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राजनीतिः अस्तित्व का संकट और चुनौतियां

बीसवीं शताब्दी की एक खास विशेषता यह है कि इस शताब्दी के अंत तक पंहुचते-पहुंचते अनेक मानव निर्मित कारणों से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिनसे पृथ्वी पर मानव जीवन व अनेक अन्य तरह के जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मनुष्य ने अपने कार्यों से अपने अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया और साथ ही बेकसूर जीवों के अस्तित्व को भी।

Author April 17, 2019 1:15 AM
बीसवीं शताब्दी में विज्ञान और तकनीक की आश्चर्यजनक प्रगति के बावजूद इस शताब्दी के अंतिम वर्षों में इतनी अधिक, भीषण और पेचीदा समस्याओं से दुनिया घिरी हुई है कि गहरे और बुनियादी बदलाव की जरूरत अब पहले से भी अधिक लग रही है।

भरत डोगरा

इतिहास के विभिन्न दौरों में न्याय, समता और अमन-शांति चाहने वाले लोग वैकल्पिक राजनीति, सामाजिक व राजनीतिक व्यवस्था की तलाश करते रहे हैं। आध्यात्मिक सोच ने इन विकल्पों की तलाश को मानव जीवन की सार्थकता से जुड़े शाश्वत सवाल उठा कर और समृद्ध किया। लोकतंत्र के विकास से इस सोच में नए आयाम जुड़े। हाल के वर्षों में, विशेषकर पिछले तीन दशकों में, इस सोच का संभवत: सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह रहा है कि अब धरती पर जीवन के अस्तित्व मात्र का संकट विकट हो रहा है और इस कारण विकल्पों की तलाश और भी बहुत जरूरी हो गई है। हालांकि एक तरह से यह सोच पचहत्तर साल वर्ष पहले ही आरंभ हो गई थी जब पहला परमाणु बम हिरोशिमा में गिराया गया था। इसके बाद अस्तित्व का खतरा परमाणु हथियारों के संदर्भ में ही चर्चित होता था। पर जैसे-जैसे पर्यावरण की अनेक गंभीर समस्याओं और विशेषकर जलवायु बदलाव के संकट की गंभीरता स्पष्ट हुई तो अस्तित्व के संकट को अधिक व्यापक संदर्भ में पहचाना जाने लगा। इस संकट की व्यापकता और गंभीरता वर्ष 1990 तक स्पष्ट हो चुकी थी।

वर्ष 1992 में विश्व के डेढ़ हजार से ज्यादा वैज्ञानिकों ने (जिनमें उस समय जीवित नोबल पुरस्कार प्राप्त वैज्ञानिकों में से लगभग आधे वैज्ञानिक भी सम्मिलित थे) एक बयान जारी किया था। इसमें कहा गया था, ‘हम मानवता को इस बारे में चेतावनी देना चाहते हैं कि भविष्य में क्या हो सकता है। पृथ्वी और उसके जीवन की व्यवस्था जिस तरह हो रही है उसमें एक व्यापक बदलाव की जरूरत है, अन्यथा बहुत दुख-दर्द बढ़ेंगे और हम सबका घर यह पृथ्वी इतनी बुरी तरह तहस-नहस हो जाएगी कि फिर उसे बचाया नहीं जा सकेगा।’

इन वैज्ञानिकों ने यह भी कहा कि वायुमंडल, समुद्र, मिट्टी, वन और जीवन के विभिन्न रूपों पर तबाह हो रहे पर्यावरण का बहुत दबाव पड़ रहा है। वर्ष 2100 तक पृथ्वी के विभिन्न जीवन रूपों में से एक तिहाई लुप्त हो सकते हैं। मनुष्य की वर्तमान जीवन-पद्धति के अनेक तौर-तरीके भविष्य में सुरक्षित जीवन की संभावनाओं को नष्ट कर रहे हैं और इस जीती-जागती दुनिया को इतना बदल सकते हैं कि जिस रूप में जीवन को हमने जाना है, उसका अस्तित्व ही कठिन हो जाए। इन प्रतिष्ठित वैज्ञानिकों ने जोर देकर कहा कि प्रकृति की इस तबाही को रोकने के लिए बुनियादी बदलाव जरूरी है।

बीसवीं शताब्दी की एक खास विशेषता यह है कि इस शताब्दी के अंत तक पहुंचते-पहुंचते अनेक मानव निर्मित कारणों से ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न हो चुकी हैं जिनसे पृथ्वी पर मानव जीवन व अनेक अन्य तरह के जीवन का अस्तित्व ही खतरे में पड़ गया है। मनुष्य ने अपने कार्यों से अपने अस्तित्व को ही खतरे में डाल दिया और साथ ही बेकसूर जीवों के अस्तित्व को भी। अब चाहे यह खतरा जलवायु तेजी से बदलने के रूप में उत्पन्न हुआ हो, ओजोन परत तेजी से लुप्त होने के रूप में हो, परमाणु हथियारों के विशालकाय भंडार के रूप में या अन्य तरह का हो।

