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राजपाट : नीकु का मखौल

सूझबूझ के मामले में अव्वल माने जाते हैं नीकु। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उनके करीबी अब उसी तर्ज पर नीकु कहने लगे हैं जैसे नरेंद्र मोदी को उनके समर्थकों ने नमो बनाया।

Author Updated: February 22, 2016 4:00 PM

सूझबूझ के मामले में अव्वल माने जाते हैं नीकु। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उनके करीबी अब उसी तर्ज पर नीकु कहने लगे हैं जैसे नरेंद्र मोदी को उनके समर्थकों ने नमो बनाया। लेकिन सयाने नीकु इन दिनों दुविधा में हैं। दुविधा उनके अपने ही एक फैसले ने बढ़ाई है। वे चाहते हैं कि सांप तो मर जाए पर लाठी न टूटे। लेकिन अपने फैसले को इस तर्ज पर अमल में लाना मुश्किल पड़ रहा है। चुनाव में शराब पर पाबंदी का वादा किया था। सरकार बनने के बाद एलान भी कर दिया कि एक अप्रैल से सूबे में शराब नहीं बिकेगी। पहले फैसला किया था कि देसी शराब पर पाबंदी रहेगी लेकिन अंग्रेजी पर नहीं। सरकार अंग्रेजी शराब खुद बेचेगी। उनके इस फैसले को विरोधाभासी माना जा रहा है। देसी पर पाबंदी और विदेशी की छूट? यह कहां का इंसाफ हुआ। रईस और संपन्न तबका तो अपना शौक मजे से पूरा करे पर गरीब तरस जाए। फिर पाबंदी तो अतीत में भी कई राज्य सरकारों ने लगाई थी। उससे गैरकानूनी शराब की बिक्री ही बढ़ी थी। तमाम पेचीदगियों के मद्देनजर शराब के मसले पर फिर बैठक बुलानी पड़ी। इसमें तय हुआ कि एक आदमी को एक बार में एक बोतल ही बेचेगी जाएगी। पर इसमें भी किंतु-परंतु आ गया। वह एक दुकान से एक बोतल खरीद कर दूसरी बोतल दूसरी दुकान से खरीद लेगा। फिर शराब बंदी के फैसले से अफसरों के चेहरों पर रौनक का राज भी तो जानना चाहिए नीकु को। पाबंदी से कहीं वे अपनी चांदी होते तो नहीं देख रहे। जिन्हें शराब पीने का शौक है या लत है वे तो किसी भी हद तक जाएंगे। एक तरफ उन्हें समझाया-बुझाया जाएगा और दूसरी तरफ शराब की उपलब्धता भी रहेगी। एक साथ दो नाव की सवारी। सुरा प्रेमी ठहाके लगा रहे हैं नीकु की नीति पर।

दूर की कौड़ी
नीकु की तरह बिहार में सुमो भी हैं। भाजपा नेता सुशील मोदी। आजकल बिहार में जंगल राज बताने के बहाने ढूंढ़ रहे हैं। और कोई मुद्दा तो अपने पुराने साथी के खिलाफ फिलहाल मिल नहीं रहा। कह रहे हैं कि नरेंद्र मोदी ने तो चुनाव के दौरान ही आगाह कर दिया था बिहार में भाजपा न जीती तो जंगल राज-2 का दौर शुरू हो जाएगा। उनकी आशंका अब सच साबित हो रही है। सुमो अपराध की तमाम घटनाओं को गिनाते हैं। फिर आंकड़ेबाजी से बताते हैं कि अपराध लगातार बढ़ रहे हैं। सरकार और पुलिस न अपराध रोक पा रहे हैं और न अपराधियों पर उनका कोई अंकुश है। आमतौर पर नीकु विरोधियों के आरोपों का जवाब नहीं देते। पर सुमो के जवाब में उन्होंने तत्परता दिखाई। दावा कर दिया कि अपराध की घटनाओं में पहले से कमी आई है। हालांकि यह सिर्फ दिखावे की बात है। हकीकत तो नीकु भी जानते हैं। तभी तो पुलिस अफसरों की पिछले दिनों बैठक बुलाई थी। अपराध रोकने और अपराधियों के खिलाफ सख्ती बरतने के निर्देश भी दिए। पर सुमो भी हकीकत समझते हैं। उनकी धारणा है कि लालू के सत्ता में रहते अपराध बढ़ेंगे ही। अपराधी खुले घूमेंगे ही। लिहाजा नीतीश की पिछली सरकार और महागठबंधन सरकार के अपराधों व कानून व्यवस्था की तुलना करने से सरकार पर भारी पड़ा जा सकता है। अच्छे विपक्षी नेता की सोच और सूझबूझ ऐसी ही तो होनी चाहिए।

