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मुक्ति आंदोलन और महिलाओं की हिस्सेदारी

देश की आजादी की लड़ाई रही हो या पुरुषों के साथ बराबरी का मामला, महिलाओं ने हर आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया है। इसके बावजूद राजनीति हो या समाज या दूसरा कोई क्षेत्र-महिलाओं को उनका वाजिब हक नहीं मिल पाया है। अतीत के आईने में स्त्री-आंदोलनों का एक लेखा-जोखा प्रस्तुत कर रही हैं निवेदिता।

Author March 13, 2016 1:32 AM

समतावादी आंदोलन की यात्रा को अगर स्त्री के नजरिए से देखा जाए तो क्या हमारा इतिहास मुख्तलिफ होगा? कहना न होगा कि इसमें बिहार समेत तमाम राज्यों की महिलाओं ने बढ़चढ़कर हिस्सा लिया। क्या स्त्रीवादी नजरिए को अलग करके देखने का कोई औचित्य है? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनको हल किए बगैर स्त्री के मुद्दे पर समग्रता से बात नहीं हो सकती।

स्त्री को अपनी परंपरा, अपना संघर्ष और अपनी भागीदारी का इतिहास खुद लिखना होगा। स्त्री जानती है भिन्न-भिन्न वर्गों, वर्णों और जातियों के बीच नए-नए समीकरणों के साथ उसे अपने लिए लड़ना होगा। पूंजीवादी पितृसत्ता ऊपर से चाहे जितनी उदार और सरल लगे, पर भीतर-भीतर जटिल है। दोष उसकी संरचना में ही है। अगर ऐसा नहीं होता तो आजादी के आंदोलन से लेकर अभी तक के स्त्री संघर्ष को इतिहास में कहीं तो जगह मिली होती।
आजादी के इतिहास पर अनेक ग्रंथ हैं, पर स्त्रियों की सामान्य भागीदारी पर अलग से खोज करने निकलें, तो कहीं कुछ नहीं मिलता। स्त्री की पूरी परंपरा उसका इतिहास उसका संघर्ष दफन कर दिया गया है। आशा रानी वोहरा ने जब ‘महिलाएं और स्वराज किताब’ लिखना शुरू किया तो उन्हें तथ्य जुटाने में बारह वर्ष लगे। उन्होंने एक जगह लिखा है कि आजादी आंदोलन में स्त्रियों की भूमिका पर लिखने के लिए जब सामग्री जुटाने लगीं तो गहरी निराशा हुई। सच तो यह है कि सभी दलित और वंचित वर्गों को अपना अतीत दर्ज करने का उद्यम स्वयं ही करना पड़ता है। जानी-मानी नारी चिंतक प्रभा खेतान ने एक जगह लिखा है, ‘हम स्त्रियों के पास इसके सिवा चारा ही क्या है! हम अपने आप को उघाड़ कर ही यथास्थिति के खिलाफ विद्रोह कर पाती हैं। हमारा अपना अंतरग अनुभव ही हमारा पहला अस्त्र है। जो आगे जाकर अपनी प्रमाणिकता के जरिए इतिहास बनाता है।’

