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सहयोग का सफर

यूक्रेन संकट की वजह से वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला रहा है।

भारत और रूस के बीच शीर्ष स्तर पर हुई बातचीत का स्पष्ट संकेत यही है कि वैश्विक राजनीति भले अपने ढंग से चलती रहे, लेकिन दोनों देशों के रिश्तों पर उसका कोई असर नहीं पड़ने वाला। बीते शुक्रवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच फोन पर बात हुई। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यूक्रेन युद्ध के बाद से दोनों के बीच यह चौथा लंबा संवाद है।

इससे भारत ने रूस विरोधी खेमे को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि यूक्रेन संकट के मामले पर भारत अपनी तटस्थता की नीति पर ही चलता रहेगा और ऊर्जा सुरक्षा के हित सहित जो भी फैसले करेगा, उनमें राष्ट्रहित सबसे ऊपर होगा। रूस भी भारत के इस रुख को समझ रहा है। वैसे भी भारत-रूस के संबंध ऐतिहासिक हैं। रूस दशकों से भारत का सबसे बड़ा मददगार रहा है, खासतौर से भारत को सैन्य शक्ति बनाने में। जाहिर है, ऐसे में दुनिया की कोई ताकत दोनों देशों के बीच बढ़ते रिश्तों में आड़े नहीं आ सकती। और भारत ने ऐसा करके दिखा भी दिया है। अमेरिका और पश्चिमी देशों ने रूस के विरोध के लिए भारत पर कम दबाव नहीं डाला। लेकिन भारत तटस्थता की नीति से डिगा नहीं।

वैसे दोनों नेताओं की इस वार्ता की भूमिका पिछले दिनों हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन के दौरान ही बन चुकी थी। देखा जाए तो यूक्रेन संकट को लेकर रूस भी बहुत मजबूत स्थिति में है नहीं। अमेरिका और ज्यादातर यूरोपीय देशों ने जिस तरह के प्रतिबंध उस पर थोप दिए हैं, उससे रूसी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ने लगा है। फिर, युद्ध में रूस को भारी-भरकम रकम खर्च करनी पड़ रही है। इससे भी उसकी घरेलू अर्थव्यवस्था प्रभावित हो रही है। ऐसे में भारत जैसे पुराने मित्र राष्ट्रों के साथ व्यापार बढ़ाना उसे मजबूती ही देगा।

इस लिहाज से हाल में दोनों नेताओं की वार्ता बढ़ते कारोबारी रिश्तों को रेखांकित करती है। अभी चिंता की बात यह है कि यूक्रेन युद्ध की वजह से दुनियाभर में कच्चे तेल और गेहूं का संकट गहरा गया है। ज्यादातर देश रूस और यूक्रेन से गेहूं तथा तेल खरीदते हैं। इसके अलावा रूस ज्यादातर यूरोपीय देशों को प्राकृतिक गैस भी देता है। पर अब यूक्रेन एक तरह से तबाह हो चुका है। उसका कारोबार ठप हो गया है। इससे दुनियाभर में अनाज और कच्चे तेल का संकट गहरा गया है। इसे देखते हुए भारत और रूस कृषि उत्पादों, उर्वरक और फार्मा उत्पादों का कारोबार बढ़ाने पर सहमत हुए हैं।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जंग के मैदान में यूक्रेन भी रूस को जम कर छका रहा है। हालांकि रूस का पलड़ा भारी इसलिए है कि क्योंकि यूक्रेन के मुकाबले उसके पास कई गुना सैन्य शक्ति है। फिर रूस परमाणु शक्ति संपन्न महाशक्ति है और इस वक्त दुनिया में सबसे ज्यादा परमाणु हथियार भी उसी के पास होने की खबरें आती रही हैं। ऐसे में रूस को हरा पाना यूक्रेन के लिए आसान नहीं है।

लेकिन विदेशी ताकतों के बल पर यूक्रेन जिस तरह से मैदान में टिका हुआ है, वह भी कम बड़ी बात नहीं है। न केवल यूक्रेन के सैनिकों, बल्कि उसके नागरिकों का मनोबल भी रूसी ताकत पर भारी पड़ रहा है। यूक्रेन संकट की वजह से वैश्विक राजनीतिक परिदृश्य तेजी से बदला रहा है। अमेरिका यूरोप में नाटो के और विस्तार में लगा है। साफ है कि युद्ध खत्म करने के बजाय उसे और भड़काने के ही काम हो रहे हैं। दुनिया के देशों को सोचना चाहिए कि अब इस आग में और घी न डालें। सबकी भलाई इसी में है कि समस्या का शांतिपूर्ण कूटनीतिक हल निकालें, जिसका भारत शुरू से ही पक्षधर रहा है।

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