बिहारी राग
बिहारी बाबू को जो भी कहना होता है, डंके की चोट पर कहते हैं। पिछले डेढ़ साल से वे लगातार पार्टी लाइन के विपरीत बोल रहे हैं। जेएनयू छात्र संघ अध्यक्ष कन्हैया की गिरफ्तारी के मामले में भी यही किया। भाजपा के तमाम नेता कन्हैया की लानत-मलानत कर रहे हैं। पर बिहारी बाबू पार्टी के इकलौते नेता ठहरे जिन्होंने कन्हैया की खुलेआम हिमायत की। और तो और उसकी तत्काल रिहाई की मांग भी कर डाली। पार्टी के ज्यादातर नेता बिहारी बाबू के खिलाफ कार्रवाई की मांग करते आ रहे हैं। बिहार के भाजपा नेता इस मामले में ज्यादा मुखर हैं। पर बिहारी बाबू यानी शत्रुघ्न सिन्हा उनकी परवाह क्यों करें? क्यों लोकसभा और पार्टी की सदस्यता से किसी के उकसावे में आकर इस्तीफा दें। अगर पार्टी ने उन्हें शत्रु बना दिया है तो वे भी कसर बाकी क्यों छोड़ें? सियासत के जानकार संकेत दे रहे हैं कि कन्हैया की गिरफ्तारी पर कुछ दिन तो नीतीश और लालू ने चुप्पी ही साधे रखी थी। पांच-छह दिन बाद पहले नीतीश ने और फिर लालू ने कन्हैया के पक्ष में मुंह खोला। बिहारी बाबू ने भी उसके बाद ही न केवल उसकी जमकर हिमायत की बल्कि अपनी पार्टी को भी धता बता दिया। आखिर कन्हैया भी बिहारी ठहरा।

पायलट का पैंतरा
सचिन पायलट राजस्थान में कांग्रेस के सूबेदार हैं। अपनी कार्यकारिणी का विस्तार कर उसे जंबो बना दिया। अचानक 40 से ज्यादा पदाधिकारी और जोड़ दिए। चुनावी साल के बाद सूबे में कांग्रेस सुस्त पड़ी है। पायलट उसमें जान फूंकने के जतन करते रहते हैं। पदाधिकारी बढ़ाने का नया फैसला भी ऐसा ही जतन है। पर पद दिए हैं अपने चहेतों को। साथ ही बीस जिलों के अध्यक्ष भी बदल डाले। एक तरह से पार्टी पर अपनी पकड़ दिखाई है। खुद युवा हैं तो युवाओं को ही तरजीह दे रहे हैं। पार्टी को सड़क पर युवा ही उतार सकते हैं। पुराने नेता तो हवाबाजी से आगे बढ़ ही नहीं पाते। पायलट यही हवा बना रहे हैं कि अगला विधानसभा चुनाव उन्हीं की अगुवाई में लड़ेगी पार्टी। कांग्रेसियों की तो फितरत ही ऐसी है कि चुनाव के वक्त अचानक जोश भर जाता है। सयाने पायलट ने पुराने नेताओं को भी नाराज नहीं किया है। उनकी जगह उनके बेटा-बेटी और भाई-भतीजों को अपनी टीम में लिया है। राहुल गांधी का वरदहस्त है तो फिर डर काहे का। जयपुर का जिलाध्यक्ष प्रताप सिंह खाचरियावास को बना कर गुटबाजी पर विराम लगाया है। भीड़ जुटाने और आंदोलन करने में निपुण हैं खाचरियावास। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को भी संगठन के प्रति समर्पित नेता ही माना जाता है। पर लगता है कि सचिन पायलट को फ्री-हैंड देने के लिए आलाकमान गहलोत की संगठन क्षमता का उपयोग केंद्र में करेगा। यों राष्ट्रीय राजनीति में दखल रखने वाले राजस्थान के पार्टी नेता और भी हैं। सीपी जोशी, गिरिजा व्यास, जितेंद्र सिंह और मोहन प्रकाश आदि। पर रुतबे और जमीनी पकड़ के मामले में गहलोत के मुकाबले सभी बौने हैं। सचिन पायलट के साथ खुल कर कभी गुटबाजी नहीं की। अलबत्ता सूबे की वसुंधरा सरकार की पायलट अगर आलोचना करते हैं तो गहलोत भी उसमें बढ़-चढ़ कर योगदान देते हैं।