इतिहास में औरतों की भूमिका हमेशा से अदृश्य रही है। उसकी एक वजह है कि हम इतिहासचेतन नहीं रहे। इतिहासकारों ने प्रतीकों, लोक गाथाओं, गीतों और अन्य स्रोतों को कभी समेटने की कोशिश नहीं की। हम जानते हैं कि व्यवस्थितरूप से इतिहास रचने की मंजिल पर पहुंचने से पहले ऐसे सभी समुदाय पहले चरण में आत्मगत ब्योरों का इस्तेमाल करते हैं ताकि उनकी बुनियाद पर इतिहास लिखने की इमारत खड़ी की जा सके। वर्जीनिया वुल्फ ने एक जगह लिखा है कि इतिहास में जो कुछ अनाम है वह औरतों के नाम है। माना जाता है कि उन्नीसवीं सदी के अंत और बीसवीं सदी की शुरुआत में अनेक महिला आंदोलन हुए। पर उन आंदोलनों का कोई इतिहास नहीं मिलता। यही वह क्षण है जब स्त्री आंदोलन का पुनर्मूल्यांकन जरूरी है, ताकि मुक्ति की सामाजिक परंपरा में एक नया अध्याय जोड़ा जा सके।
भारतीय स्त्री आंदोलन को स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास से जोड़ कर देखना होगा। जिसकी शुरुआत संन्यासी विद्रोह से होता है। संन्यासी विद्रोह की सूत्रधार देवी चैधरानी को अंग्रेज इतिहासकारों ने दस्यु रानी की संज्ञा दी थीं। वहीं देवी चैधरानी ने संन्यासी विद्रोह का सूत्रपात किया। उस समय के लेफ्टिनेंट ब्रेनन की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि भवानी पाठक की विद्रोही गतिविधियों के पीछे देवी चैधरानी का प्रमुख हाथ था। भवानी पाठक के मारे जाने के बाद भी देवी चैधरानी ने कभी हार नहीं मानी। बराबर लड़ती रहीं, अंत तक अंग्रेजों के हाथ नहीं आर्इं।

बीस वर्षो तक चलती रही आजादी की लड़ाई के इस प्राथमिक संघर्ष में संन्यासी विद्रोह की एकमात्र सशक्त महिला के रूप में उनका नाम अमर है। 1857 से लेकर 1942 तक आजादी आंदोलन में महिलाओं के संघर्ष की ऐसी हजारों गाथाएं हैं जिसे समेटने में जाने कितने वर्ष लगेंगे। उन नामों में से एक नाम दुर्गा भाभी का है। दुर्गा भाभी ,प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा की पत्नी थीं, जो सरदार भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों की भाभी थीं। और आजादी के आंदोलन में सबकी साझीदार। दुर्गा भाभी अगर नहीं होतीं तो शायद इतिहास में इन क्रांतिकारियों को इतनी जगह नहीं मिलती।

आजादी के लिए लड़ने वाली महिलाओं की सबसे बड़ी चुनौती थी समाज में स्त्री-पुरुष के बीच के विभेद के खिलाफ आगे आना। इस विभेद के पीछे मूलरूप से सत्ता का संघर्ष है। मानव सभ्यता का इतिहास हमें बताता है कि राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक,यहां तक कि व्यक्तिगत स्तर पर सत्ता का यह खेल प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से चलता रहता है। और आज भी जारी है। ‘द सब्जेक्शन आॅफ विमेन’ में जॉन स्टुअर्ट मिल कहते हैं, ‘अगर हम देखें कि किसी भी देश में ऐसे पुरुषों की संख्या कितनी है,जो वहशियों से थोड़े ही बेहतर हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि समाज में एक बड़ी संख्या अभी भी उन व्यक्तियों की है,जो अपने मूल पशुत्व और स्वार्थ पर सभ्यता का मुलम्मा चढ़ाए हुए हैं। दरअसल परिवार एक तानाशाही की पाठशाला है। जबकि परिवार को परस्पर सहानुभूति और प्रेमपूर्वक एक साथ जीना सिखाने वाली एक पाठशाला की तरह होना चाहिए। कोई भी व्यक्ति किसी राष्ट्र या किसी समाज की स्वतंत्रता की भावना को कैसे समझ सकता है, जब घर में वह अपनी बीबी, बच्चों का तानाशाह बना बैठा है।

इतिहास गवाह है कि शुरू से ही स्त्रियों को बलपूर्वक हासिल कर लिया जाता था, या उनके पिता उन्हें उनके पतियों को बेच देते थे। योरोपीय इतिहास के काफी बाद के काल तक पिता को अपनी बेटी का हाथ किसी के भी हाथ में देने का पूरा-पूरा अधिकार था, बेटी की इच्छा कोई मायने नहीं रखती थी। हमारे देश में आज भी यह रिवाज कायम है और इसे कायम रखने के लिए बेटियों की हत्या तक की जाती है। ईसावाद से पहले पत्नी के जीवन और मृत्यु पर पति का पूरा अधिकार था। जबकि पत्नी उसके खिलाफ किसी कानून का इस्तेमाल नहीं कर सकती थी। इंग्लैंड के पुराने कानून के तहत पति को स्त्री का ‘लॉर्ड’ कहा जाता था, जिसे एकतरह से उसके शासक के रूप में देखा जाता था।’

