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समानता का अक्षर तर्क

निराला ने कविता के साथ गद्य लेखन भी खूब किया है। उन्होंने गद्य को ‘जीवन संग्राम की भाषा’ कहा है।

Aksharसांकेतिक फोटो।

वे अपने लेख ‘साहित्य की समतल भूमि’ में कहते हैं- ‘जब कोई एकदेशिक दृष्टि से किसी गंभीर प्रश्न पर रायजनी करता है तब हृदय को बड़ी कड़ी चोट पहुंचती है। एकदेशीयता स्वरूपत: संकीर्णता है। ….सीमा के अंदर घिर कर बंद रहना जिस तरह मनुष्यों की प्रकृति है उसी तरह सीमा के संकीर्ण बंधनों को पार कर जाना भी मनुष्यों की ही प्रकृति है, पहली एकदेशिक है, दूसरी व्यापक।’ साहित्य और अभिव्यक्ति को मुक्त देखने की उनकी दृष्टि से साफ है कि अपने लेखन को वे प्रगतिशील सरोकारों से जोड़ते हैं।

निराला ने जहां एक तरफ वर्णाश्रम व्यवस्था की जमकर खिचाई की है, वहीं सामाजिकता के व्याकरण में समानता की जमकर पैरोकारी भी की। ‘वर्णाश्रम धर्म की वर्तमान स्थिति’ शीर्षक निबंध में सामाजिक न्याय की आहट को महसूस करते हुए वे लिखते हैं, ‘भारतवर्ष की तमाम सामाजिक शक्तियों का यह एकीकरण-काल शूद्रों और अंत्यजों के उठने का प्रभातकाल है। …भारतवर्ष का यह युग शूद्र-शक्तिके उत्थान का युग है। और देश का पुनरुद्धार उन्हीं के जागरण की प्रतीक्षा कर रहा है।’

निराला ने परंपरा के रूढ़िगत और जड़ पक्ष पर जमकर प्रहार किया है। निराला के इस विरोध का फल उनके सामाजिक जीवन पर भी पड़ा। ‘चतुरी चमार’ में निराला ने लिखा है- गुरुमुख ब्राह्मण आदि मेरे घड़े का पानी छोड़ चुके हैं। गांव के तथा पड़ोस के अपने-अपने पिता-पितामहों को समझा चुके थे कि ‘बाबा कहते हैं, मैं पानी-पांडे थोड़े ही हूं, जो ऐरे-गैरे नत्थू-खैरे सबको पानी पिलाता फिरूं।’

दिलचस्प है कि ‘चतुरी चमार’ कहानी को निराला का आत्मवृत्त जैसा माना गया है। कह सकते हैं कि निराला अपने शब्दों में नैतिकता का कोई आडंबर नहीं रचते, बल्कि नैतिक तकाजों से निर्भीक मुठभेड़ उनकी कलम और उनकी शख्सियत दोनों का अटूट हिस्सा है।

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