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बेबाक बोलः समर शेष- अगस्ता की उड़ान, आरोपों का विमान

रक्षा सौदों से जुड़ी असुरक्षा किसी भी देश के लिए रक्षा सौदे बहुत अहम होते हैं। देश की जरूरतों के अनुसार रक्षा सौदे तय करना सैन्य पेशेवरों के लिए आसान नहीं होता। बहुत से ऐसे देश हैं जो रक्षा सौदों को लेकर असुविधाजनक हालात का सामना कर चुके हैं। भारत में बोफर्स घोटाले के बाद रक्षा दलालों पर सालों तक प्रतिबंध लगा रहा था। 2003 में आई एक रिपोर्ट में दलालों को वैध करने और दलाली प्रक्रिया को पारदर्शी बनाने की सिफारिश की गई थी। लेकिन इसके बाद भी किसी दलाल ने सरकार के पास रजिस्ट्रेशन नहीं कराया था। हथियार सौदों की पेचीदगियों से निपटने के लिए मौजूदा राजग सरकार रक्षा सौदों में दलाली को वैध बनाने की सिफारिश कर इसे कानूनी जामा पहनाने की तैयारी कर रही है। इसके तहत सरकार ने प्रस्ताव दिया था कि मध्यस्थों के नामों को सार्वजनिक करना होगा और उनके कमीशन को मोलभाव के नतीजों से नहीं जोड़ा जा सकेगा। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर ने कहा था कि रक्षा दलाल कंपनियों की बैठक में शामिल हो सकते हैं। हालांकि विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि भारतीय तंत्र इतना परिपक्व नहीं है कि यहां दलाली को वैध करार दिया जाए।

पिछले संसद सत्रों में विपक्ष के आरोपों से घिरी सरकार ने मौजूदा सत्र में सुब्रमण्यम स्वामी और अगस्ता हेलिकॉप्टर के साथ विपक्ष पर करारा पलटवार किया। रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर की ‘अदृश्य हाथ’ की संवाद अदायगी पर नरेंद्र मोदी इतने मोहित हुए कि संसद में दिया उनका पूरा भाषण सोशल मीडिया पर साझा किया। अपने दो साल पूरे कर रही राजग सरकार अगस्ता के सहारे कितनी उड़ान भर पाएगी यह तो वक्त बताएगा क्योंकि इतालवी अदालत के जज कह चुके हैं कि भारतीय नेताओं के खिलाफ शंकाएं हैं, सबूत नहीं। खुद पर हमले को लोकतंत्र पर हमला बता कर कांग्रेस संसद से सड़क तक शक्ति प्रदर्शन कर रही है। सत्ता और विपक्ष के आरोपों की प्रतियोगिता की जज बनेगी उन पांच राज्यों की जनता जिन्होंने वोट डाले हैं। ‘पंच परमेश्वर’ के फैसले से पहले सत्ता और विपक्ष के टकराव पर पढ़ें बेबाक बोल।

शुक्रिया सुब्रमण्यम स्वामी! यह तय है कि सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के सभी विद्वतजन इस समय करबद्ध यही कह रहे होंगे। केंद्र में 336 के जादुई आंकड़े के साथ पार्टी और संगठन (कृपया संघ पढ़ें) के सर्वशक्तिमान नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार की कमियों और कमजोरियों को छिपाने के लिए स्वामी ने राज्यसभा में अपने मनोनयन का सिला लगभग हाथ के हाथ ही चुका दिया। वरना समूचा देश कर्मचारी भविष्यनिधि के मुद्दे पर सरकार के एक के बाद एक तीन यू-टर्न लेने पर या तो इसके वित्तीय प्रबंधन, अविवेक या साहसिक फैसलों को लागू करने की हिचक पर विचार कर रहा होता। लेकिन स्वामी ने मुद्दों पर घिरी सरकार को प्रमुख विरोधी कांग्रेस को कोने में धकेलने का नायाब नुस्खा दे दिया। पुरानी शराब को नई बोतल में डाल कर मुद्दा पेश किया और अपने परिचित आक्रामक अंदाज में हमलावर हो गए।
जनता को बदलाव की उम्मीदों का सपना दिखा तटस्थ हो गए। जिन मुद्दों पर जंग छेड़ने का एलान था, उसे जुमला बता चुप्पी साध गए। परिवर्तन के रास्तों पर बैठे पहरेदारों के आगे हथियार डाल दिए। खैर, जब इनका ‘अपराध’ सामने आएगा तो आएगा ही। फिलहाल सरकार के अनिर्णय और अपने ही निर्णयों पर डावांडोल होने की क्षमता का कोई सानी नहीं। मार्च में कर्मचारी भविष्यनिधि से पैसे निकालने पर यू-टर्न, फिर 57 वर्ष से पहले पीएफ में से पैसे निकालने संबंधी अधिसूचना की वापसी और अब पीएफ पर ब्याज की दर को वित्त विभाग की ओर से पहले 8.7 और फिर बढ़ा कर 8.8 फीसद करना। देश के लाखों कर्मचारियों से जुड़े फैसले लेने में सरकार ऐसी लापरवाही कैसे कर सकती है? कहीं सत्ता में बैठे कुछ आला नेताओं को यह कांग्रेसनुमा वहम तो नहीं कि संख्या के बल पर वे कुछ भी कर सकते हैं! और अगर संसद में आजादी के बाद की अपनी संख्या के सबसे निचली सतह पर पहुंची कांग्रेस के 44 सांसदों ने जिस तरह से सरकार की नाक में दम किया है, उसके बावजूद अगर भाजपा को लगता है कि संख्या ही सब कुछ है तो यह ‘हवामहल’ की परिकल्पना से आगे कुछ भी नहीं है।

