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मु्द्दा: विशेषज्ञों की विशेषज्ञता!

स्वच्छंदतावादी और छायावादी कवियों में कोई अंतर नहीं है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा इस धारा के प्रमुख कवि हैं। इन्हें स्वच्छंदतावादी कवि कहें या छायावादी!

Author Published on: March 22, 2020 1:03 AM
प्रतियोगी परीक्षा में शामिल छात्र।

अमरनाथ
देश के विश्वविद्यालयों में शिक्षकों के चयन के लिए एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा ‘नेट’ यानी ‘राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा’ उत्तीर्ण करना अनिवार्य है। यह परीक्षा प्रतिवर्ष दो बार (जून और दिसंबर) में एनटीए (नेशनल टेस्टिंग एजेंसी) द्वारा आयोजित की जाती है और इसका पाठ्यक्रम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अपने विशेषज्ञों के सहयोग से तैयार करता है। देश की सर्वाधिक प्रतिष्ठित इस परीक्षा के लिए यूजीसी ने हिंदी का जो नया पाठ्यक्रम तैयार किया है वह हमें चौंकाता है।

यह पाठ्यक्रम कुल दस इकाइयों में विभक्त है। इनमें से प्रत्येक इकाई पर समान अंक निर्धारित हैं। परीक्षार्थियों से दो-दो अंकों के कुल सौ प्रश्न यानी दो सौ अंकों के वस्तुनिष्ठ प्रश्न पूछे जाएंगे। इनमें से अंतिम दस प्रश्न दिए गए अवतरणों पर केंद्रित होंगे और बाकी अस्सी प्रश्न निर्धारित पाठ्यक्रम पर। तात्पर्य यह कि प्रत्येक इकाई से आठ प्रश्न पूछे जाने की संभावना है।

सबसे पहले पाठ्यक्रम की वे भूलें, जिन्हें विशेषज्ञों की असावधानी कहा जा सकता है, अल्पज्ञता नहीं। क्योंकि इस स्तर की परीक्षा का पाठ्यक्रम तैयार करने वाले विशेषज्ञ इतने अल्पज्ञ नहीं हो सकते। इकाई पांच में ‘घनानंद कवित्त’ के संपादक का नाम ‘विश्वनाथ मिश्र’ छपा हुआ है, जबकि उनका नाम ‘विश्वनाथ प्रसाद मिश्र’ है। ‘द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्र’ शीर्षक कविता को महादेवी वर्मा की कविताओं में सम्मिलित किया गया है, जबकि यह कविता सुमित्रानंदन पंत की है। इकाई आठ नाटकों पर केंद्रित है, जिसमें मन्नू भंडारी का ‘महाभोज’ रखा गया है।

‘महाभोज’ मन्नू भंडारी का उपन्यास है, न कि नाटक। इकाई नौ निबंधों पर केंद्रित है, जिसमें बालकृष्ण भट्ट का निबंध संग्रह ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ रखा गया है, जबकि ‘शिवशंभु के चिट्ठे’ शीर्षक निबंध संग्रह के वास्तविक रचनाकार बाल मुकुंद गुप्त हैं और अंतिम इकाई दस में मुक्तिबोध की पुस्तक ‘एक लेखक की डायरी’ रखी गई है, जबकि उनकी पुस्तक का वास्तविक नाम ‘एक साहित्यिक की डायरी’ है।

इनके अलावा अन्य अनेक छोटी-छोटी गलतियां हैं, जिन्हें प्रूफ की गलतियां मान कर छोड़ा जा सकता है। हां, इकाई सात में कहानियां हैं, जिनमें अज्ञेय की कहानी ‘गैंग्रीन’ रखी गई है। यह सही है कि यह कहानी ‘गैंग्रीन’ नाम से ही पहले छपी थी, पर कहानी की मूल संवेदना को अधिक प्रखरता से उभारने के लिए स्वयं अज्ञेय ने बाद में इसका शीर्षक बदल कर ‘रोज’ कर दिया था। निस्संदेह यही शीर्षक कहानी की मूल संवेदना का वाहक है और विशेषज्ञों से अपेक्षा थी कि वे विषय से जुड़े तथ्य समझते और ‘गैंग्रीन’ की जगह ‘रोज’ लिखते।

इकाई दो ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ है। इसमें ‘स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि’ का अध्ययन प्रस्तावित है, पर इसके ठीक बाद में ‘छायावादी काव्य की प्रमुख विशेषताएं, छायावाद के प्रमुख कवि’ रखा गया है। स्वच्छंदतावाद (रोमैंटिसिज्म) पश्चिम का एक प्रसिद्ध काव्यांदोलन है, जिसका व्यापक प्रभाव हिंदी के छायावादी काव्य पर पड़ा है। और इसी के कारण कुछ आलोचकों तथा इतिहासकारों ने ‘छायावाद’ की जगह इसे ‘स्वच्छंदतावाद’ कहा है। ऐसी दशा में स्वच्छंदतावादी और छायावादी कवियों में कोई अंतर नहीं है। जयशंकर प्रसाद, सुमित्रानंदन पंत, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और महादेवी वर्मा इस धारा के प्रमुख कवि हैं। इन्हें स्वच्छंदतावादी कवि कहें या छायावादी! ऐसी दशा में ‘स्वच्छंदतावाद और उसके प्रमुख कवि’ के साथ दुबारा ‘छायावाद के प्रमुख कवि’ के अध्ययन का प्रस्ताव भ्रामक भी है और अल्पज्ञता का सूचक भी।

