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बेबाक बोलः सवालों में 2 साल- कमल और कांटे

प्रख्यात पत्रकार व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने कहा कि देश में नई सरकार में यही बड़ा बदलाव हुआ है कि कांग्रेस के साथ ‘काउ’ (गाय) जुड़ गया है।

प्रख्यात पत्रकार व पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण शौरी ने कहा कि देश में नई सरकार में यही बड़ा बदलाव हुआ है कि कांग्रेस के साथ ‘काउ’ (गाय) जुड़ गया है। साफ है कि उनका मानना है कि देश में शासन के मामले में कोई बड़ा बदलाव नहीं हुआ और सब उसी ढर्रे पर चल रहा है जैसा कि कांग्रेस सरकार के वक्त में था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश की सत्ता संभाले हुए दो वर्ष हो गए। हालांकि बड़े परिवर्तन तो शासन के पहले वर्ष में ही दिख जाते हैं, क्योंकि नई सरकार को अपनी पांच वर्ष की नीतियों का पौधरोपण तुरंत करना होता है, ताकि वे समय रहते फलीभूत हों और आम आदमी तक उनका संदेश और लाभ पहुंचाया जा सके। लेकिन यह सरकार कई वर्ष के सूखे के बाद हुई मूसलाधार बारिश की तरह एक वर्ष तक तो अपने बहाव के अतिरेक में ही रही। मधुमास का लाभ भी उसे दिया गया। लेकिन दो साल बाद अब निश्चित ही यह समय है कि सरकार की नीतियों और उसके कार्यक्रमों का विश्लेषण किया जाए।

अपनी सरकार के दो साल पूरे होने पर मोदी ने ट्विटर पर प्रचार गीत जारी किया है। इस गाने के बोल हैं : ‘मेरा देश बदल रहा है, आगे बढ़ रहा है’। इस प्रचार गीत में प्रत्यक्ष नकद अंतरण, प्रधानमंत्री जनधन योजना, मुद्रा योजना, कौशल विकास, उज्ज्वला योजना, दीनदयाल उपाध्याय अंत्योदय योजना, दीनदयाल उपाध्याय ग्राम ज्योति योजना, जन सुरक्षा, प्रधानमंत्री आवास योजना, प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना, स्वच्छ भारत अभियान जैसी योजनाओं के महत्त्व को रेखांकित किया गया है। असम की जीत के बाद ही सरकार ने तय कर लिया कि वह अपने दो साल का जश्न भारी-भरकम इश्तहार के साथ मनाएगी।

लेकिन यह सच है कि लोक लुभावनी योजनाओं की समवेत स्वर-लहरी पर भारी रही सरकार की कट्टरपंथी सोच की उद्घोषणा। प्रचंड बहुमत पाकर आई सरकार के पहले दिन से ही ऐसा लगने लगा कि इस बार सरकार अपनी इमारत का मंजिल-दर-मंजिल विकास करेगी। कहने की बात नहीं कि इस इमारत की बुनियाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की विचारधारा पर टिकी है। और अब तो तमाम आलोचनाओं को दरकिनार कर संघ की विचारधारा का पोषण होता दिख भी रहा है। इस इमारत की बुनियाद की शुरुआती नींव हरियाणा ने रखी जिसने केंद्रीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज को गीता को राष्टÑीय ग्रंथ बनाने की अपील के साथ ही उसे स्कूली पाठ्यक्रम में लागू करने की घोषणा कर दी। इसे अमल में भी लाया गया। इस बुनियाद को और मजबूत करते हुए करीब एक वर्ष के अंतराल के बाद मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा कि जो गोमांस खाते हैं, उन्हें भारत छोड़ना ही होगा। और वे ऐसा तब कहते हैं जब दादरी में गोमांस रखने की अफवाह को ही लेकर मोहम्मद अखलाक की हत्या हो चुकी थी।

