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मणिपुर चुनाव ग्राउंड रिपोर्ट: ये पुराना कांग्रेसी है बीजेपी का चेहरा, आज भी कमरे में लगा रखी है सोनिया-राहुल की तस्वीर

एन बीरेन राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉलर रहे चुके हैं। वो राजनीति में आने से पहले एक दैनिक अखबार चलाते थे।

Author March 3, 2017 10:12 AM
मणिपुर चुनाव में बीजेपी का चेहरा बने एन बीरेन अपने दफ्तर में। (तस्वीर- ओनम आनंद)

56 वर्षीय नॉन्गथोमबाम बीरेन मणिपुर विधान सभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का चेहरा हैं। राष्ट्रीय स्तर के फुटबॉलर रहे बीरेन स्थानीय भाषा के एक दैनिक अखबार के संस्थापक हैं और राज्य की कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं। उनके दफ्तर की दीवार पर मणिपुर के कई बड़े नेताओं की तस्वीरों के साथ ही सोनिया गांधी और राहुल गांधी की भी तस्वीर लगी है। अपनी बैठक में उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर लगा रखी है। बीरेन पिछले साल कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आए थे।

बीरेन 2007 से कांग्रेस से जुड़े थे। उन्होंने भाजपा में शामिल होने से कई महीने पहले ही कांग्रेस आलाकमान को चेतावनी दी थी कि अगर राज्य के मुख्यमंत्री ओकराम इबोबी सिंह ने मंत्रिमंडल में फेरबदल नहीं किया तो वो 20 कांग्रेसी विधायकों के साथ भाजपा में चले जाएंगे। इबोबी सिंह को उनके आगे झुकना पड़ा था। बीरेन को राज्य कांग्रेस का उपाध्यक्ष भी बनाया गया फिर भी उन्होंने कुछ समय बाद राज्य सरकार के “कुशासन” की वजह से पार्टी छोड़ दी।

बीरेन के घर के प्रवेशद्वार पर एक बड़ी सी तस्वीर लगी है जिसके सामने पीएम मोदी, सोनिया गांधी और राहुल गांधी की तस्वीरें छोटी पड़ जाती हैं। बीरेन बताते हैं, “ये डुरंड कप 1991 की तस्वीर है। मैंने फाइनल खेला था।” बीरेन बीएसएफ जालंधन की टीम में थे। बीरेन का फुटबॉल से प्यार अभी भी बरकरार है। उन्होंने अपने छोटे बेटे का नाम ब्राजील के फुटबॉलर जीको के नाम पर रखा है। वो उसे घर पर पेले बुलाते हैं। बीरेन कहते हैं, “जब वो पैदा हुआ तो मैं अपने करियर के शीर्ष पर था। मुझे फुटबॉल का नशा था।”

बीरेन बताते हैं कि वो जालंधर और दिल्ली के लिए पांच सालों तक फुटपॉल खेल चुके हैं। वो कहते हैं, “मैं मणिपुर वापस आया तो मैंने बाहरी दुनिया में जो कुछ देखा था उसे यहां के लोगों को बताना चाहता था। मेरे पिता के पास दो एकड़ जमीन थी मैंने उसे बेचकर अखबार “थाउदन” शुरू किया। बीरेन अखबार में ज्यादातर संपादकीय ही लिखते हैं। वो कहते हैं कि उनका अखबार जल्द ही लोकप्रिय हो गया। 1990 के दशक में मणिपुर घुसपैठ की जद में आ गया था। राज्य सरकार पर भी गैर-कानूनी तरीके से हत्याएं कराने का आरोप लगा। बीरेन कहते हैं, “मुझे लगा कि इन चीजों के बारे में केवल लिखने से काम नहीं चलेगा। मुझे ज्यादा सक्रिय भूमिका निभानी होगी। इसलिए मैंने राजनीति में आने का फैसला किया।”

साल 2001 में उन्होंने अपना अखबार दो लाख रुपये में बेच दिया। अखबार को बेचने से मिले पैसे और अपने समर्थकों के चंदे से वो अगले साल निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर पहला चुनाव लड़े और जीते। निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर उन्होंने कांग्रेस सरकार को समर्थन दिाय था। साल 2007 में वो कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े और जीतने के बाद राज्य सरकार में मंत्री बने। लेकिन धीरे-धीरे वो कांग्रेस से निराशहो गए। वो कहते हैं, “मैं राजनीति में आफ्सपा (आर्म्ड फोर्सेज स्पेशल पावर्स एक्ट) खत्म कराने के इरादे से आया था। मैंने ये मुद्दा बार-बार उठाया लेकिन मेरी बात नहीं सुनी गयी।” ये पूछने पर कि भाजपा भी आफ्सपा हटाने के पक्ष में नहीं है, बीरेन कहते हैं, “ये मणिपुर के मौजूदा हालत की वजह से है…पहले घुसपैठ को नियंत्रित करना होगा फिर आफ्सपा हटेगा।”

भाजपा में शामिल होने से पहले बीरेन ने भाजपा के सामने कुछ शर्तें रखी थीं। बीरेन कहते हैं, “मैंने राम माधव से कहा था कि राज्य का बजट उसकी भौगोलिक जरूरतों के अनुसार होना चाहिए। अगर पहाड़ी इलाके को ज्यादा पैसा चाहिए तो उसे मिलना चाहिए।” बीरेन को राज्य के कांग्रेस मुख्यमंत्री इबोबी सिंह से कई शिकायतें हैं। वो कहते हैं, “उनकी (इबोबी सिंह) राजनीति परिवार की राजनीति हो चुकी है। उनकी पत्नी, उनके बेटा और वो खुद इस साल चुनाव लड़ रहे हैं।” बीरेन का आरोप है कि मणिपुर में विभाजनकारी राजनीति के सूत्रधार खुद सीएम इबोबी सिंह हैं जिसकी वजह से आदिवासियों और मैती समुदाय के बीच तीखा ध्रुवीकरण हो चुका है, खासकर नगा और मैती के बीच। बीरेन कहते हैं, “अगर हमने जल्द इस दिशा में काम नहीं किया तो हम अपने मणिपुर के भाई-बहनों को खो देंगे। भाजपा मणिपुर के एकीकृत करेगी।”

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