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जमीन-आसमान का अंतर है आरएसएस स्‍वयंसेवकों और सेना के प्रशिक्षण में, जानिए कैसे होती है इनकी ट्रेनिंग

कोई भी आम नागरिक जिसने मिलिट्री, पैरा मिलिट्री, स्पेशल फोर्सेस या कमांडोज जैसी ट्रेनिंग नहीं ली है, वो सीमा पर कठिन परिस्थितियों में न तो लंबे समय तक तैनात हो सकता है और न ही आतंकियों या दुश्मनों से मुकाबला कर सकता है।
संघ के स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखा के दौरान दौड़, उछल-कूद और अन्य शारीरिक अभ्यास के अलावा कुछ मौकों पर शस्त्र अभ्यास तो करते हैं लेकिन सेना जैसी कठिन ट्रेनिंग नहीं लेते।

देश में इस वक्त संघ प्रमुख मोहन भागवत के बयान पर बवाल मचा हुआ है। भाजपा और संघ विरोधी पार्टियां उनके बयान को शहीदों और सैनिकों का अपमान बता रही हैं। संघ प्रमुख ने कहा था कि आपात स्थिति से निपटने में तैयारी के लिए जहां सेना को छह से सात महीने का वक्त लग सकता है, वहीं संघ के कार्यकर्ता दो से तीन दिन में तैयार हो सकते हैं। अब बहस इस बात पर छिड़ी है कि क्या सेना के जवानों की जैसी ट्रेनिंग होती है, ठीक वैसी ही स्वयंसेवकों की भी ट्रेनिंग होती है। क्या सचमुच स्वयंसेवक सीमा पर सैनिकों जैसी मुस्तैदी दिखा सकते हैं और देश की रक्षा कर सकते हैं? क्या वो भी हथियार चलाने, कॉम्बिंग ऑपरेशन करने, कमांडोज की तरह कार्रवाई करने या दैनिक सैनिक अभ्यास के भी आदी हैं या फिर यूं ही संघ प्रमुख ने सीमा पर स्वयंसेवकों को भेजने की बात कहकर असल मुद्दों से लोगों का ध्यान भटकाया है।

दरअसल, कोई भी आम नागरिक जिसने मिलिट्री, पैरा मिलिट्री, स्पेशल फोर्सेस या कमांडोज जैसी ट्रेनिंग नहीं ली है, वो सीमा पर कठिन परिस्थितियों में न तो लंबे समय तक तैनात हो सकता है और न ही आतंकियों या दुश्मनों से मुकाबला कर सकता है। बता दें कि संघ के स्वयंसेवक प्रतिदिन शाखा के दौरान दौड़, उछल-कूद और अन्य शारीरिक अभ्यास के अलावा कुछ मौकों पर शस्त्र अभ्यास तो करते हैं, लेकिन सेना जैसी कठिन ट्रेनिंग नहीं लेते।

सेना के लोग आठ किलोमीटर तक की दौड़, ऊंची कूद, लंबी छलांग, बीम पर पुश-अप्स, जिग-जैग बैलेंसिंग, उठक-बैठक समेत पेड़ों पर रस्सी के सहारे चढ़ाई, बाधा दौड़ आदि शारीरिक अभ्यास प्रतिदिन करते हैं। मिलिट्री के जवान प्रतिदिन सुबह-सुबह करीब तीन से चार घंटे तक सेना के अधिकारियों की निगरानी में एक्सरसाइज करते हैं। उन्हें तैरने, रेंगने, कीचड़ में रेंगकर आगे बढ़ने, उबड़-खाबड़ और पहाड़ी क्षेत्रों में छिप कर आगे बढ़ने और दुश्मन के खिलाफ कार्रवाई करने की ट्रेनिंग दी जाती है। इसके अलावा गोला फेंक, भाला फेंक, डिस्क थ्रो और फायरिंग की भी ट्रेनिंग दी जाती है। इस दौरान उनके खान-पान का विशेष ध्यान रखा जाता है।

सैनिकों को दीवार फांदने, पतले रास्ते पर चलने और कंकड़ीले-पथरीले रास्तों पर भी चलने की ट्रेनिंग दी जाती है, ताकि वे ऑपरेशन के दौरान इन हालात से मुंह ना मोड़ सकें। शारीरिक अभ्यास के अलावा मानसिक तौर पर भी सैनिकों को प्रशिक्षित किया जाता है।

अधिकारी वर्ग को भू-राजनीति, भू-दृश्यों, भौगोलिक विविधता और विषम भौगोलिक परिस्थितियों की भी जानकारी दी जाती है। इनके अलावा, उन्हें मौसम संबंधी जानकारी भी दी जाती है, ताकि ऊंचे बर्फीले और दुर्गम जगहों पर सेना के लोग विषम परिस्थितियों का सामना कर सकें।

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