पानसरे, दाभोलकर और कलबुर्गी। एक के बाद एक तीन बुद्धिजीवियों की हत्याओं ने देश को झकझोर कर रख दिया। इन हत्याओं के खिलाफ जब देश के बुद्धिजीवियों ने लामबंद होने की कोशिश की तो सरकार के बड़े मंत्री अरुण जेटली ने इसे कागजी क्रांति कह कर खारिज कर दिया। हैदराबाद में रोहित वेमुला फांसी के फंदे पर झूल गया तो जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में कन्हैया कुमार को राष्ट्रद्रोह के आरोप में घेर लिया गया। साध्वी प्राची, योगी आदित्यनाथ, कैलाश विजयवर्गीय, गिरिराज सिंह, साध्वी निरंजन ज्योति और भी जाने कौन-कौन जुबानी जहर उगलते रहे। सिनेस्टार शाहरुख खान और आमिर खान भी असहिष्णुता के लपेटे में आ गए। यह सब इतने बुलंद तरीके से हुआ और उसका ऐसा असर हुआ कि खान सितारों की देशप्रेम की बार-बार दुहाई भी किसी काम न आई।

आखिर क्यों? यह सब बढ़ता गया, अपनी छाप को हर दिन गहरा करता गया और सरकार के माथे पर दाग की तरह चिपका दिखने लगा, क्योंकि अब तक मुखर रहे प्रधानमंत्री इन सब मुद्दों पर मौन हो गए। जब ‘मन की बात’ बोले तो भी तो बचते हुए। उनकी ओर से किसी जोरदार कार्रवाई के अभाव ने इन सबको लगातार मनमाने बयानों की छूट दी। देश में भाजपा नेतृत्व के इन मुद्दों पर मौन को पार्टी काडरों ने उनकी सहमति के रूप में पहचाना और इन सबको लेकर खौफ की एक लहर कायम की गई। कांग्रेस के शासनकाल में जिस तरह से देश के शिक्षण संस्थानों को वामपंथ से प्रभावित बुद्धिजीवियों के भरोसे चलने दिया गया था, भाजपा ने उसमें भी सेंध लगाई। जेएनयू को राष्टÑद्रोह का अड्डा करार दिया गया और हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में भी कमोबेश यही किया गया। हर सरकार की तरह कला व संस्कृति, शिक्षा और अनुसंधान से जुड़े संस्थानों पर ‘अपने’ लोगों को लगाया गया। यह सब बिल्कुल साफ तरीके से किया गया। लेकिन उसके औचित्य पर सवाल बरकरार रहे।

सरकार या कहें कि प्रधानमंत्री मोदी की सरकार की दूसरी सबसे बड़ी छाप उसकी कूटनीति हो सकती थी। देश की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की लगभग अवहेलना करते हुए मोदी ने व्यक्ति केंद्रित कूटनीति को एक नई पहचान दी। विदेशों में कामयाब रैलियां कीं, तालियां बटोरीं। विश्व के सबसे ताकतवर राजनेता और अमेरिका के राष्टÑपति बराक ओबामा से याराने का दम भरा। गलबहियां डालीं। अचानक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को बधाई देने लाहौर उतर गए। तमाम कूटनीतिक शिष्टाचार को धता बता कर कई देशों में घूम आए। लेकिन इन सबके बीच पठानकोट वायुसेना अड्डे पर पाकिस्तानी धरती से हमला किया गया। चीन ने संयुक्त राष्टÑ में मसूद अजहर के मामले में खुलेआम विरोध किया। चीन के तुष्टीकरण को लेकर डोल्कन ईसा का वीसा पहले मंजूर और फिर रद्द किया गया, क्योंकि चीन उन्हें आतंकवादी मानता है। पठानकोट पर नापाक हमले में पाकिस्तान पर आरोप साफ दिखने के बावजूद भारत ने अपने संवेदनशील वायुसेना अड्डे के दरवाजे आइएसआइ के लिए भी खोल दिए। आलम यह है कि कभी ‘हिंदू राष्टÑ’ की पहचान के साथ रहा नेपाल भी हमें आंखें तरेर रहा है।

