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सहयोग का सफर

नेपाल इस बात को अच्छी तरह समझता है कि बिना भारत के उसका काम नहीं चलने वाला।

बुद्ध पूर्णिमा के दिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेपाल यात्रा दोनों देशों के बीच मजबूत हो रहे रिश्तों को रेखांकित करती है। वैसे तो प्रधानमंत्री पहले भी नेपाल की यात्रा पर गए हैं, पर यह दौरा पूर्व के दौरों की तुलना में अलग और ज्यादा महत्त्वपूर्ण रहा है। इस बार प्रधानमंत्री अपने नेपाली समकक्ष शेर बहादुर देउबा के विशेष न्योते पर भगवान बुद्ध की जन्मस्थली लुंबिनी पहुंचे। दोनों नेता गर्मजोशी के साथ मिले और बिजली, शिक्षा और कारोबारी क्षेत्रों में छह समझौतों पर दस्तखत किए।

इससे यह संदेश गया है कि अब भारत-नेपाल रिश्तों का नया दौर शुरू हो गया है। यह इसलिए भी अहम है कि पिछले कुछ सालों में ऐसे दौर भी आए जब दोनों देशों के बीच रिश्तों में तनाव देखने को मिलने लगा था। भारत के लिए यह पीड़ादायक तो था ही, चिंताजनक भी कम नहीं था। तब एकबारगी लगने लगा था कि जिस पड़ोसी के साथ सदियों पुराने संबंध हैं, अगर वह चीन के बहकावे में आकर इस तरह के विवाद खड़े करने लगेगा तो कैसे काम चलेगा। लेकिन भारत ने नेपाल की हर गलती को छोटे भाई की भूल समझ कर भुलाना ही उचित समझा।

नेपाल इस बात को अच्छी तरह समझता है कि बिना भारत के उसका काम नहीं चलने वाला। भारत हमेशा से नेपाल के विकास में योगदान देता आया है। भारत और नेपाल के बीच 1950 में जो ‘भारत-नेपाल शांति और मित्रता संधि’ हुई थी, उसका मूल भाव और उद्देश्य नेपाल के विकास में सहयोग करना और उसे साथ लेकर चलना ही था। फिर, भारत की विदेश नीति में नेपाल को सबसे ज्यादा तरजीह इसलिए भी दी जाती रही है कि उसके साथ न केवल भौगोलिक, बल्कि ऐतिहासिक और सांस्कृतिक रिश्ते भी सदियों से चले आ रहे हैं।

कहा भी जाता है कि दोनों देशों में रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। फिर, दोनों देशों में हिंदू और बौद्ध धर्म की वजह से भी गहरी आत्मीतया तो है ही। गौरतलब है कि नेपाल की आबादी में इक्यासी फीसद हिंदू और नौ फीसद बौद्ध हैं। इसलिए प्रधानमंत्री की लुंबिनी यात्रा को बौद्ध धर्म के संदर्भ में भारत की उदार कूटनीति के रूप में भी देखा जा रहा है। लुंबिनी में बौद्ध धर्म और परंपरा पर इंडिया इंटरनेशनल सेंटर की स्थापना कर भारत ने इसका संकेत भी दिया है।

इसमें तो अब कोई संदेह नहीं रह गया है कि पिछले कुछ सालों में भारत और नेपाल के बीच जो विवाद उठे थे, उसका कारण कारण चीन रहा है। चीन लंबे समय से नेपाल को अपने खेमे में लाने के लिए उस पर दबाव बनाता रहा है। वह चाहता है कि नेपाल भारत के खिलाफ खड़ा हो जाए। इसीलिए पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली के वक्त में नेपाल ने सीमा संबंधी कालापानी जैसे विवाद खड़े किए थे। पर पिछले साल देउबा के सत्ता में लौटने के बाद हालात बदले और नेपाल ने चीन की मंशा को भांप लिया।

नेपाल को भी अब कहीं न कहीं ऐसा लगने तो लगा है कि चीन उसे कर्ज और परियोजनाओं के जाल में फंसा कर श्रीलंका जैसी हालत में पहुंचा सकता है। कई बड़ी चीनी परियोजनाएं उसके यहां चल रही हैं। दरअसल, भारत और चीन के साथ नेपाल के रिश्तों में बुनियादी फर्क है। भारत और नेपाल के संबंधों में स्वार्थ की भावना नहीं है, जबकि चीन सिर्फ उसका इस्तेमाल कर रहा है और वह भी भारत के खिलाफ। नेपाल इस बात को समझ रहा है। वरना अब जो महत्त्व वह भारत को दे रहा है, वह शायद नहीं देता।

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