उन्नीसवीं सदी में चलाए गए समाज सुधार आंदोलन का उदाहरण देना चाहूंगी। 1890 के आस-पास महाराष्ट्र में काशीबाई कनिकतर और आनंदीबाई जोशी पहली बार जूते पहनकर और छाता लेकर निकलीं, यह कह कर उन पर पत्थर बरसाये गए कि उन्होंने पुरुषों के अधिकार वाले प्रतीकों को अपनाकर उनका अपमान किया है। उसी दौर में ताराबाई शिंदे द्वारा लिखित किताब स्त्री-पुरुष तुलना पर जमकर हमला हुआ। इस मसले पर कृष्णराव भालेकर और ज्योतिबा फुले के बीच तीखी बहस हुई। पुस्तक में स्त्री-पुरुष की तुलना करते हुए कहा गया कि धोखेबाजी, मक्कारी, संदिग्ध चरित्र और असहिष्णुता जो अवगुण स्त्रियों में माने जाते हैं, वे समान रूप से पुरुषों में भी मौजूद हैं। ये बहस साबित करता है कि दशकों पहले र्वचस्वविहीन समाज के खिलाफ आंदोलन के बीज बोए जा रहे थे।

नारीवादी आंदोलन की सबसे बड़ी जीत थी स्त्री को देह से आगे जाकर देखना। सेक्स और लिंग दो अलग चीजें हैं, यह समझाने में लंबा समय लगा। लिंग के आधार पर स्त्री एक विशिष्ट प्रकार की हिंसा झेलती है, नारीवाद इसी दमन के विरुद्ध स्त्री मुक्ति और उसकी सामूहिक चेतना के विकास के लिए संघर्ष कर रहा है। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। उसकी लड़ाई दुनिया में स्त्री को मनुष्य का दर्जा दिए जाने के लिए है। स्त्री आंदोलन का पहला पक्ष है वर्चस्वविहीन समाज की स्थापना।

देश भर में जब महिलाएं अपने अधिकार के लिए आंदोलन कर रही थीं, बिहार उस आंदोलन से अछूता नहीं था। परंपराओं की अनेक धाराओं के विरुद्ध बिहार की महिलाओं ने भी मोर्चा खोला। बिहार को जब बंगाल प्रेसिडेंसी से अलग किया गया, उस समय बिहार में स्कूल जाने वाली लड़कियों की संख्या काफी कम थी। उसी दौरान शुरू हुए सुधार आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने भूमिका निभाई। शिक्षा एक मुद्दा बना। पटना में राममोहन राय सेमिनरी में महिलाओं ने शिक्षा के साथ साथ बाल विवाह के खिलाफ सम्मेलन में प्रस्ताव पारित किए। मधोलकर ने इसकी अध्यक्षता की और बाल विवाह के खिलाफ समिति बनाने का सुझाव दिया। बिहार सहित दूसरे राज्यों में भी सुधार आंदोलन चल रहा था। जल, जंगल जमीन के साथ साथ महिलाएं अपने वोट देने के अधिकार को लेकर भी संघर्ष कर रही थीं।

