वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक का कहना है कि यह वाकया निजी रंजिश का है, इसलिए इसे फर्जी मुठभेड़ का मामला नहीं माना जाना चाहिए। आरोपी गिरफ्तार कर लिया गया है और मौके पर मौजूद उसके तीन साथी निलंबित कर दिए गए हैं। घटना पर लोगों के रोष को देखते हुए पुलिस महकमे ने फौरन कार्रवाई की है। अगर इस मामले को, जैसा कि महकमे का कहना है, निजी झगड़े की वजह से हुआ मान लें, तब भी उत्तर प्रदेश पुलिस खुद पर उठ रहे सवालों से पल्ला नहीं झाड़ सकती। आखिर एक प्रशिक्षु सब इंस्पेक्टर को यह खयाल कैसे आया कि वह चाहे तो एक आदमी को मार कर उसे मुठभेड़ की शक्ल दे सकता है? जब कानून-व्यवस्था के नाम पर मुठभेड़ को ही कारगर उपाय बताया जाने लगता है और फर्जी मुठभेड़ों को कभी सांप्रदायिक रंग देकर तो कभी किसी और बिना पर सही ठहराया जाने लगता है तो पुलिस में सही-गलत का विवेक कमजोर पड़ जाता है। फर्जी मुठभेड़ों के आरोप सेना पर भी लगे हैं और मणिपुर में सेना पर लगे ऐसे आरोपों की जांच का आदेश खुद देश की सर्वोच्च अदालत ने दिया है। आतंकवाद के खिलाफ किसी अभियान के दौरान बल प्रयोग में गलती हो सकती है, और इसी तर्क पर अशांत क्षेत्रों में सुरक्षा बलों को कुछ विशेष अधिकार दिए हैं, ताकि वे निर्भीकता से अपना काम कर सकें। लेकिन मणिपुर के जिन मामलों में सर्वोच्च अदालत ने जांच का आदेश दिया, वे पहली नजर में, कार्रवाई के दौरान हुई गलती के मामले नहीं थे।

चाहे सेना हो या पुलिस, उन्हें मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। कानून-व्यवस्था और आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के क्रम में अपराधियों और संदिग्धों के साथ सख्ती बरती जाती है, न कि बेगुनाह लोगों पर कहर बरपाया जाता है। पुलिस लोगों की सुरक्षा के लिए है। पर क्या कारण है कि लोग पुलिस से भय खाते हैं, उसके पास जाने से डरते हैं? यह धारणा यों ही नहीं है, बल्कि लंबे अरसे से, रोजाना के उनके अनुभवों से बनी है। विडंबना यह है कि हमारी राज्य सरकारें पुलिस की इस छवि को बदलने के लिए कतई गंभीर नहीं हैं, उनकी दिलचस्पी पुलिस के सियासी इस्तेमाल में जरूर दिखती है। यही कारण है कि पुलिस सुधार के लिए बनी सोराबजी समिति की सिफारिशों को, सर्वोच्च न्यायालय की हिदायत के बावजूद, सभी राज्य सरकारों ने धता बता दिया।

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