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संपादकीयः चीन की चाल

एक बार फिर डोकलाम चीन और भारत के बीच तनाव का सबब बन सकता है।

Author December 12, 2017 3:33 AM
डोकलाम में चीन और भारतीय सेना। (फाइल फोटो)

एक बार फिर डोकलाम चीन और भारत के बीच तनाव का सबब बन सकता है। खबर है कि चीन ने डोकलाम क्षेत्र में सैनिकों की भारी तैनाती की है; उसके सोलह सौ से अठारह सौ सैनिक वहां जम गए हैं। यों चीनी सैनिकों का भारी जमावड़ा उस जगह पर नहीं है जहां इस साल जून के मध्य में गतिरोध शुरू हुआ था। फिर भी कई वजहों से चीनी सैनिकों की नई तैनाती भारत के लिए चिंताजनक है। चीन ने यह धमक एक विवादित इलाके में दिखाई, जहां उसके साथ-साथ भूटान भी अपना दावा जताता रहा है। फिर, चीन ने वहां सड़क, हेलीपैड, आश्रय स्थल, भंडार-गृह भी बनाने शुरू कर दिए हैं। इससे पहले, चीनी सैनिक हर साल अप्रैल-मई और अक्तूबर-नवंबर में आते थे, जिसका मकसद इलाके की ताजा स्थिति का जायजा लेना और अपना दावा जताना होता था। भारत ने इस तरह साल में दो बार होने वाली चीनी सैनिकों की गश्त पर कभी आपत्ति नहीं की। भारत ने विरोध की कार्रवाई तब की, जब चीनी सैनिक भूटान के एतराज को एकदम दरकिनार करते हुए विवादित क्षेत्र में जम गए और उन्होंने वहां सड़क बनानी भी शुरू कर दी थी।

परस्पर विरोधी दावों वाले क्षेत्र पर अपना दावा जताना और निगरानी के लिए गश्त करना तो समझ में आता है, पर स्थायी निर्माण क्यों? इसलिए भारत ने आगे बढ़ कर सड़क-निर्माण रोक दिया था। उसने यह कार्रवाई भूटान की बिना पर की थी, जो सरहदी सुरक्षा के लिए उस पर निर्भर है। अलबत्ता भारत के जोखिम उठाने के पीछे उसकी अपनी सुरक्षा संबंधी चिंता भी रही होगी। भारत की यह कार्रवाई चीन को काफी नागवार गुजरी, और तनातनी तिहत्तर दिनों तक चली। आखिरकार अट्ठाईस अगस्त को चीन और भारत, दोनों ने अपने सैनिकों को पीछे हटा लिया।

चीन ने तब कहा था कि डोकलाम पर वह अपना दावा जताता रहेगा, पर इसी के साथ यह भरोसा भी दिलाया था कि वहां यथास्थिति बनी रहेगी। लेकिन अब यथास्थिति बदलने का डर कौन दिखा रहा है? विडंबना यह है कि चीन ने विवादित इलाके में अपने सैनिकों की भारी तैनाती ऐसे वक्त की है, जब उसके विदेशमंत्री रूस, चीन और भारत के विदेशमंत्रियों की बैठक के लिए रवाना होने वाले थे। डोकलाम गतिरोध टूटने के कुछ दिन बाद सितंबर में सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत ने आगाह किया था कि चीन विवादित क्षेत्र को दखल करने की कोशिश फिर से कर सकता है। वह आशंका अब सही साबित होती दिख रही है। सहज ही यह अनुमान लगाया जा सकता है कि जिस फार्मूले से गतिरोध टूटा था वह चीन को हजम नहीं हुआ होगा।

चीन का जोर था कि पहले भारत अपने सैनिकों को हटाए, तभी कोई सार्थक बातचीत हो सकती है। जबकि भारत का कहना था कि गतिरोध खत्म करने के लिए जरूरी है कि दोनों देश अपने सैनिकों को वहां से हटा लें। आखिर भारत के रुख की जीत हुई। भारत के साथ-साथ चीन को भी अपने सैनिक वापस बुलाने पड़े। इसी के बाद सितंबर के पहले सप्ताह में बेजिंग में होने वाली ब्रिक्स की शिखर बैठक में प्रधानमंत्री के जाने का रास्ता साफ हुआ था। क्या चीन ने अंतरराष्ट्रीय दबाव में आकर बुझे मन से उस फार्मूले को स्वीकार किया था और कथित समाधान से आहत था? गतिरोध खत्म करने के पीछे भारत के कूटनीतिक प्रयासों की अहम भूमिका थी। यह अलग बात है कि अब चीन एक तरफ उस वक्त के कूटनीतिक प्रयासों का श्रेय भी खुद लेना चाहता है, और दूसरी तरफ, गतिरोध खत्म होने से सिक्किम-भूटान-तिब्बत सीमाक्षेत्र में भरोसे व शांति का जो माहौल बना, उसे पलीता भी लगाना चाहता है!

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