देश की अर्थव्यवस्था को संबल प्रदान करने के लिए सरकार अपने गठन के बाद से ही जीएसटी विधेयक पास करवाना चाहती है। लेकिन अब तक हुआ क्या? सेना के अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टरों की खरीद में हुए घोटाले को एक बार फिर से राजनीति के केंद्र में लाकर सुब्रमण्यम स्वामी ने राज्यों में लगातार पिछड़ती जा रही भाजपा को सहारा देने की कोशिश की। अब देखना है कि यह मुद्दा भाजपा को सहारा देने की दिशा में साधे गए अपने मकसद में कामयाब होता भी है या फिर पहले से गिरी पड़ी कांग्रेस को महज एक और धक्का भर दे पाता है।

इसका नकारात्मक पहलू तो हासिल हो भी गया है, लेकिन सकारात्मक नतीजे के लिए पांच राज्यों में चुनाव परिणामों का इंतजार करना होगा। यह बात तय हो चुकी है कि अगस्ता वेस्टलैंड हेलिकॉप्टर खरीद मुद्दे पर इटली के जांचकर्ताओं और अदालत ने रिश्वतखोरी की बात मानी है। इस सौदे में दलालों का अस्तित्व भी ‘स्वीकार्य’ है। आरोप है कि इस मामले में भारतीय मीडिया का प्रबंधन करने के लिए भी 50 करोड़ रुपए की रकम दी गई। सरकार को इन सबका इल्म है। फैसले में ‘सिग्नोरा’ और ‘एपी’ का जिक्र है, जिसे सोनिया गांधी और अहमद पटेल से जोड़ा जा रहा है। आरोप-प्रत्यारोपों की बाढ़ है।

यह मामला देश की सुरक्षा से जुड़ा है। हर नागरिक चाहता है कि इसकी सच्चाई जगजाहिर हो। पैसा चाहे राजनीतिकों को, दलालों को या पत्रकारों को गया हो। गया कहां इसका खुलासा जरूर होना चाहिए। दोषियों को दंडित भी किया जाना चाहिए। लेकिन क्या सरकार के पास यह सब करने की इच्छाशक्ति है? जो सरकार अपने फैसलों पर ही अडिग नहीं है, क्या वह ऐसी साहसिक कोशिश भी कर सकती है? ऐसा न हो कि यह मामला भी एक और समिति की फाइलों में ही दब कर रह जाए!

सच यह है कि अभी तक इस मामले की इटली में हुई जांच और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान ठोस नाम उभर कर सामने नहीं आए हैं। सिर्फ एक सूची है, जिसमें लगभग सांकेतिक भाषा में ‘पैसों’ या कहें रिश्वत की रकम का विवरण है। असल परीक्षा उन नामों को बेनकाब करने की है, जिन पर सबकी नजर है। ऐसे में जाहिर है कि इटली में फैसले तक पहुंच जाने के बाद भी इस मामले में जांच और इसके नए पहलुओं के सामने आने की संभावना है। मुश्किल यह भी है कि यह मामला अपने ही देश तक महदूद नहीं है। इससे एक दूसरे देश के सहयोग की दरकार होगी, जिसे यह साबित करना होगा कि रिश्वतखोरी के इस संगीन मामले में असल गुनहगार कौन है! पहले यह तय हो, तभी उनकी जवाबदेही और सजा भी तय होगी।