1910 में बंगाल में सरला देवी ने भारत स्त्री मंडल की स्थापना की। 1917 में सरोजनी नायडू के नेतृत्व में एक प्रतिनिधि मंडल स्त्रियों की रक्षा और मताधिकार को लेकर मांटेग्यू चेम्सफोर्ड से मिला। अप्रैल 1918 में पटना में हुए एक आयोजन में एनी बेसेंट ने कहा कि जब तक औरतों को अधिकार नहीं मिलता, मोर्ले मिंटो सुधार से कोई लाभ नहीं होगा। महिलाओं के मताधिकार की मांग को लेकर साउथ बोरो कमेटी की स्थापना की गई। 1919 के जनवरी में पटना में भी अखिल भारतीय महिला सम्मेलन हुआ। बिहार की महिलाओं ने बाल विवाह, दहेज प्रथा और मताधिकार के मुद्दे पर अपनी आवाज बुलंद की। उसी साल राजकिशोरी देवी ने मझवेलिया, लहेरिया सराय में बिहार महिला पीठ की स्थापना की। 1921 के राष्ट्रीय कांग्रेस के अधिवेशन में बिहार से आठ महिलाओं ने हिस्सा लिया।

इतिहास गवाह है कि देश भर में चले असहयोग आंदोलन में बिहार की महिलाओं ने जमकर हिस्सा लिया। बिहार में महिलाओं ने अपने मताधिकार की मांग को लेकर भी लंबा संघर्ष किया है। बिहार की काउंसिल में महिलाओं के वोट देने का प्रस्ताव तो गिर गया पर महिलाओं का संघर्ष जारी रहा। और 1929 में बिहार और ओड़िशा की महिलाओं को वोट देने का अधिकार मिला। यह एक ऐसा अधिकार था जिसने महिलाओं के लिए राजनीति का दरवाजा खोला। बिहार में प्रांतीय सभाओं के चुनाव दोनों सदनों के लिए एक साथ हुए। राज्य की चार महिला सीटों के लिए कांग्रेस की ओर से कामाख्या देवी को प्रत्याशी बनाया गया। कामाख्या देवी और सरस्वती देवी बहुमत से जीतीं। आजादी मिलने के बाद महिलाओं को बालिग मताधिकार के आधार पर वोट देने और चुनाव में प्रत्याशी बनने का अधिकार तो मिला पर आधी आबादी को उनके अनुपात में प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

आजादी के बाद हुए 1952 से 2000 तक के विधान सभा चुनावों में 180 महिलाएं विधान सभा पहुंचीं। लोकसभा में 52 महिलाएं चुनी गर्इं। बिहार की राजनीति में उस समय नया मोड़ आया, जब 1989 में केंद्र में विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार बनी। बिहार की सत्ता का समीकरण बदला। मंडल और कमंडल की राजनीति शुरू हुई। इसके बाद आया लालू-राबड़ी का दौर। जिसमें महिलाओं ने अपने मताधिकार का जमकर प्रयोग किया। पिछड़ों की गोलबंदी का यह दौर नीतीश के नए दौर से पिछड़ गया। एक बार फिर महिलाओं ने अपनी भागीदारी निभाई। पर हर दौर में उनके मताधिकार प्रयोग का ग्राफ कम ही रहा। राजनीति में सीधी भागीदारी से लेकर वोट देने तक की लड़ाई में राजनीतिक दलों ने महिलाओं को हाशिए पर ही रखा।

21वीं सदी आते-आते महिला आंदोलन में कई उतार चढ़ाव आए। बाजारवाद और खुली अर्थ व्यवस्था ने स्त्री-पुरुष संबंधों के समीकरण को प्रभावित करना शुरू किया। सामाजिक और आर्थिक मुद्दों पर पहली बार महिलाओं ने खुलकर अपनी भागीदारी के सवाल उठाए। देश भर में जब संसद में तैंतीस आरक्षण के सवाल को लेकर आंदोलन चल रहा था तो बिहार की महिलाओं ने संसद के साथ साथ पंचायत में महिलाओं को पचास प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के सावाल को लेकर आंदोलन किया। इतिहास गवाह है की पंचायतों में महिलाओं को मिले पचास प्रतिशत आरक्षण महिला आंदोलन की ही देन है। राजनीति में अनुभवहीन होने के बावजूद उन्होंने यह चुनौती स्वीकार की। इस आंदोलन ने राजनीतिक दलों को यह समझाने पर मजबूर किया कि महिलाओं की भागीदारी के बिना समाज का पूरा विकास संभव नहीं है। ०

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