वक्त का फेर
दीदी तो दीदी ही ठहरीं। पश्चिम बंगाल की शेरनी कब किस पर मेहरबान हो जाएं और कब किससे निगाहें फेर लें, दूसरा तो क्या वे खुद भी इसे नहीं जानतीं। मुकुल रॉय की मिसाल सामने है। तृणमूल कांग्रेस में ममता बनर्जी के बाद मुकुल रॉय को ही दूसरे नंबर की हैसियत का नेता माना जाता था। दीदी का दायां हाथ भी बताते थे उन्हें करीबी। उनसे सलाह-मशविरा किए बिना कोई अहम फैसला करती भी नहीं थीं दीदी। लेकिन पिछले साल सारदा घोटाले के सिलसिले में सीबीआइ ने मुकुल से पूछताछ क्या की, दीदी की निगाहें टेढ़ी हो गईं। पहले कथित दाएं हाथ से दूरी बनाईं और फिर एक झटके में पार्टी के तमाम पदों से पैदल कर दिया। पर उनका वनवास साल भर में ही खत्म हो गया। विधानसभा चुनाव के मद्देनजर दीदी ने उन्हें फिर पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया। इतना ही नहीं अहमियत भी बढ़ा दी अचानक उनकी। तभी तो चुनाव आयोग से दिल्ली में मुलाकात करने वाले पार्टी के पांच सदस्यीय प्रतिनिधि मंडल में मुकुल भी नजर आए। फरमाया भी कि दीदी जो भी जिम्मेवारी देंगी, उसका निष्ठापूर्वक निर्वाह करेंगे। फिलहाल लक्ष्य विधानसभा चुनाव में पार्टी को 250 सीटें दिलाने का है। राज्यसभा के सदस्य तो हैं ही। पहले पार्टी में महासचिव थे तो अब उपाध्यक्ष हो गए हैं। रुतबे और कद की धमाकेदार वापसी से तृणमूल कांग्रेस का एक खेमा उत्साहित है तो एक व्यथित है। मुकुल की जगह लेने की तिकड़म भिड़ा रहे नेताओं की व्यथा वाजिब ही मानी जाएगी।

गुटबाजी की बीमारी
विधानसभा चुनाव में अब ज्यादा वक्त नहीं बचा है। एक साल बाद हो जाएंगे उत्तराखंड में विधानसभा चुनाव। लेकिन चुनाव से पहले भी भाजपा संभलने को तैयार नहीं। उलटे पार्टी की गत लगातार बिगड़ रही है। गुटबाजी की बीमारी घटने की बजाए बढ़ रही है। रामनगर में पार्टी के शिखर नेतृत्व ने दो दिन तक माथा-पच्ची की। लेकिन विधायक दल के नेता का फैसला नहीं हो पाया। अमित शाह ने भगत सिंह कोश्यारी के प्रभाव में अजय भट्ट को पार्टी का सूबेदार बना दिया था। जबकि वे विधायक दल के नेता थे। तीरथ सिंह रावत की सूबेदारी छिनी तो उनके आका रमेश पोखरियाल निशंक और भुवनचंद खंड़ूड़ी को झटका लगा। लिहाजा वे अब तीरथ सिंह को विधायक दल का नेता बनाने की जिद पकड़े हैं। दलील दी है कि गढ़वाल के राजपूत मतदाताओं को पार्टी से जोड़े रखने के लिए यह जरूरी है। उधर, पार्टी के मैदानी नेता भी विधायक दल के नेता पद का दावा कर रहे हैं। खासकर हरबंस कपूर और मदन कौशिक। पर कौशिक के मामले में जातीय समीकरण बाधा है। अजय भट्ट के सूबेदार रहते विधायक दल का नेता पार्टी किसी ब्राह्मण को बनाएगी ही नहीं। फिर कौशिक भी तो आजकल कोश्यिारी का दामन पकड़े हैं। कपूर को यह कुर्सी सौंपने में वैसे तो कोई अड़चन नहीं पर हरीश रावत के पक्ष में राजपूत मतदाताओं के ध्रुवीकरण का खतरा लगता है। इस ऊहापोह में तो बाजी तीरथ सिंह रावत ही मार सकते हैं। मदन कौशिक का वैसे भी गुटबाजी के चलते विरोध ज्यादा है। स्वामी यतिश्वरानंद, आदेश चौहान और संजय गुप्त भी कौशिक के जिले हरिद्वार से नाता रखते हैं। तीनों ही विधायक ठहरे। पर कौशिक से कतई नहीं पटती इनकी। वे तो खुल कर विरोध कर रहे हैं। नतीजतन पार्टी में अनुशासन के चीथड़े हो गए हैं। आला कमान भी तो फैसले में बेजा देरी कर अपनी कमजोरी ही दिखा रहा है। न अजय भट्ट अपनी टीम बना पाए हैं और न विधायक दल का नेता ही तय कर पा रही है पार्टी। फूट की शिकार पार्टी के नेता पता नहीं किस आधार पर अगले साल सूबे में सत्ता के वरण का ख्वाब देख रहे हैं।

