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कहानीः पछतावा

शाम का धुंधलका हो चला था। आंगन मेंं लगे अमरूद के पेड़ पर चिड़ियों के चहचहाने की मधुर आवाज लक्ष्मण के मन को सुकून देने लगी। चिड़िया अपने बसेरे में आकर कितनी खुश हैं, यह देख कर उसकी आंखें आंसुओं से नम हो चलीं।

Author Updated: February 7, 2016 12:38 AM

सुधा तैलंग
शाम का धुंधलका हो चला था। आंगन मेंं लगे अमरूद के पेड़ पर चिड़ियों के चहचहाने की मधुर आवाज लक्ष्मण के मन को सुकून देने लगी। चिड़िया अपने बसेरे में आकर कितनी खुश हैं, यह देख कर उसकी आंखें आंसुओं से नम हो चलीं। काश! उसके घर में भी उसके बीबी-बच्चों की रौनक होती। उसका पूरा जीवन ही अब सूना सा हो गया है। एक-एक कर सब उसे छोड़कर चले गए हैं। अपनी ही गलती की वह सजा तो वह भुगत रहा है।
लक्ष्मण की आंखों के सामने पुरानी बातें फिल्मी रील की तरह प्रतिबिंबित होने लगीं। पूरे गांव में बाबूजी दशरथ प्रसाद का परिवार एकता और प्रेम के लिए पूरे गांव में चर्चित था। उन्होंने अपने घर का नाम भी रामायण रखा था। दोनों बेटों के नाम भी राम और लक्ष्मण रखे। दो बेटे, दो बेटियों की परवरिश एक साधारण मास्टर होते हुए भी बेहतर तरीके से की। बड़े भैया तो पढ़ लिख कर अच्छी नौकरी में लग गए। दोनों बहनों की भी शादी हो गई। वे अपने घर चली गर्इं। पर उसका मन जरा भी पढ़ाई में नहीं लगता था, इसलिए बाबूजी ने सेवानिवृत्ति ले कर उसके लिए एक खेत खरीद दिया, ताकि खेती बाड़ी कर कुछ कमा सके।
बचपन से अम्मा-बाबूजी ने ऐसी परवरिश की कि पूरा परिवार एक-दूजे से इस कदर जुड़ गया था कि सब आश्चर्य करते कि आज के युग में भी भाई -भाई में ऐसा प्रेम है। बड़े भैया के दोनों बेटों की उम्र लक्ष्मण की उम्र से थोड़ी ही छोटी थी। लक्ष्मण के ऊपर ही पूरे घर परिवार की जिम्मेदारी थी। किराने का सामान लाना हो, पानी -बिजली का बिल भरना, बीमार की तीमारदारी या फिर रिेश्तेदारी निभाना। सब कुछ उसी के जिम्मे था । सबसे छोटे होने पर भी वह जिम्मेदारी निभाते-निभाते बेहद समझदार हो गया था।
लक्ष्मण के बिना घर का कुछ भी काम नहीं होता था।
बडेÞ भैया को तो नौकरी से फुर्सत ही नहीं मिलती थी। ये सब काम करते हुए भी लक्ष्मण अपने आपको भाग्यशाली मानता था। समय के साथ उसकी भी शादी की उम्र हो गई थी। अम्मा ने दबी जुबान से बात उठाई कि जल्दी ही लड़की की तलाश की जाए, तो बड़े भैया ने शहर जाकर उसके लिए पढ़ी-लिखी, सीधी सादी घरेलू लड़की तलाश ली। फटाफट शादी हो गई। उर्मिला जल्दी ही घुल मिल गई। पर लक्ष्मण को अपनी पत्नी के लिए समय ही नहीं मिलता। भाभी की ही पूरे घर में तूती बोलती थी।