ईरान के साथ चाबहार करार निश्चित रूप से मील का पत्थर साबित हो सकता है और राष्टÑपति प्रणब मुखर्जी की चीन यात्रा दोनों देशों के तनाव को कम करने में मददगार होगी। लेकिन दिल्ली की सड़क पर दिनदहाड़े कांगो के व्यक्ति की हत्या होने के बाद अफ्रीकी देशों ने भारत पर नस्लवाद और अफ्रीकी फोबिया से ग्रसित होने के आरोप लगाए हैं, यह देश के नेतृत्व के लिए शर्मनाक है। असष्णिुता के मुद्दे पर विदेशों में घिर चुकी सरकार किस मुंह से विदेशी नागरिकों को अपनी जमीन पर आमंत्रित करेगी, जब उनसे सवाल पूछा जाएगा कि आपके देश में तो गोमांस खाने और गोरी चमड़ी का नहीं होने पर हत्या कर दी जाती है। और यह सच है कि सरकार को अगर विदेशी निवेशकों को आमंत्रित करना है तो उसे संसद से लेकर सड़क तक कट्टरता का भाव खत्म कर समरसता का संदेश देना होगा।

कहना न होगा कि कूटनीतिक संबंधों की बेहतरी के लिए रैली, तालियां, वाक्पटुता और गलबहियां ही पर्याप्त नहीं, क्योंकि ये सब लोग अपनी कुर्सी पर बैठते ही अपने स्थानीय दबावों के नीचे आकर फैसले करते हैं। यह सच है कि देश की जनता ने इस सरकार को ऐसी स्थिति में ला दिया है कि यह किसी को भी दरकिनार कर दे, लेकिन क्या यह वाजिब है, या फिर सरकार को इस पर सोचना होगा। कोई अनिष्ट या करिश्मा न हो जाए तो यह सरकार अगले तीन साल भी सत्ता पर काबिज रहेगी। हालांकि अपनी गलतियों को सुधारने का पर्याप्त समय सरकार के पास है, लेकिन देखना यह है कि वह इसमें कामयाब भी हो पाती है या नहीं।

आर्थिक मोर्चे पर सरकार पूरे समय महंगाई के साथ रस्साकशी में धड़ाम से गिरती-उठती रही। मुद्रास्फीति बेलगाम रही। मूल्य सूचकांक देश की राजनीतिक उठापटक के साथ आंख-मिचौली करता रहा। विदेशी निवेश का मोर्चा ठंडा रहा। तेल की कीमतों में अंतरराष्टÑीय हलचल के साथ उतार-चढ़ाव होता रहा। यह माना जाता है कि सरकार ने इसका पूरा लाभ भी आम आदमी तक नहीं पहुंचाया। जीएसटी विधेयक अधर में लटका रहा। कुछ हुआ तो बाबा रामदेव के स्वदेशी या स्वनिर्मित उत्पादों का विस्तार। बाबा ने सगर्व घोषणा की कि उनका व्यापार 5000 करोड़ का आंकड़ा छू लेगा। और अब श्रीश्री रविशंकर भी अपने उत्पादों के साथ तैयार हैं। यह एक ऐसा मोर्चा है जिस पर अगर फौरी तौर पर कुछ न हुआ तो सरकार यह न भूले कि यह वही देश है जहां प्याज की कीमतों पर सरकार गिर जाती है और गरीबी हटाओ के नारे पर बन जाती है।