बेबात बतंगड़
भारत और पाकिस्तान के बीच धर्मशाला में होने वाले क्रिकेट के बीसम-बीस मैच को लेकर विवाद छिड़ गया है। मुख्यमंत्री वीरभद्र सिंह ही नहीं भाजपा के धुरंधर शांता कुमार भी नहीं चाहते कि मैच हो। उन्हें लगता है कि इससे शहीदों का अपमान होगा। करगिल की लड़ाई में शहीद हुए भारतीय सैनिकों में कई कांगड़ा के थे। यहां तक कि पठानकोट के शहीदों में भी दो का नाता हिमाचल से ही था। लिहाजा मैच रद्द कराने के लिए इसे भावनात्मक मुद्दा बनाया जा रहा है। वैसे भी मैच हुआ तो श्रेय पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल और बीसीसीआइ से जुड़े उनके सांसद बेटे अनुराग ठाकुर ले जाएंगे। हिमाचल क्रिकेट एसोसिएशन के सरताज हैं अनुराग। मैच के लिए 19 मार्च की तारीख तय है। पठानकोट के हमले के बाद पाकिस्तान के साथ मैच नहीं कराने की दलील देने वालों को मैच समर्थकों का जवाब है कि दक्षिण अफ्रीका में क्रिकेट मैच वहां की सरकार ने तब भी नहीं टाला था जबकि स्टेडियम के बाहर आतंकवादी गोली-बारी कर रहे थे। वहां की सरकार का नजरिया दूसरा था। यही कि मैच को रोका तो आतंकियों के हौसले बुंलद होंगे। पर वोट की सियासत खेल की अहमियत पर हावी होने वाली है। हो भी क्यों न। कांगड़ा जिले के तकरीबन हर परिवार से कोई न कोई सेना में है। शहादत में भी यह इलाका आगे रहा है। यह बात अलग है कि मैच हुआ तो बेशक सूबे में पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा।

नींद उड़ी
वीरभद्र के लिए खतरा बढ़ गया है। हिमाचल के मुख्यमंत्री के खिलाफ सीबीआइ घोषित आय से ज्यादा संपत्ति रखने का मामला बना चुकी है। पर उनकी गिरफ्तारी दिल्ली हाईकोर्ट में जारी जंग के चलते लटकी है। खतरा बढ़ने का कारण तीन लोगों की सीबीआइ द्वारा की गई गिरफ्तारी है। दो को झारखंड और चंडीगढ़ से पकड़ा। ये उन आढ़तियों के कारिंदे हैं जिनके माध्यम से वीरभद्र ने अपने सेबों की बिक्री का दावा किया है। डर यह है कि कहीं वीरभद्र का सह-आरोपी मुसीबत से बचने के चक्कर में सीबीआइ का गवाह न बन जाए। हिमाचल के भाजपा नेताओं की पिछले दिनों दिल्ली में अमित शाह के साथ मंत्रणा हुई थी। ताजा गिरफ्तारियों को उसी बैठक से जोड़ कर देखा जा रहा है। हालांकि अटकलें तो तमाम तरह की लगतीं रही हैं। मसलन, पिछले दिनों वीरभद्र और धूमल के बीच गुप्त समझौते की हवा उड़ी थी। वीरभद्र दिल्ली में प्रधानमंत्री से मिले भी थे। लगा था कि केंद्रीय एजंसियों की जांच की रफ्तार मंद हुई है। पर सीबीआइ की ताजा सक्रियता ने वीरभद्र की बेचैनी बढ़ा दी है। खतरा मंडराया भी तो विधानसभा के बजट सत्र के मौके पर है।

