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बैठक के हासिल

बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा छाया रहा और अंत में यही तय हुआ कि रूस पर और प्रतिबंध लगाए जाएं।

जर्मनी में समूह सात देशों की शिखर बैठक में जलवायु, स्वास्थ्य और ऊर्जा संकट जैसे मुद्दे उठे तो जरूर, पर चर्चा का केंद्र बिंदु रूस और चीन को घेरने की रणनीतियों पर ही केंद्रित रहा। बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध का मुद्दा छाया रहा और अंत में यही तय हुआ कि रूस पर और प्रतिबंध लगाए जाएं। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने तो खुल कर कहा भी कि हम यूक्रेन का समर्थन तब तक जारी रखेंगे जब तक उसे जरूरत है। साथ ही यह भी कि रूस को युद्ध जीतने नहीं देना है। मैक्रों का यह बयान समूह सात के नेताओं की ही ध्वनि है।

इस बैठक से यह भी साफ हो चला है कि रूस-यूक्रेन जंग हाल-फिलहाल खत्म होने के आसार नहीं हैं। रूस को सबक सिखाने के लिए अब समूह सात देशों ने रूसी सोने के आयात पर पाबंदी लगा दी है। हालांकि पश्चिमी देशों में रूसी सोने का आयात तो पहले ही बंद हो गया था। ऐसे में अब रूस पर जो प्रतिबंध लगेंगे, वे एक तरह से दिखावटी ज्यादा होंगे। दरअसल, रूस विरोधी खेमा भी यह समझ रहा है कि प्रतिबंधों का ज्यादा असर पड़ना नहीं है, वरना रूस युद्ध के मैदान से कब का हट चुका होता।

समूह सात देशों में वैसे तो अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और जापान हैं। पर बैठक में भारत, अर्जेंटीना, दक्षिण अफ्रीका और सेनेगल को भी शामिल किया गया। विकसित देशों यह समझ आ रहा है कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत और उसके जैसे अन्य देशों को साथ लिए बिना आगे नहीं बढ़ा जा सकेगा। महत्त्वपूर्ण बात यह भी कि सभी देशों ने नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को बढ़ावा देने और एक दूसरे की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता की रक्षा करने का संकल्प भी जताया। निश्चित रूप से यह संदेश चीन के लिए रहा। बैठक में हिंद प्रशांत क्षेत्र का मुद्दा जिस तरह से उठा, उसके नतीजे दूरगामी प्रभाव वाले हैं। पहली बार ऐसा हुआ जब हिंद प्रशांत क्षेत्र को लेकर विकसित देश इतने बेचैन दिख रहे हैं।

इसी का नतीजा है कि दुनियाभर में खासतौर से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में ढांचागत निर्माण के लिए छह सौ अरब डालर खर्च करने का समझौता सामने आया। समूह सात का यह कदम चीन की बेल्ट एंड रोड इनीशिएटिव परियोजना की जवाबी कार्रवाई है। भारत इसमें बड़ा सहयोगी रहेगा। दक्षिण चीन सागर में चीन ने जिस तरह से मनमाने कानून थोप रखे हैं, वे अंतरराष्ट्रीय समुद्री परिवहन के नियमों का उल्लंघन हैं, इसलिए अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था और नियम-कानूनों के पालन का मुद्दा प्रमुखता से उठा।

शिखर बैठक में भारत ने सभी देशों से स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में निवेश करने का आह्वान कर यह दिखा दिया है कि पर्यावरण को बचाने और ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों पर काम करने की दिशा में उसका रेकार्ड विकसित देशों से कहीं बेहतर है। देखने में अब तक यही आता रहा है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने के मामले में विकसित देश हमेशा से विकासशील देशों पर ही ठीकरा फोड़ते रहे हैं। पर अब भारत ने यह दिखा दिया कि पिछले कुछ ही सालों में उसने स्वच्छ ऊर्जा के क्षेत्र में जो उपलब्धियां हासिल की हैं, वे मामूली नहीं हैं। कार्बन उत्सर्जन में काफी हद तक कमी आना इन्हीं प्रयासों का परिणाम है। साथ ही, भारत ने यह कहने में भी कोई संकोच नहीं किया कि ऊर्जा संसाधनों पर सिर्फ अमीर देशों का ही नहीं, बल्कि दुनिया के हर गरीब देश का भी समान अधिकार होना चाहिए। भारत का यह संदेश दुनिया को समझना चाहिए, खासतौर से अमीर देशों को।

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