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संपादकीयः चंदे पर फंदा

कालेधन पर अंकुश लगाने के मकसद से सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे में पारदर्शिता लाने की पहल की है।

Author February 4, 2017 3:29 AM
संसद में आम बजट पेश करने जाते हुए वित्त मंत्री अरुण जेटली। (फोटो-PTI)

कालेधन पर अंकुश लगाने के मकसद से सरकार ने राजनीतिक दलों को मिलने वाले नगद चंदे में पारदर्शिता लाने की पहल की है। बजट में नगद चंदे की सीमा बीस हजार रुपए से घटा कर दो हजार रुपए कर दी गई। अब सरकार राजनीतिक दलों के लिए अपने आय-व्यय का ब्योरा जमा कराना अनिवार्य बनाने जा रही है। प्रस्तावित कानून के मुताबिक पार्टियों को दिसंबर तक अपने आय-व्यय का ब्योरा जमा करना होगा, नहीं तो उन्हें आयकर में मिलने वाली छूट खत्म की जा सकती है। राजनीतिक दलों पर यह सख्ती, निस्संदेह एक सकारात्मक कदम कही जा सकती है, पर वे इस पर कितना अमल करेंगे, कहना मुश्किल है। पहले भी जब पार्टियों को मिलने वाले नगद चंदे की सीमा बीस हजार रुपए की गई थी, तो वे फर्जी नामों से पर्चियां बना कर बड़ी रकम को छोटी रकम में बदल दिया करती थीं। अब चूंकि नकदी की राशि इतनी छोटी है कि उन्हें फर्जी पर्चियां काटने में कुछ अधिक मशक्कत करनी पड़ सकती है, पर वे चंदे की बड़ी रकम स्वीकार नहीं करेंगी, दावा करना मुश्किल है।

छिपी बात नहीं है कि पार्टियों का खर्चा हजार-दो हजार के नगद चंदे से नहीं चलता। तमाम व्यवसायियों और उद्योगपतियों की मदद से वे चुनाव लड़ती हैं। उद्योगपतियों से मिलने वाले धन पर अंकुश लगाने के मकसद से ही निर्वाचन आयोग ने भी प्रत्याशी के चुनाव खर्च की सीमा तय की थी। मगर चूंकि उसमें पार्टियों का खर्च शामिल नहीं होता, इसलिए बहुत सारे प्रत्याशी चुनाव में खुल कर धनबल का प्रयोग करते हैं। पार्टियों की तरफ से प्रत्याशियों को मिलने वाले या फिर प्रत्याशियों के पार्टी के नाम से करने वाले खर्च पर कैंची चलाने के उद्देश्य से सरकार ने पार्टियों के आय-व्यय का ब्योरा पेश करना अनिवार्य बनाने का मन बनाया है। यह कहां तक संभव हो पाएगा, देखने की बात है। हर राजनीतिक दल के मुखिया सार्वजनिक मंचों से अपने कार्यकर्ताओं को सादगीपूर्ण जीवन की नसीहत देते नहीं थकते, पर हकीकत में उनकी तड़क-भड़क वाली जीवन-शैली बनी रहती है।

यह भी छिपी बात नहीं है कि राजनीति में आने के साथ ही बहुत सारे जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में आश्चर्यजनक रूप से इजाफा होने लगता है। यह सब अधिकारियों, उद्योगपतियों, व्यवसायियों आदि को उपकृत करने के बदले प्राप्त होता है। फिर चुनाव लड़ना इन दिनों इस कदर खर्चीला हो गया है कि किसी सामान्य आयवर्ग के व्यक्ति के बूते की बात नहीं रह गई है। सब जानते हैं कि पार्टियां अब प्रत्याशियों को चुनाव खर्च में मदद नहीं करतीं, बल्कि प्रत्याशी खुद पार्टी फंड में कुछ मदद करते रहते हैं। उजागर है कि यह सब कानूनी तरीके से जुटाया धन नहीं होता। ऐसे में अचानक पार्टियों के सामने अपने चंदे और कमाई का विवरण पेश करने की बाध्यता उपस्थित होगी, तो वे कोई गली निकालने से बाज नहीं आएंगी। आयकर में छूट पाने के मकसद से वे विवरण जरूर पेश करेंगे, पर वह कितना सही होगा, इसकी जांच का तरीका क्या होगा, यह भी सरकार को सोचने की जरूरत है। चुनाव निस्संदेह कालेधन को सफेद करने का सबसे मुफीद अवसर होते हैं, इसलिए पार्टियों के समर्थक, उनसे लाभ पाने की उम्मीद लगाए या फिर उनके दबाव में आए उद्योगपति चोरी-छिपे चंदे के रूप में बड़ी रकम देने से बाज आएंगे, दावा नहीं किया जा सकता। इसलिए सरकार को कालेधन के स्रोतों की पहचान मुकम्मल करना जरूरी है।

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