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चौपालः मन के रंग

रंगों की रंगत का अहसास हमें होली के रंगों को देख कर ही होता है। ये रंग न सिर्फ अपनी इंद्रधनुषी छटा से परिवेश को खूबसूरत बनाते हैं बल्कि मन, मस्तिष्क, भाव, स्वभाव पर भी असर डालते हैं।

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रंगों की रंगत का अहसास हमें होली के रंगों को देख कर ही होता है। ये रंग न सिर्फ अपनी इंद्रधनुषी छटा से परिवेश को खूबसूरत बनाते हैं बल्कि मन, मस्तिष्क, भाव, स्वभाव पर भी असर डालते हैं। पसंदीदा रंग व्यक्ति के व्यक्तित्व को भी दर्शाता है। अगर रंगों की दुनिया पर गौर फरमाएं तो हर रंग कुछ कहता नजर आता है। लाल रंग खतरा, शक्ति, उत्साह, साहस और बलिदान का प्रतीक बताया जाता है तो नीला रंग आरामदायक, बुरे स्वप्न को दूर करने वाला और परस्पर विश्वास, त्याग, समर्पण को बढ़ाने वाला कहा जाता है। पीला रंग ताकतवर होने के साथ ही रचनात्मकता, आत्मविश्वास और मित्रता के भाव को बढ़ाता है। हरा रंग शांति, प्यार, एकता में वृद्धि करता है। बैंगनी रंग सांसारिक संपन्नता, धन, ऐश्वर्य और विलासिता का प्रतीक माना जाता है। काला रंग भावनाओं के अभाव को दर्शाता है।

प्रकृति की सुंदरता हो या चंद्रमा की चांदनी, सूर्य की लालिमा हो या खेतों की हरियाली, आसमान का नीलापन हो या बारिश के बाद का इंद्रधनुषी निखार अथवा बर्फ की सफेदी, रंग कभी भी आत्मा को आनंदविभोर किए बिना नहीं रहते। ऐसे में रंग के अहसास को सिर्फ होली पर महसूस करना उनके साथ नाइंसाफी होगी। आज हुड़दंग से बचने के लिए भले ही कुछ लोगों ने होली पर रंग खेलने से दूरी बना ली हो लेकिन रंग के अहसास से वे भी परिचित हैं। हर व्यक्ति जिंदगी में अपने ढंग से रंग भरता है। रंगों के बिना जीवन प्राण बिन शरीर की तरह है। उम्र का हर पड़ाव रंगों को अपने ढंग से अनुभूत करता है। बच्चे रंगों की सहायता से ही वस्तुओं को पहचानते हैं। युवा रंगों के माध्यम से ही संसार का सृजन करते हैं। वृद्धों की पथराई आंखें रंगों के माध्यम से ही वस्तुओं के नाम प्राप्त करती हैं।

जिंदगी खुशी और गम का संयोग मात्र है। मनुष्य के अहसासों, जिंदगी के उतार-चढ़ावों और मानवीय मनोभावों को अभिव्यक्ति प्रदान करने के लिए भी रंगों का सहारा लिया जाता है। रोज सुबह उठ कर पूर्व दिशा में छाई सूरज की लाली पर नजर पड़ती है तो एक क्षण को लगता है जैसे नीले अंबर पर किसी ने लाल रंग की रोली के तिलक का शृंगार कर दिया हो। लाल, हरे, पीले, नीले, बैंगनी, नारंगी रंगों के अलावा भी एक रंग होता है जिसे मनुष्य के मन का रंग कहते हैं। यह इंसानियत का, मानवीय मनोभावों का, आपसी प्रेम और भाईचारे का रंग है जिसके बिना सभी रंग अधूरे हैं।

आज देश और समाज को सबसे ज्यादा इसी रंग-अहसास की जरूरत है। जिसका अंतर्मन भावनाओं के इस रंग से भरा होता है उसे किसी और रंग की जरूरत ही महसूस नहीं होती। दुनिया के सारे रंग तो एक अंतराल के बाद छूट जाते हैं। एक स्थायी, सदा कायम रहने वाला रंग मन का रंग ही है। कहने की आवश्यकता नहीं कि बरसाने की लट्ठमार होली हो या राधा-कृष्ण की प्रेम रंग की होली या ठाकुरजी की फूलों की होली, मन के रंग के बिना हर होली अधूरी है। इसलिए होली पर खुद को रंग में डुबोएं या न डुबोएं, मन से रंग के अहसास को कभी विस्मृत न होने दें। क्योंकि जब तक रंग है तभी तक जीवन में तरंग है। रंगों के बिना सब बदरंग है। मन में रंग का अहसास हो तो बिना भीगे भी आप खुद को अंतर्मन से तरबतर महसूस कर सकते हैं। इस भाव से होली मनाएं और खुद खुशहाल बन कर औरों को भी खुशहाल बनाएं।
’देवेंद्र जोशी, उज्जैन, मध्यप्रदेश

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