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संपादकीयः तकनीक का पाठ

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को दिए अपने एक फैसले में पत्राचार के जरिए तकनीकी पढ़ाई को मान्य नहीं किया, तो यह उचित ही है।

Author November 4, 2017 3:29 AM
सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को दिए अपने एक फैसले में पत्राचार के जरिए तकनीकी पढ़ाई को मान्य नहीं किया

सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को दिए अपने एक फैसले में पत्राचार के जरिए तकनीकी पढ़ाई को मान्य नहीं किया, तो यह उचित ही है। इससे पहले ओड़िशा हाइकोर्ट ने इस बात को मंजूरी प्रदान कर दी थी कि पत्राचार के माध्यम से तकनीकी शिक्षा मुहैया कराई जा सकती है। लेकिन तकनीकी शिक्षा और खासतौर पर इंजीनियरिंग व मेडिकल जैसे विषयों में अगर पत्राचार के माध्यम से पढ़ाई की जाती है तो वह कितनी गुणवत्तापूर्ण, उपयोगी और व्यावहारिक होगी, यह समझना मुश्किल नहीं है। हालांकि इस मसले पर पंजाब और हरियाणा हाइकोर्ट ने पहले ही यह व्यवस्था दी थी कि इन विषयों में पत्राचार का सहारा मान्य नहीं होगा। लेकिन दो उच्च न्यायालयों के एकदम भिन्न फैसलों को देखते हुए सर्वोच्च अदालत का नजरिया सामने आना नितांत आवश्यक था और उसने दो टूक फैसला सुनाया है।

यों भी तकनीकी शिक्षा की बुनियाद पर होने वाले किसी भी काम में प्रयोग के स्तर पर भी पूर्ण दक्षता की मांग होती है। दूसरे सामान्य कामों में छोटी-मोटी गलतियों या कमियों की भरपाई हो जाती है। लेकिन जो काम पूरी तरह किसी तकनीक पर निर्भर होते हैं, उनमें मामूली-सी चूक भी किसी प्रयोग को नाकाम कर दे सकती है या फिर कोई हादसा हो सकता है। इसलिए तकनीकी विषय की पढ़ाई में सैद्धांतिक समझ के साथ-साथ व्यावहारिक ज्ञान या प्रशिक्षण को भी उतना ही, या कुछ ज्यादा ही महत्त्व दिया जाता है।

जब स्कूल स्तर पर विज्ञान के विषयों की पढ़ाई में प्रयोगशाला का होना अनिवार्य माना जाता है तो आगे की पढ़ाई के लिए प्रैक्टिकल या व्यावहारिक प्रशिक्षण का क्या महत्त्व होगा, कहने की जरूरत नहीं। यों देश में किसी भी संस्थान में तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाने के लिए एसआइसीटीई यानी अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की मंजूरी लेना अनिवार्य है। सभी तरह के तकनीकी पाठ्यक्रम चलाने वाले सरकारी और गैर-सरकारी संस्थान एसआइसीटीई के नियमों के मुताबिक ही संचालित किए जाते हैं। इन पाठ्यक्रमों के तहत इंजीयरिंग डिग्री, इंजीनियरिंग डिप्लोमा, मेडिकल, फार्मेसी के कोर्स चलाए जाते हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों के दौरान इंजीनियरिंग तथा मेडिकल विषयों में पढ़ाई के लिए जैसा बाजार खड़ा हुआ है, उसमें देश भर में ऐसे संस्थान खुले हैं, जो नियमित कोचिंग चलाने के अलावा पत्राचार के जरिए भी डिग्री या डिप्लोमा मुहैया कराने का आश्वासन देते हैं।

लेकिन अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर मेडिकल का विद्यार्थी महज किताब पढ़ कर किसी बीमारी या खासतौर पर आॅपरेशन में प्रयोग करता है तो कैसी स्थिति पैदा हो सकती है! इसी तरह इंजीनियरिंग या फिर कंप्यूटर विज्ञान में दक्षता का तकाजा सिर्फ इतने से समझा जा सकता है कि किसी भारी मशीन, विमान या प्रौद्योगिकी में महज एक यंत्र की जांच में मामूली चूक भी हादसे का सबब बन सकती है। इसलिए अदालत के ताजा फैसले की सार्थकता साफ है। लेकिन सरकार को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि इस क्षेत्र में जितनी बड़ी तादाद में विद्यार्थी आ रहे हैं उनके लिए पर्याप्त संख्या में प्रयोगशालाओं से लैस संस्थान नहीं हैं। फिर, बहुत सारे निजी संस्थान केवल मोटी कमाई की मंशा से खोले गए हैं और साधारण तबके के विद्यार्थियों को पुसाने लायक नहीं हैं। इस समस्या से कौन निपटेगा?

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