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नशे से उबरता बचपन: नशे से उबरी आंखों में है अब ‘खाकी’ चमक

जिला प्रशासन की मिड-डे-मिल योजना के तहत इनके दोपहर के खाने का इंतजाम किया गया। जिले के समाज कल्याण विभाग की तरफ से इनमें से कुछ बच्चों को लालढांग गांव में छात्रावास में दाखिला दिया गया, जहां इनके रहने, खाने-पीने व पढ़ाई की मुफ्त व्यवस्था की गई है।

एसएसपी कुमार ने मौके पर जाकर हकीकत देखी।

आम आदमी के साथ अपने बर्ताव और अपराधों पर लगाम लगाने में नाकामी को लेकर अक्सर पुलिस की खिंचाई होती रही है। आम आदमी और पुलिस वालों के रिश्ते में गहरी खाई दिखती है। पर उत्तराखंड में इस खाई को पाटने की पुरजोर कोशिश की है वहां की पुलिस ने। ‘ऑपरेशन मुस्कान’ से पुलिस का मानवीय चेहरा सामने आया। इस अभियान के तहत पुलिस ने राज्य से लापता हुए बच्चों की तलाश शुरू की और खोज कर उनके घर वालों से मिलाने की जिम्मेवारी ली। अब उत्तराखंड पुलिस ने एक और नया अभियान छेड़ रखा है। यहां की पुलिस असहाय, गरीब, अनपढ़ बच्चों को पढ़ा-लिखाकर उनकी जिंदगी संवारने में जुटी है। इस अभियान की शुरुआत उत्तराखंड के हरिद्वार जनपद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) कृष्ण कुमार वीके और उनकी पत्नी शीबा ने की।

दरअसल, कुछ महीने पहले सामाजिक कार्यकर्ता विकास तिवारी ने हरिद्वार के एसएसपी कृष्ण कुमार को सूचना दी थी कि रोडी बेलवाला, पंतद्वीप और गंगा तटों की झुग्गियों में रहने वाले अधिकतर बच्चों का भविष्य नशे की लत की वजह से चौपट हो रहा है। इस सूचना पर एसएसपी कुमार ने मौके पर जाकर हकीकत देखी। वहां उन्हें 60-65 बच्चों की हालत दयनीय दिखी। तब एसएसपी ने पहल की और ‘जीवन बचाओ ऑपरेशन’ शुरू किया। उन्होंने अपनी पत्नी शीबा से इन बच्चों की हालत का जिक्र किया तो उनकी पत्नी ने इन बच्चों को गोद लेकर नई जिंदगी देने का संकल्प किया। इसके बाद एसएसपी कुमार और उनकी पत्नी शीबा ने बच्चों को नशे की हालत से उबारकर शिक्षित करना शुरू किया।

हर की पैड़ी के पास मेला नियंत्रण कक्ष के परिसर में इन बच्चों को सुबह जुटाकर इन्हें पढ़ाया जाने लगा। शीबा इन बच्चों को पढ़ाने के लिए रोजाना मेला नियंत्रण कक्ष में आती हैं। उधर, एसएसपी ने पुलिसकर्मियों की एक टीम बनाकर इन बच्चों को नशे की लत से उबारने का काम शुरू किया। पढ़ने और उबरने के इस अभियान में अब तो इन झुग्गियों से दूसरे बच्चे-बच्चियों ने भी आना शुरू कर दिया है। इस तरह अब इनकी संख्या सवा सौ के आसपास पहुंच गई है। शुरू में एसएसपी, कुछ पुलिसवाले और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों ने आपस में धनसंग्रह कर इन बच्चों के लिए पुस्तकें, कपड़े, जूते-चप्पल और दोपहर के खाने का इंतजाम किया। बाद में, हरिद्वार के जिलाधिकारी दीपक रावत और मुख्य विकास अधिकारी स्वाति भदौरिया भी इन बच्चों की मदद में सामने आए।

जिला प्रशासन की मिड-डे-मिल योजना के तहत इनके दोपहर के खाने का इंतजाम किया गया। जिले के समाज कल्याण विभाग की तरफ से इनमें से कुछ बच्चों को लालढांग गांव में छात्रावास में दाखिला दिया गया, जहां इनके रहने, खाने-पीने व पढ़ाई की मुफ्त व्यवस्था की गई है। एसएसपी बताते हैं कि शुरू में शांतिकुंज संस्था ने इन बच्चों के लिए खाने-पीने व पुस्तकों की व्यवस्था कराने में मदद की। ऐसी ही कुछ और सामाजिक संस्थाएं भी इस अभियान में सक्रिय हुर्इं। और अब तो आलम यह है कि कल तको जिन बच्चों की आंखें नशे में डूबी थीं, अब उनमें आत्मविश्वास की चमक दिखती है।

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