नूरा-कुश्ती
राजनीति में सारे खेल खुल्लम-खुल्ला नहीं होते। सामने दिखाई न पड़ने और परदे के पीछे खेले जाने वाले खेलों की भूमिका भी कम नहीं होती। रालोद के मुखिया अजित सिंह को ऐसे खेल खेलने में महारत हासिल है। तभी तो जनाधार न होते हुए भी मुजफ्फरनगर विधानसभा की सामान्य सीट से एक पिछड़ी महिला को उपचुनाव में उम्मीदवार बना दिया। समर्थकों को तो यही बताया कि इस बहाने परीक्षण हो जाएगा कि लोकसभा चुनाव में रूठ गए जाट वापस आए हैं या नहीं। जाटों, दलितों और अति पिछड़ों के लामबंद हो जाने का दावा कर रहे थे। पर चौदह हजार से आगे नहीं बढ़ पाई उनकी उम्मीदवार मिथलेश पाल। जो सीट पिछली बार सपा ने जीती थी। वह अजित की तिकड़मों के बावजूद भाजपा ने छीन ली। चर्चा है कि सपा के गौरव स्वरूप ने अजित और उनकी उम्मीदवार दोनों को ही अपनी भारी भरकम भेंट से यह सोचकर खुश किया था कि इससे भाजपा के वोट कटेंगे और वे जीत जाएंगे। पर अजित को पहले ही कई बार आजमा चुके इलाके के जाट उनके बहकावे में आए ही नहीं। खुलकर भाजपा का साथ दिया। सार्वजनिक रूप से सपा की लानत-मलानत और परदे के पीछे मिली भगत कर नूरा-कुश्ती के अजित के खेल का पर्दाफाश कर दिया उपचुनाव के नतीजे ने।

सियासी हथकंडा
दिल्ली के जेएनयू विवाद की लपटें मध्य प्रदेश के सियासी गलियारों तक जा पहुंची है। शनिवार को दो बड़ी पार्टियों ने अपने प्रदर्शनों का एलान किया। भाजपा के सूबेदार नंद कुमार सिंह चौहान ने फरमाया कि राष्ट्र विरोधी नारे उनकी पार्टी कतई बर्दाश्त नहीं करेगी। लिहाजा ऐसे नारेबाजों का राहुल गांधी द्वारा समर्थन किए जाने पर पार्टी अपनी सफाई दे। एक ही दिन सूबे के चौदह शहरों में पार्टी के नेताओं ने एक साथ प्रेस कांफ्रेंस कर अपना विरोध जताया। रविवार को सूबे में धिक्कार दिवस भी मनाया। कांग्रेस इसका जवाब सोमवार को संघवाद से मुक्ति दिवस मना कर देगी। पार्टी के सूबेदार अरुण यादव इंदौर के संघ कार्यालय पहुंच कर तिरंगा फहराएंगे। शनिवार को पार्टी प्रवक्ता केके मिश्र ने भाजपा पर सरकारी संस्थाओं के संघीकरण का आरोप लगाया। देशद्रोह और राष्ट्रवाद के बीच छिड़ी बहस के दौरान सियासी रोटियां सेंकने की होड़ दिख रही है। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने तो राहुल गांधी को ही आतंकी बता दिया। राहुल के डीएनए टेस्ट की मांग तक कर डाली। अरुण यादव ने इस बयान को संघ का साजिश बता दिया। रामेश्वर के डीएनए टेस्ट की मांग से पलटवार किया। मध्य प्रदेश से नाता रखने वाले जेएनयू के पूर्व छात्रों ने अलग सक्रियता दिखाई। शनिवार को सांसद भागीरथ प्रसाद ने इस मंच से दावा किया कि देश विरोधी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। भाजपा के थावरचंद गहलौत और नरोत्तम मिश्र जैसे कद्दावर नेता भी शिक्षा परिसरों को राष्ट्रविरोधी गतिविधियों का अड्डा बनने से रोकने की मांग करते नजर आए। नेताओं को तो हर मामले में सियासत ही नजर आती है। उन्हें पढ़ाई-लिखाई से क्या लेना-देना।