भारतीय जनता पार्टी के साथ मसला राजनीतिक तौर पर सिर्फ कांग्रेस का नहीं है, बल्कि अपने सहयोगियों का भी है। कांग्रेस ने जहां सहयोगियों में अपना आधार और वोट बैंक में अपना हिस्सा बढ़ाया है, वहीं भाजपा को अपने ही सहयोगियों का आक्रमण झेलना पड़ रहा है। पाकिस्तान के प्रति मौजूदा सरकार की ढुलमुल नीति के कारण शिवसेना आए दिन सरकार पर आंखें तरेरती रहती है। पंजाब में अकाली दल के साथ कभी भी सब कुछ ठीक नहीं रहता। अकाली सरकार को दिन-रात गाली देने वाले क्रिकेटर नवजोत सिंह सिद्धू को राज्यसभा में लेकर सरकार ने अकालियों के साथ ठीकठाक संबंध होने की अपनी संभावना को भी साफ कर दिया है। ऐसे में जब अरविंद केजरीवाल की अगुआई में आम आदमी पार्टी पंजाब में अपनी जड़ें गहरी कर रही है, अकालियों को नजरअंदाज करना कोई कम जोखिम भरा काम नहीं। ऐसा लगता है कि भाजपा अमृतसर में वित्त मंत्री अरुण जेटली की शर्मनाक हार को बहुत जल्द भूल गई है।

पांच राज्यों के चुनाव के बाद अब अगला चुनाव अगले ही साल उत्तर प्रदेश के साथ पंजाब में भी है। पंजाब इकाई पर हरियाणा में भाजपा की अप्रत्याशित जीत के बाद अकेले चुनाव लड़ने का भूत सवार हो गया था, लेकिन ‘आप’ ने जिस तरह से पंजाब में लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है, ऐसे में देखना होगा कि भाजपा आत्मघात के लिए कितनी तैयार है। ध्यान रहे, हरियाणा में आजादी के बाद पहली बार बनी भाजपा की सरकार देश में मोदी लहर का बचा-खुचा असर ही थी। इसके बाद दिल्ली और फिर बिहार तक आते-आते इस आंधी की धूल पूरी तरह बैठ चुकी थी। अब अगला चरण उत्तर प्रदेश और पंजाब के नतीजों से ही तय होना है, क्योंकि मौजूदा ‘पंच परमेश्वर’ से इस आंधी की पुनरावृत्ति की उम्मीद मृगमरीचिका को छू लेने की चाहत जैसी है।

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल में वामपंथियों के साथ हाथ मिला कर कांग्रेस ने अपनी बरसों पुरानी जिस दुश्मनी को दफन किया है, उसके परिणाम पर भी बहुत कुछ निर्भर करेगा। राजनीति के हाशिए में भी लगभग कोने में धकेली जा रही कांग्रेस ‘साम दाम दंड भेद’ अपना कर अपनी जगह तलाशने का संघर्ष कर रही है। अपनी इस कोशिश में पार्टी कितनी कामयाब होगी, यह चुनाव परिणामों के साथ ही लोगों के सामने आ जाएगा। लेकिन सच यह है कि इससे पहले कांग्रेस ‘बौद्धिक विचार’ के लिए वामपंथियों पर पूरी तरह आश्रित थी। फिर भी उसका राजनीतिक संबंध सतही ही रहा। लेकिन इस बार हवा कुछ और है। शायद इसलिए भी कि ‘पुरस्कार वापसी’ अभियान के बाद दोनों के आपसी संबंध सामने आ गए थे। चूंकि कांग्रेस के पास बौद्धिक विचार का अभाव था और वामपंथियों के पास यह बेशुमार था, सो वे एक-दूसरे के पूरक हो गए। हालांकि यह भी सच है कि बुद्धिजीवियों का एक वर्ग हर शासन में ही अपने लिए संभावना तलाशता रहता है। संकट खड़ा करके उसे बातचीत से हल करने का जो फार्मूला है, वह इसी वर्ग की ईजाद है। बहरहाल, इस समय मुद्दा यह है कि कांग्रेस और वाम के इस खुशनुमा दिखते संबंधों का आने वाले दिनों में क्या हश्र होता है, क्योंकि आखिर इस पर मुहर तो मतदाता ही लगाएंगे।

सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि जिस तरह से एक के बाद एक राज्यों की सत्ता में भाजपा को नाकामी झेलनी पड़ रही है, उसके कारण उसके मौजूदा कार्यकाल के अंत तक भी उसे राज्यसभा में बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में उसे अपनी प्राथमिकता तय करनी होगी। संसदीय प्रबंधन को लेकर भी यह सरकार सवालों के घेरे में है। वहां सबको अपनी संसदीय क्षमता से काम लेना पड़ता है। समझ नहीं आता कि सरकार अपनी धुरविरोधी कांग्रेस के साथ दो-दो हाथ करना चाहती है या फिर गलबाहियां डालना चाहती है। क्योंकि एक पल में वह कांग्रेस का तुष्टीकरण करती दिखाई देती है, ‘भोजन कूटनीति’ का सहारा लेती है तो दूसरे ही पल अपने किसी भी एक नेता के हमलावर होने पर वही रुख अपना लेती है। स्वामी ने राज्यसभा में शपथ लेने के दूसरे ही दिन कांग्रेस पर हमला किया। ऐसा लगता नहीं कि इस मामले में पार्टीस्तर पर किसी विचार की इतने कम समय में कोई संभावना भी थी।

