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संपादकीयः अस्मिता का हक

गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के लिए पासपोर्ट में एक नई छूट की घोषणा की।

Author April 15, 2017 4:22 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी। (File Photo)

गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं के लिए पासपोर्ट में एक नई छूट की घोषणा की। उन्होंने कहा कि महिलाओं को शादी या तलाक के बाद पासपोर्ट में नाम बदलने की जरूरत नहीं है। वे अपने जन्म के बाद दिए गए नाम को जारी रख सकती हैं। साथ में वे अपने माता-पिता में से किसी का भी नाम देकर पासपोर्ट हासिल कर सकती हैं। प्रधानमंत्री ने यह घोषणा तब की, जब वे आइएमसी यानी इंडियन मर्चेंट्स चैंबर की महिला शाखा के एक समारोह को वीडियो लिंक के जरिए संबोधित कर रहे थे। उन्होंने इस अवसर पर जहां मातृत्व अवकाश बढ़ाने, सुकन्या समृद्धि योजना के तहत महिलाओं को उनकी बचत पर अधिक ब्याज देने और उज्ज्वला योजना समेत अपनी सरकार की तरफ से उठाए गए स्त्री-हित के अनेक कदमों का जिक्र किया, वहीं पासपोर्ट-नियमों में जिस सहूलियत की घोषणा की, वह महिलाओं की अस्मिता के संघर्ष में प्रतीकात्मक ही सही, उल्लेखनीय उपलब्धि है।
कहा जाता है कि नाम में क्या रखा है। पर महिलाओं की तरफ से देखें तो नाम में बहुत कुछ रखा है।

उन्हें हमेशा पुरुष से जोड़ कर ही देखा जाता है, विवाह से पहले पिता के साथ, विवाह के बाद पति के साथ। विवाह के बाद उनके नाम के आगे पति का कुलनाम जुड़ जाता है, जबकि पुरुष का नाम ज्यों का त्यों रहता है। जाहिर है, स्त्री की पहचान पुरुष पर निर्भर रही है। ऐसे में पासपोर्ट-नियमों में दी गईछूट अहम है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने कहा, पासपोर्ट-नियमों में एक महत्त्वपूर्ण बदलाव किया गया है। इसके तहत अब महिलाओं को पासपोर्ट के लिए अपने विवाह या तलाक का प्रमाणपत्र दिखाने की आवश्यकता नहीं होगी। साथ ही, यह उनके ऊपर होगा कि वे इसके लिए अपने पिता या माता का नाम दे सकती हैं। पिता या मां में से किसी का भी नाम देने की सहूलियत, स्त्री की स्वतंत्र सत्ता का स्वीकार है। जहां वंश केवल पिता का चलता हो और जहां सिर्फ पिता का नाम बताना काफी रहा हो, वहां अभिभावक के तौर पर केवल मांका नाम देने से आवेदन स्वीकार कर लिया जाए, तो यह संदेशवाही बदलाव है। लेकिन प्रधानमंत्री की घोषणा क्या वाकई एकदम नई तजवीज है?

विदेश मंत्रालय ने पिछले साल दिसंबर में पासपोर्ट संबंधी नियमों में कुछ बदलाव किए थे, जिनके मुताबिक पासपोर्ट के आवेदन में माता-पिता में से किसी एक का नाम देना पर्याप्त है, खासकर तब जब आवेदक वैसा ही चाहता हो। जहां तक पासपोर्टधारक महिला के नाम का सवाल है, नाम बदलने की जरूरत पहले भी तभी थी जब उसने नाम या विवाह के बाद उपनाम बदल लिया हो। अलबत्ता ऐसे बहुत-से मामले सामने आए हैं कि अधिकारी से लेकर ट्रैवल एजेंट तक, नियमों में संशोधन के बावजूद पिता का नाम भरने के लिए दबाव डालते हैं, सिर्फ माता के नाम के उल्लेख से उन्हें संतोष नहीं होता। अगर अकेली महिला को बाहर जाना हो, तो पति या पिता की अनुमति या अनापत्ति के प्रमाण भी मांगे जाते हैं। जहां सदियों से यह मानसिकता रही हो कि महिलाओं को हर काम पुरुषों से पूछ कर करना चाहिए, वहां ऐसा सलूक हैरत की बात नहीं है। पर सरकार को यह जरूर देखना चाहिए कि नए नियमों का पालन हो रहा है या नहीं।

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