असली चेहरा
अपनी क्षेत्र विकास निधि बढ़वाने के लिए तो विधायक और सांसद सनातन बेचैनी दिखाते हैं। पर पैसा उपलब्ध होते हुए भी उसे विकास कार्यों में समय रहते खर्च करना जरूरी नहीं समझते। मध्य प्रदेश के 230 विधायकों ने तो इस मामले में सीमाएं तोड़ दी। चालू वित्तीय वर्ष के लिए मिली राशि का साढ़े दस महीने में दस फीसद भी खर्च नहीं किया। जनता के प्रति उनकी उदासीनता का इससे पुख्ता प्रमाण और क्या हो सकता है? मियाद खत्म होने में 40 दिन भी नहीं बचे। आखिरी वक्त पर चाहे जितनी आपा-धापी कर लें, निधि तो खर्च कर नहीं पाएंगे। पिछले साल भी सात करोड़ से ज्यादा रकम इसी काहिली से लैप्स हुई थी। विशेष परिस्थिति में विधायकों की मांग के मद्देनजर तीसरे अनुपूरक बजट में उसे शामिल किया था सरकार ने। लेकिन सबक तो फिर भी नहीं सीखा माननीयों ने।

बीरबल की खिचड़ी
जम्मू-कश्मीर में सरकार के गठन का मामला खटाई में पड़ गया है। हालांकि खबरें दोनों तरह की आ रही हैं। नकारात्मक भी और आशा जगाने वाली भी। मसलन, कोई कह रहा है कि जल्द दिल्ली में अमित शाह से मिलेंगी महबूबा मुफ्ती। पीडीपी के लोग दावा कर रहे हैं कि महबूबा के दबाव में तीनों मांगों को मानने का मन बेशक अनमने ही क्यों न सही, बना चुकी है भाजपा। श्रीनगर में अलबत्ता राम माधव और महबूबा के बीच हुई बातचीत का तो कोई नतीजा दिखा नहीं। अवरोध अफ्सपा कानून बन रहा है। महबूबा सुरक्षा बल विशेषाधिकार कानून को हटवाने की जिद पकड़े हैं। दरअसल जेएनयू विवाद में कश्मीरी छात्रों पर मामले दर्ज होने से महबूबा दबाव में आ गई हैं। घाटी में भाजपा के खिलाफ भड़के गुस्से का खमियाजा महबूबा को भी भुगतना पड़ सकता है। उमर अब्दुल्ला ने दिल्ली पुलिस की आलोचना कर आग में घी पहले ही डाल दिया। जाहिर है कि ऐसे माहौल में हड़बड़ी में गठबंधन सरकार बनाने का उतावलापन नहीं दिखाना चाहेंगी महबूबा।

सिद्ध सिद्धू
नवजोत सिंह सिद्धू के बारे में हर दिन नई-नई बातें सुनाई पड़ रही हैं। तीन बार अमृतसर से सांसद रहे सिद्धू का टिकट पिछले चुनाव में अरुण जेटली को दे दिया गया था। पर वे कांग्रेस के कैप्टन अमरिंदर से हार गए। अब चर्चा गरम है कि सिद्धू अरविंद केजरीवाल की पार्टी में जाने वाले हैं। बादल सरकार में मंत्री जैसा ओहदा संभाल रहीं उनकी पत्नी नवजोत कौर भी उन्हीं की राह चलेंगी, इसमें किसी को संदेह नहीं। अरविंद केजरीवाल से बात भी हो चुकी है। हां, सही वक्त का इंतजार हो रहा है। अकाली दल से भाजपा के गठबंधन का शुरू से विरोध करते रहे हैं सिद्धू। पर आलाकमान ने तवज्जो नहीं दी। बेशक पार्टी के कुछ नेता सिद्धू की जड़ों में मट्ठा डाल रहे हैं। सिद्धू पर डोरे कांग्रेस भी डाल रही है। पर वे खुद आप को बेहतर विकल्प के तौर पर देख रहे हैं। आम आदमी पार्टी के पास भी सिद्धू जैसे कद्दावर चेहरे का फिलहाल तो टोटा है ही।

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