तो क्या सरकार ने संसद में ‘फ्री स्टाइल’ की अनुमति दे रखी है कि जो चाहे, जब चाहे जो भी मुद्दा उठा दे? यह सच है कि स्वामी ने पांच राज्यों में चुनाव के अंतिम चरण से पहले कांग्रेस को बचाव की मुद्रा में ला खड़ा किया, लेकिन क्या इससे जनहित की दिशा में कोई दूरगामी परिणाम मिलने की आशा भी है, या फिर यह भाजपा के लिए सर्वसुहाय जुमलेबाजी का ही हिस्सा बन कर रह जाएगा?
भाजपा के उठाए ये मुद्दे असर दिखा पाएंगे या नहीं, दोषियों के नाम सामने आएंगे या नहीं, कांग्रेस इसका जवाब दे पाएगी या नहीं – यह तो वक्त बताएगा क्योंकि समर शेष है।

गांधी-नेहरू परिवार का सत्ता पर लंबे समय तक दबदबा रहा है। इसलिए इस परिवार पर सत्ता का बेजा इस्तेमाल कर निजी फायदा लेने के आरोप भी लगे हैं।
अगस्ता हेलिकॉप्टर घोटाला (2013)
कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के राजनीतिक सचिव अहमद पटेल पर इतालवी चॉपर कंपनी अगस्ता वेस्टलैंड से कमीशन लेने के आरोप लगे। सोनिया को भी घेरे में लाया गया।
वाड्रा-डीएलएफ घोटाला (2012)
गांधी परिवार के दामाद राबर्ट वाड्रा पर रियल एस्टेट कंपनी डीएलएफ से 65 करोड़ का ब्याजमुक्त लोन लेने का आरोप लगा। वाड्रा पर आरोप लगे कि कांग्रेसी शासन वाले राज्यों में उन्हें कौड़ियों के भाव जमीन दी गई।
नेशनल हेरल्ड (2011)
कांग्रेस ने 1938 में एसोसिएटेड जर्नल्स लिमिटेड नाम की कंपनी बनाई। यह कंपनी नेशनल हेरल्ड, नवजीवन और कौमी आवाज नाम से तीन अखबार निकालती थी। साल 2008 में इन अखबारों का प्रकाशन बंद हो गया। वहीं मार्च 2011 में सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी ने यंग इंडिया लिमिटेड नाम की कंपनी खोली, जिसमें दोनों की 38-38 फीसद हिस्सेदारी थी। कंपनी को खड़ा करने का मकसद एजेएल पर मौजूद 90.21 करोड़ रुपए की देनदारियां उतारना था। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी ने संपत्ति के बेजा इस्तेमाल का आरोप लगा सोनिया गांधी और राहुल गांधी को अदालत में घसीटा।
बोफर्स घोटाला (1990-2014)
बोफर्स तोपों की खरीद में दलाली का खुलासा अप्रैल 1987 में स्वीडन रेडियो ने किया था। आरोप लगे थे कि बोफर्स कंपनी ने 1437 करोड़ का सौदा हासिल करने के लिए भारत के बड़े नेताओं और अधिकारियों को रिश्वत दी थी। राजीव गांधी सरकार ने मार्च 1986 में स्वीडन की एबी बोफर्स से 400 होबित्जर तोपें खरीदने का करार किया था। इसके कारण 1989 के लोकसभा चुनावों में राजीव सत्ता से बेदखल हो गए।
मारुति घोटाला (1973)
इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी को यात्री कार बनाने का लाइसेंस मिला था। इसके बाद से ही यह कंपनी गांधी परिवार के लिए बड़ी मुसीबत बनी। वहीं 1973 में सोनिया गांधी को मारुति टेक्निकल सविर्सेज प्राइवेट लि. का एमडी बनाया गया। आरोप है कि कंपनी को टैक्स और जमीन से जुड़ी कई छूटें मिलीं, बावजूद वह बाजार में कार को नहीं ला पाई। इस कंपनी को 1977 में बंद कर दिया गया।
मूंदड़ा घोटाला (1951)
इस घोटाले के दाग पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के दामन पर पड़े थे। कलकत्ता के उद्योगपति हरिदास मूंदड़ा ने 1957 में सरकारी इंश्योरेंस कंपनी एलआइसी के जरिए अपनी छह कंपनियों में 12 करोड़ 40 लाख रुपए का निवेश कराया। यह निवेश सरकारी दबाव में एलआइसी की इन्वेस्टमेंट कमेटी की अनदेखी करके किया गया। जब तक एलआइसी को पता चला उसे कई करोड़ का नुकसान हो चुका था। इस मामले में कांग्रेस के वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी को इस्तीफा देना पड़ा था।

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