राजनीतिक मोर्चे पर मोदी ने पार्टी के दिग्गजों को बड़ी कामयाबी से कोने में धकेला। फिर वे चाहे लालकृष्ण आडवाणी हों या मुरली मनोहर जोशी और या फिर यशवंत सिन्हा। मोदी अपनी किसी भी तरह की आलोचना से नहीं डगमगाए। बल्कि उन्होंने इन सबके उद्गारों की अनदेखी की और उनके साथी उसे कुंठित मन की अभिव्यक्ति कह कर उपेक्षा करते गए। ‘कांग्रेस मुक्त भारत’ का नारा दिया गया और उस दिशा में ‘साम-दाम-दंड-भेद’ की नीति पर अमल किया गया। देश के वोटरों को तो इस नारे को साकार करने के लिए लुभाया गया और दूसरी ओर अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों को भी झटका दिया गया। लेकिन उत्तराखंड में उन्हें मुंह की खानी पड़ी और कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की, जबकि अरुणाचल का फैसला होना है। उत्तराखंड का हतोत्साह जल्द ही असम में उत्साह में तब्दील हो गया और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने घोषणा भी कर दी कि ‘कांग्रेस मुक्त देश’ की दिशा में पार्टी दो कदम और आगे बढ़ गई है। बहरहाल, क्षेत्रीय क्षत्रपों से कितना पिछड़ गई, इस पर शाह मौन ही रहे। कहना न होगा कि इसका इल्म तो उन्हें बदस्तूर है।

सामाजिक मोर्चे पर जहां कट्टरवादी सोच के कारण बिखराव दिखा वहां असंतोष की चिंगारियां भी फूटती दिखीं। बिहार में आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान से उलझी पार्टी ने समरसता का संदेश देने की भरसक कोशिशें शुरू कर दीं, लेकिन मोदी के गृह प्रदेश गुजरात में पाटीदारों ने सरकार की नाक में दम कर दिया। आलम यह है कि मुख्यमंत्री आनंदी बेन की कुर्सी भी खतरे में दिखाई दे रही है। हरियाणा में भी गुजरात की तर्ज पर हुए हिंसक जाट आंदोलन ने सरकार के सामाजिक तानेबाने को बनाए रखने पर गंभीर सवाल खड़े किए। दरअसल, इसका एक कारण यह भी है कि सरकार की नीयत साफ नहीं। किसी भी मुद्दे के क्रियान्वयन पर इतना धुंधलका है कि यही समझ नहीं आता कि वह चाहती क्या है? हरियाणा में जाट आंदोलन से जनता और सरकार के नुकसान के बाद आरक्षण लागू हुआ और अब उस पर अदालती रोक है। तो जब यह होना ही था तो हालात को संभालने में कहां दिक्कतें हुर्इं। कहीं न कहीं मुद्दों से निपटने में राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव के कारण सरकार की छवि को देश में और राज्यों में गहरा धक्का लगा।

बहरहाल, राजनीतिक दांवपेच के दम पर सत्ता की सलामती में कामयाब सरकार को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि उसके जश्न की बुलंदी उसे अप्रतिम आत्मतोष की अनुभूति तो दे सकती है, लेकिन दीर्घकाल में उसका कोई लाभ नहीं मिलना है क्योंकि अंतत: पांच वर्ष बाद सरकार को उसके किए कामकाज के बूते पर ही आंकना होगा। असम की जीत का मजा भी सरकार की अपनी ही साथी शिवसेना यह कह कर किरकिरा कर चुकी है कि क्षेत्रीय दलों के सामने भाजपा पानी भरती नजर आई है। यह वहीं कामयाब हुई है जहां उसका मुकाबला कांग्रेस के साथ था। और जनता ने इस समय कांग्रेस को खारिज किया है।

बकौल शौरी ‘काउ’ के साथ वही कांग्रेस अभी सत्ता में है। कांग्रेस ने धर्मनरिपेक्षता को जुमला बना रखा था तो भाजपा ने गौमाता, भारत माता और राष्टÑभक्ति को इतने हास्यास्पद तरीके से खींचा कि ये शब्द भी सोशल मीडिया पर जुमलों और चुटकुलों का हिस्सा बन कर रह गए। सनद रहे, ऐसा पहली बार नहीं कि कांग्रेस के सितारे गर्दिश में हों। यह तो पहले भी होता रहा। लेकिन देखना यह होगा कि भाजपा इस स्थिति को कायम रखने में 2019 में कितनी कामयाब होती है। फिलहाल तो सितारे बुलंद हैं, लेकिन दो साल पहले यही बुलंदी कांग्रेस के कब्जे में थी। अब इश्तहार और मधुमास से बाहर निकल भाजपा को इस सच के बारे में सोचना होगा।

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