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फिल्म समीक्षा : खजूर पे अटके, परिवार में चालाकियां

निर्देशक- हर्ष छाया, कलाकार-मनोज पाहवा, सीमा पाहवा, विनय पाठक, डॉली अहलूवालिया, सना कपूर, अलका अमीन, नागेश भोंसले। 

हर्ष छाया फिल्मों और टेलीविजन के परिचित अभिनेता हैं।

हर्ष छाया फिल्मों और टेलीविजन के परिचित अभिनेता हैं। इस फिल्म के साथ उन्होंने निर्देशन में भी कदम रख दिया है। ऐसा लगता है कि उनके भीतर कुछ-कुछ सुभाष घई वाले तत्व भी प्रवेश कर गए हैं। मतलब ये कि जिस तरह सुभाष घई अपनी कई फिल्मों में खुद भी एक छोटे से किरदार के रूप में आते रहे हैं उसी तरह हर्ष छाया को भी आप इसमें जॉगिंग करते और फोटो खिंचाते देखेंगे। बहरहाल हर्ष छाया ने ‘खजूर पे अटके’ नाम से जो फिल्म बनाई है वह एक पारिवारिक कॉमेडी है। जैसा कि रोज के अनुभवों में दिखता है कि परिवार में जितना प्रेम होता है उतना ही द्वेष भी।

खासकर संपत्ति के मामले में भाइयों में ठन जाती है और भाभियां इस ठनाठनी में घी डालने का काम करती रहती है। यहां भी वही हाल है। बड़े भाई जतिंदर शर्मा (मनोज पाहवा) को खबर मिलती है कि उसका भाई देवेंदर शर्मा मुंबई में बीमार पड़ा है औ र अब मरा, तब मरा की हालत में है। वह अपनी पत्नी (सीमा पाहवा) और बच्चों के साथ वहां जाता है लेकिन पत्नी के मन में है कि बीमार देवर मुंबई वाले फ्लैट में हिस्सा दिए बिना मर गया तो क्या होगा। मुंबई का फ्लैट तो पारिवारिक संपत्ति है। जतिंदर की पत्नी को कहीं से ये खबर मिल गई है कि उसके देवर ने एक और फ्लैट खरीद लिया है और किसी को बताया नहीं है। एक और भाई रविंदर शर्मा (विनय पाठक) भी इसी उधेड़बुन में है कि अपने बीमार और अस्पताल में पड़े भाई को दखने मुंबई जाए या एक ठेके लेने की जुगत भिड़ाए। और मुंबई जाए तो किस दिन ताकि प्लेन में टिकट के लिए कम पैसे देने पड़े। एक बहन (डॉली अहलूवालिया) भी है जो अपने पति से झगड़कर अपने बीमार भाई को देखने पहुंचती है और एक बाबा की मदद से भाई को ठीक कराने के लिए टोटके करती है।

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उधर, भाइयों और बहन के बच्चे मुंबई में किसी और इंतजाम में हैं। जतिंदर की बेटी (सना कपूर) हीरोइन बनने की जुगाड़ में है और एक फेसबुक फें्रड से फिल्म पाने की जुगत में लग गई है। बीमार भाई का अस्पताल में बिल बढ़ता जा रहा है और बिल का भुगतान करने में हिस्सा बटाया जाए या नहीं-इस पर दांवपेच हो रहे हैं। यानी फिल्म में पारिवारिक चालबाजियां भी हैं, पीढ़ियों की लड़ाइयां भी। वक्त बीतने के सात परिवार में प्रेम कम होता जाता है और हिसाब-किताब पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यही सब हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाया गया है। अस्पताल में ही शादी के लिए लड़की देखने-दिखाने वाले दृश्य हंसने का भरपूर मौका देते हैं।

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