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हमारी याद आएगी: …और गब्बर बच गया

गोपालदास परमानंद सिपाहिमलानी यानी जीपी सिप्पी ने 1965 से लेकर 1975 तक मिट्टी भी छुई, तो सोना बन गई। इस दौर में ‘मेरे सनम’, ‘राज’, ‘ब्रह्मचारी’, ‘बंधन’, ‘अंदाज’, ‘सीता और गीता’ ने बॉक्स आॅफिस पर खूब कमाई की। इस कारोबारी, वकील, भवन निर्माता, फिल्म निर्माता-निर्देशक ने 17 फिल्में बनाई। आधा दर्जन निर्देशित भी कीं, मगर ‘शोले’ कंपनी के लिए टकसाल साबित हुई। फिल्म फेडरेशन आॅफ इंडिया, प्रोड्यूसर्स गिल्ड जैसी संस्थाओं के अध्यक्ष रहे जीपी सिप्पी की आज 104वीं जयंती है।

गोपालदास परमानंद सिपाहिमलानी (14 सितंबर,1914-25 दिसंबर, 2007)

‘अदाज’ के बाद 1972 में 40 लाख लागत की ‘सीता और गीता’ जैसी हिट फिल्म देने के बाद निर्देशक रमेश सिप्पी ने पिता जीपी सिप्पी से कहा कि उनकी अगली फिल्म भव्य होगी, हॉलीवुड की एक्शन फिल्म की तरह। जीपी सिप्पी इसके लिए कहानी तलाश करने लगे। उनके स्टोरी डिपार्टमेंट के लेखक सलीम-जावेद ने उन्हें दो कहानियां सुनार्इं। ‘ईमान धरम’ और ‘शोले’। ‘ईमान धरम’ दो लाख की थी और ‘शोले’ डेढ़ लाख की।

सिप्पी ने ‘शोले’ चुनी और ‘ईमान धरम’ बाद में प्रेमजी ने अमिताभ-शशि कपूर को लेकर बनाई। ‘शोले’ बदले की कहानी थी। एक डाकू जेल से भाग कर बदले के लिए सैन्य अधिकारी के परिवार के सभी लोगों की हत्या कर देता है और अधिकारी के हाथ काट देता है। अधिकारी दो गुंडों की मदद से उसे जिंदा पकड़ता है और अपने कील ठुके हुए जूतों से कुचल कर मार डालता है। कहानी में सेना अधिकारी को बदल कर पुलिस अधिकारी कर शूटिंग शुरू हो गई और एक करोड़ का बजट तीन करोड़ पर पहुंच गया। फिल्म बनी और सेंसर में भेज दी गई। सेंसर ने कहा कि फिल्म का क्लाइमैक्स बदलें। ठाकुर (संजीव कुमार) कानून हाथ में लेकर गब्बर की हत्या नहीं कर सकता। वकील जीपी सिप्पी खुद निर्देशक थे। उनका तर्क था कि अगर कोई डाकू बड़ी ही निर्दयता से किसी के पूरे परिवार को, यहां तक कि छोटे बच्चे तक को, मार डाले तो गुस्से में कोई भी व्यक्ति ऐसे डाकू को मार डालेगा। मगर सेंसर ने उनकी नहीं सुनी। सिप्पी पिता पुत्र ने क्लाइमैक्स बदल दिया।

तो हुआ यह कि बदले की कहानी ‘शोले’ में डाकू गब्बर से लोगों को बचाने के लिए पूरी फिल्म में जो पुलिस कहीं नजर नहीं आती, वह अचानक क्लाइमैक्स में प्रकट होकर गब्बर को तब बचा लेती है, जब ठाकुर उसे जूते से कुचलने वाला होता है। पुलिस गब्बर को लेकर चली जाती है। रमेश सिप्पी की परेशानी खत्म हो जाती है मगर जीपी सिप्पी की परेशानी खत्म नहीं होती। 15 अगस्त 1947 को फिल्म मुंबई में रिलीज हुई, तो कई थियेटर में बहुत कम उपस्थिति थी। कुछ थियेटरों में से फिल्म हटाने की भी बात चली। सिप्पी और फिल्म के लेखक-सलीम जावेद में फिल्म की असफलता के पोस्टमार्टम के लिए बैठकों का दौर चला। कुछेक दृश्य चिह्नित किए गए। उनकी रीशूटिंग कर फिल्म में जोड़ने पर विचार किया गया। गब्बर सिंह की आवाज असफलता की एक वजह मानी गई। मगर दो हफ्ते बाद सिनेमाघरों में अचानक भीड़ बढ़ने लगी और देखते-ही-देखते सिनेमाघर हाउसफुल हो गए। तब इसे देश के अन्य शहरों में अक्तूबर में रिलीज किया गया। फिल्म जहां लगी वहां हाउसफुल होने लगा। फिल्म के संवादों के रेकॉर्ड गली-मोहल्लों में गूंजने लगे। गब्बर के संवाद फिल्म की हाईलाइट बन गए।

शोले ने जीपी सिप्पी को अपार प्रतिष्ठा दी। फिल्म ने 60 से ज्यादा शहरों में गोल्डन जुबिली और 100 से ज्यादा शहरों में सिल्वर जुबिली मनाई। मुंबई के मिनर्वा थियेटर में यह लगातार पांच सालों तक चलती रही। फिल्म के सारे किरदार मशहूर हुए। इस फिल्म से असरानी, जगदीप, मैक मोहन, वीजू खोटे जैसे छोटी-छोटी भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार चर्चित हो गए। सिप्पी की शोले ने अमजद खान और टीवी सीरियल बुनियाद ने आलोकनाथ के करिअर को उछाल मिली। मगर वक्त के खेल निराले होते हैं। जिस सिप्पी फिल्म्स ने राजेश खन्ना जैसा सुपर स्टार दिया, उसमें बीते 20 सालों से सन्नाटा है। सिप्पी परिवार की पिछली फिल्म ‘हमेशा’ 1997 में रिलीज हुई थी। आज ‘अंदाज’, ‘सीता और गीता’, ‘शोले’, ‘शान’, ‘शक्ति’ निर्देशित करने वाले रमेश सिप्पी उस ज्वालामुखी की तरह खामोश हैं, जो अपना सारा लावा उगल चुका हो। ‘शोले’ के एक संवाद का सहारा लें तो कहा जा सकता है कि सिप्पी फिल्म्स में इतना सन्नाटा क्यों है भाई!

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