क्या आचार्य रामचंद्र शुक्ल, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, आचार्य नंददुलारे वाजपेयी, रामविलास शर्मा और नामवर सिंह के आलोचना कर्म को समझे बिना हिंदी साहित्य को समझा जा सकता है? देखकर आश्चर्य होता है कि इस पूरे पाठ्यक्रम से इन महान आलोचकों के आलोचना कर्म को हटा दिया गया हैं। ‘हिंदी साहित्य का इतिहास’ शीर्षक दूसरी इकाई का ही परवर्ती आधा हिस्सा ‘हिंदी साहित्य की गद्य विधाएं’ शीर्षक से है, जिसमें हिंदी उपन्यास, हिंदी कहानी, हिंदी नाटक और हिंदी निबंध के साथ अंत में ‘हिंदी आलोचना’ का उल्लेख है।

इसमें ‘हिंदी आलोचना का उद्भव और विकास, समकालीन हिंदी आलोचना और उसके विविध प्रकार, प्रमुख आलोचक’ रखा गया है, मगर वास्तविकता यह है कि आलोचना का यह निर्धारित अंश, पाठ्यक्रम को देखते हुए इतना कम है कि इस पर अधिक से अधिक दो अंक का एक प्रश्न ही बन सकता है। यहां उल्लेखनीय यह है कि इस पाठ्यक्रम में उपन्यास, कहानी, नाटक और निबंध पर क्रमश: छठी, सातवीं, आठवीं और नौवीं अलग-अलग इकाइयां हैं, जिन्हें दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के उक्त अंशों को पढ़े बगैर समझ पाना असंभव है। ऐसी दशा में, दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के अंशों को छठीं, सातवीं, आठवी और नौवीं की भूमिका के रूप में शामिल किया जा सकता था और इस तरह दूसरी इकाई के उत्तरार्ध के आलोचना साहित्य को समुचित विस्तार दिया जा सकता था। विशेषज्ञों का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया?

इसी तरह, इस पाठ्यक्रम में मार्क्सवाद, स्त्री विमर्श, दलित विमर्श तथा आदिवासी विमर्श को इकाई चार के अंतिम हिस्से में जितनी जगह दी गई है, उसके आधार पर दो सौ अंकों के प्रश्नपत्र में इन सबके लिए सिर्फ दो अंकों का एक प्रश्न बनता है। ‘वैचारिक पृष्ठभूमि’ शीर्षक इस इकाई के अंतिम अंश के रूप में मार्क्सवाद, मनोविश्लेषणवाद, अस्तित्ववाद, उत्तर-आधुनिकतावाद, अस्मितामूलक विमर्श (दलित, स्त्री, आदिवासी और अल्पसंख्यक) को एक ही साथ रखा गया है। स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श आज हिंदी में अध्ययन के प्रमुख विषय हैं। इनके महत्त्व को रेखांकित करते हुए ही अनेक विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों में इन्हें स्वतंत्र प्रश्नपत्रों के रूप में रखा गया है। इन सबको पाठ्यक्रम से इस तरह बाहर कर देना कहां तक उचित है?

यह ठीक है कि आज सत्ता में बैठे लोगों को मार्क्सवाद से परहेज है, पर हिंदी के प्रगतिशील साहित्य को बिना मार्क्सवाद को पढ़े, भला कैसे समझा जा सकता है? वैसे, किसी भी अवधारणा को खारिज करने लिए उसे पहले जानना और समझना पड़ता है। मार्क्सवाद का अध्ययन इतना तो किया ही जाना चाहिए कि हमारे भीतर उसे खारिज करने की समझ विकसित हो सके। इसी हिस्से में ‘अल्पसंख्यक विमर्श’ भी रखा गया है, जबकि अभी हिंदी में ‘अल्पसंख्यक विमर्श’ जैसी अवधारणा इस स्तर की विकसित नहीं हुई है कि इसे पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके। इस विषय पर कोई उल्लेखनीय पुस्तक भी देखने को नहीं मिली। इसी इकाई में ‘लोहिया दर्शन’ और ‘आंबेडकर दर्शन’ के साथ ‘गांधीवादी दर्शन’ रखा गया है। ‘गांधीवादी दर्शन’ को भी क्या ‘गांधी-दर्शन’ नहीं कहा जाता है?

पाठ्यक्रम में विभिन्न इकाइयों के बीच परिमाणगत अंतर देख कर आश्चर्य होता है। ‘हिंदी उपन्यास’ शीर्षक इकाई छह में जहां ‘झूठा सच’, ‘राग दरबारी’, ‘जिंदगीनामा’ जैसे बड़े-बड़े तेरह उपन्यास हैं, वहीं ‘हिंदी कहानी’ शीर्षक इकाई सात में सिर्फ सत्रह कहानियां हैं, जिन्हें अगर एक जगह संकलित कर दिया जाए तो एक उपन्यास के आधे भर की सामग्री होगी। इसी तरह ‘हिंदी निबंध’ शीर्षक इकाई नौ में जहां सिर्फ दस निबंध रखे गए हैं, वहीं ‘आत्मकथा, जीवनी तथा अन्य गद्य विधाएं’ शीर्षक इकाई दस में चौदह मोटे-मोटे ग्रंथ, जिनमें दिनकर की ‘संस्कृति के चार अध्याय’ भी शामिल है। अलग-अलग इकाइयों की पाठ्य सामग्री में इतना अंतर!

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