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संपादकीयः आधार की सुरक्षा

पिछले काफी समय से आधार यानी विशिष्ट पहचान संख्या से जुड़े ब्योरे के असुरक्षित होने को लेकर बराबर सवाल उठते रहे हैं।

Author January 12, 2018 3:12 AM
इस तस्वीर का इस्तेमाल केवल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

पिछले काफी समय से आधार यानी विशिष्ट पहचान संख्या से जुड़े ब्योरे के असुरक्षित होने को लेकर बराबर सवाल उठते रहे हैं। आधार की अनिवार्यता और सुरक्षा के मसले पर दायर मुकदमों की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चल रही है। लेकिन इस बीच कई ऐसी खबरें आई हैं, जिनसे लगता है कि आधार और उसमें निहित जानकारियां अभेद्य नहीं हैं। हाल ही में एक खुलासे वाली खबर आई कि कोई व्यक्ति महज पांच सौ रुपए खर्च करके करोड़ों लोगों के आधार नंबर और उनसे जुड़े ब्योरे हासिल कर सकता है। विडंबना यह है कि इस तरह के मामले सामने आने और सवाल उठने पर यूआइडीएआइ यानी भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण को जहां अपनी व्यवस्था की कमियों पर गौर करना चाहिए, वहां उसने इन खामियों की ओर ध्यान दिलाने वालों को ही कठघरे में खड़ा करना ज्यादा जरूरी समझा। प्राधिकरण ने भले ही अपने बचाव में ऐसा किया, लेकिन शायद उसे भी अंदाजा है कि आधार कार्ड पूरी तरह सुरक्षित नहीं है। यही वजह है कि अब प्राधिकरण ने आधार की सुरक्षा के लिए एक वर्चुअल नंबर मुहैया कराने की घोषणा की है, ताकि इससे जुड़े आंकड़ों को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाया जा सके।

एक मार्च से शुरू होने वाली नई व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति अपने आधार नंबर के मुताबिक सोलह अंकों की अस्थायी वर्चुअल पहचान संख्या ले सकेगा। यों यह स्वैच्छिक विकल्प है और अगर व्यक्ति चाहे तो मोबाइल के सिम कार्ड या फिर दूसरी एजेंसियों को पहचान के रूप में उसी वर्चुअल संख्या को दे सकता है। इस नंबर की सुविधा यह है कि इसकी उपयोगिता एक निश्चित अवधि के लिए ही होगी, इसके जरिए संबंधित व्यक्ति के बारे में सीमित जानकारियां ही हासिल की जा सकेंगी और इसका दोबारा उपयोग नहीं किया जा सकेगा। जरूरत पड़ने पर फिर से नया वर्चुअल नंबर निकाला जा सकेगा। जाहिर है, पिछले काफी समय से आधार से जुड़ी असुरक्षा और इसके जरिए होने वाली गड़बड़ियों को लेकर उठने वाले सवालों से निपटने के लिए प्राधिकरण ने एक नया रास्ता निकाला है। लेकिन देखना यह होगा कि वर्चुअल आइडी की व्यवस्था सामने आने के बाद आधार के सुरक्षित होने को लेकर लोग आश्वस्त हो पाते हैं या नहीं।

ऐसी आशंका की वजह यह है कि एक ओर सरकार बाकी पहचान पत्रों के मुकाबले आधार नंबर को अनिवार्य बनाते हुए इसके सबसे सुविधाजनक और सुरक्षित होने का दावा करती रही है, और दूसरी ओर, बड़ी तादाद में लोगों के आधार नंबर और उससे जुड़े ब्योरे लीक होने की खबरें जब-तब आती रहीं। आधार से जुड़े मामलों में निजता के अधिकार का सवाल भी शामिल था। इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने निजता के अधिकार के पक्ष में अपना फैसला दिया। इसके अलावा, घोषित तौर पर यह कहा जाता है कि राशन लेने या दूसरी सुविधाओं के लिए आधार अनिवार्य नहीं है। लेकिन सच यह है कि व्यवहार में अमूमन सभी कल्याणकारी योजनाओं में आधार के बिना लोगों का कोई काम हो पाना लगभग असंभव हो चुका है। हाल के दिनों में ऐसे अनेक मामले सामने आए हैं जिनमें किसी व्यक्ति की अंगुलियों के निशान का मिलान नहीं हो पाया या मशीन खराब होने की वजह से उसे राशन देने से इनकार कर दिया गया। दरअसल, निजता और सुरक्षा के साथ-साथ पहचान पत्र के रूप में आधार नंबर की व्यवस्था से जुड़ी कई शंकाओं का संतोषजनक समाधान निकलना बाकी है।

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