वर्ष 1992 की चेतावनी के पच्चीस साल पूरे होने पर एक बार फिर विश्व के बहुत जाने-माने वैज्ञानिकों ने वर्ष 2017 में फिर एक अपील जारी की। इस अपील ने पहले से भी अधिक ध्यान खींचा। इस पर एक सौ अस्सी देशों के साढ़े तेरह हजार वैज्ञानिकों और अन्य प्रतिष्ठित व्यक्तियों ने हस्ताक्षर किए थे। इसमें कहा गया था कि जिन गंभीर समस्याओं की ओर वर्ष 1992 में ध्यान दिलाया गया था, उनमें से अधिकांश समस्याएं पहले से अधिक विकट हो रही हैं और उनके समाधान के प्रयास में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हुई है। केवल ओजोन परत संबंधी समस्या में कुछ सफलता मिली है। अस्तित्व को संकट में डालने वाली अन्य समस्याएं पहले की तरह गंभीर स्थिति में मौजूद हैं या फिर उनकी स्थिति और विकट हुई है।

जलवायु बदलाव के कारण कई तरह की विकट समस्याएं अगले कुछ दशकों में उग्र रूप ले सकती हैं। समुद्रों का जल-स्तर ऊपर उठने से कई टापू देश लुप्त तक हो सकते हैं, कई घनी आबादी वाले शहर उजड़ सकते हैं और एक-तिहाई तक कृषि भूमि बुरी तरह प्रभावित हो सकती है। बदलती जलवायु के कारण अनेक प्रजातियां लुप्त हो सकती हैं। अनेक नई बीमारियां फैल सकती हैं या पहले से मौजूद रोगों का प्रकोप बढ़ सकता है। अनेक प्राकृतिक आपदाएं भी पहले से और विकट हो सकती हैं। यह समस्या इसलिए भी गहराई है कि जिन अधिक विकसित व धनी देशों की इस पर्यावरणीय संकट में प्रमुख जिम्मेदारी मानी गई है और जिनके पास इसे सुलझाने के लिए आर्थिक संसाधन थे, उन्होंने पहले तो कुछ बड़े वादे किए, लेकिन बाद में पीछे हटने लगे।

पिछली शताब्दी में धरती पर जीवन को सबसे ज्यादा खतरे में डाला है तो परमाणु हथियारों ने। बीसवीं शताब्दी में दो विश्व युद्ध हुए, जिनमें लगभग छह करोड़ लोग मारे गए। इसके अतिरिक्त जो अन्य विनाशकारी युद्ध हुए (वियतनाम, कोरिया, खाड़ी क्षेत्र के युद्ध आदि) या विभिन्न देशों और क्षेत्रों में जो आंतरिक हिंसा हुई (जैसे कंबोडिया, रवांडा, इंडोनेशिया, चीन व नाइजीरिया में, भारत के बंटवारे के समय व बाद में बांग्लादेश के नए देश के रूप में उदय होने से पहले) तो इन सब वारदातों में भी लगभग चार करोड़ लोग मारे गए। इस तरह हिंसा की व्यापक घटनाओं में बीसवीं शताब्दी में लगभग दस करोड़ लोग मारे गए या औसत लगाएं तो हर वर्ष लगभग दस लाख लोग मारे गए। मानवीय विकास रिपोर्ट के अनुसार इस समय केवल परमाणु हथियारों के भंडार की विनाशक शक्ति बीसवीं शताब्दी के तीन सबसे बड़े युद्धों के कुल विस्फोटकों की शक्ति से सात सौ गुना ज्यादा है। इसके अलावा परंपरागत हथियारों की विस्फोटक शक्ति भी इतनी बढ़ा दी गई है कि कुछ ही घंटों के युद्ध में लाखों व्यक्तियों को मारा जा सकता है। रासायनिक और जैविक हथियारों पर प्रतिबंध होने के बावजूद इन हथियारों का जो जखीरा कुछ देशों के पास है, वह और बड़ा खतरा है। यदि इस तरह के खतरनाक हथियारों के जखीरे बढ़ते गए और उन्हें रोकने और खत्म करने की कोई सुरक्षित और निश्चित व्यवस्था नहीं की गई तो ये बेहद विनाशक हथियार एक दिन धरती के प्राणियों के लिए खतरा बन सकते हैं।

बीसवीं शताब्दी में विज्ञान और तकनीक की आश्चर्यजनक प्रगति के बावजूद इस शताब्दी के अंतिम वर्षों में इतनी अधिक, भीषण और पेचीदा समस्याओं से दुनिया घिरी हुई है कि गहरे और बुनियादी बदलाव की जरूरत अब पहले से भी अधिक लग रही है। यूनीसेफ, विश्व स्वास्थ्य संगठन, संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम, संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की रिपोर्टों और विशेषज्ञों तक ने इस संभावना को स्वीकार किया है कि आने वाले कुछ दशकों में विश्व में पर्यावरणीय विनाश तेजी से बढ़ सकते हैं। विश्व स्वास्थ्य रिपोर्ट में बताया है कि मानव जाति छूत की बीमारियों के विश्व स्तर के संकट की कगार पर है। कोई भी देश इनसे सुरक्षित नहीं है। इसी रिपोर्ट में कहा गया है कि कई जैव-प्रतिरोधीदवाइयों के बेअसर होने के कारण इन बीमारियों के इलाज में मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं।

विश्व इतिहास के किसी भी अन्य दौर की अपेक्षा आज न्याय, समानता, अमन-शांति और पर्यावरण रक्षा के आंदोलनों व अभियानों का एक-दूसरे के नजदीक आना और मिल कर काम करना जरूरी है। विश्व की बड़ी समस्याओं व इन आंदोलनों व अभियानों के प्रति जन-चेतना का प्रसार भी व्यापक स्तर पर होना जरूरी है ताकि लोगों में जागरूकता बढ़ सके। तभी वैकल्पिक व्यवस्था की राह निकलेगी जो अस्तित्व के संकट से समाधान की ओर ले जाएगी।

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