उसे लगने लगा था कि शादी के बाद लक्ष्मण की स्वयं की गृहस्थी हो जाएगी, उनकी जिम्मेदारी का बोझ कौन उठाएगा? भाभी ने धीरे-धीरे पति-पत्नी के रिश्तों में खटास लाना शुरू कर दिया। नई बहू के हर काम में मीन-मेख निकालकर वह उसे लक्ष्मण की नजरों में गिराने की कोशिश में थी। बच्चे भी नई चाची को परेशन करने में जुटे रहते। उर्मिला ने लक्ष्मण को समझाने की काफी कोशिश की लेकिन उस पर तो परिवार के प्रेम का जादू था, क्योंकि शादी तो उसने मजबूरी में केवल अम्मा बाबूजी की इच्छा के चलते की थी।
उर्मिला के अपमान को भोला भाला-सा लक्ष्मण चुपचाप देखता रहता। भाभी के खिलाफ भला वह कैसे बोलता ? उर्मिला भी चुपचाप आंसुओं के घूंट पीकर रह जाती। पढ़ी-लिखी तो थी, लेकिन पति नौकरी में नहीं था। सोचा कि वही नौकरी करके आत्मनिर्भर बन जाए। पर भला घर के लोगों को उसकी नौकरी कैसे पंसद आती। जेठ-जेठानी ने जंग छेड़ दी कि नई बहू नौकरी नहीं करेगी। शिक्षक की नौकरी निकलते ही उर्मिला ने चुपके से आवेदन तो कर दिया, चुन भी ली गई, पर गांव में भला बहू नौकरी कैसे करे, परिवार की जगहंसाई होगी। उसके सपने धराशायी हो गए।
नई बहू को इतना परेशान किया जाने लगा की वह बार-बार मायके जाने लगी, पर अम्मा बाबूजी के लाड़-प्यार और समाज के उसूलों को देखकर उसे वापस ससुराल आना ही पड़ता। पति तो उसका होकर भी नहीं था। तीन साल बीत गए। लक्ष्मण एक बेटे का बाप भी बन गया, पर शरमीले स्वभाव और परंपरावादी विचार का होने के नाते बेटे को हाथ भी नहीं लगाता, गोद लेने की बात तो दूर रही। समय तेजी से बीत रहा था, तभी फिर से शिक्षक की नौकरी निकली। इस बार अम्मा ने जोर जबरदस्ती कर उर्मिला को नौकरी करवाने की ठान ली। अम्मा की जिद के आगे आखिर सबको झुकना ही पड़ा ।
उर्मिला पास के गांव में शिक्षक बन गई। लक्ष्मण ने कभी उर्मिला की सुध भी नहीं ली। भाई-भाभी, भतीजों की जिम्मेदारी के संग बूढेÞ-अम्मा-बाबू की देखभाल का बोझ उठाने में अपनी शादीशुदा जिंदगी को भूल ही गया था। इसी बीच अम्मा को कैंसर हो गया। पत्नी के जेवर गिरवी रख, कर्जा लेकर लक्ष्मण ने अम्मा का इलाज कराया, पर उन्हें बचा नहीं पाया। अम्मा के चले जाने के बाद उर्मिला की परेशानियां बढ़ती गर्इं। वह अकेली हो गई ।
थक हार कर उर्मिला के भाई ने उसका तबादला रायगढ़ करा लिया और उर्मिला अपने बेटे के साथ मायके चली गई। लक्ष्मण ने उसे रोकना भी चाहा, पर संकोच और संयुक्त परिवार के कायदे के चलते वह मौन देखता रहा। सबके सामने तो यही कहता रहा कि पढ़ी-लिखी शहर की लड़कियां ऐसी ही होती हैं। उर्मिला के चले जाने के बाद भैया-भाभी को और भी आजादी मिल गई। खेत खलिहान की पूरी जिम्मेदारी लक्ष्मण के हाथों में थी। देर रात तक थका लक्ष्मण लौटकर खेत की साग-सब्जी की कमाई भाभी के हाथ में लाकर रख देता, ठंडा बचा-खुचा खाना खाकर सो जाता। उर्मिला थी तब कितने मनुहार से उसे गरमागरम खाना परोसती थी। अकेलेपन का अहसास अब उसे होने लगा। बेटा मनु कभी-कभी आकर बतिया भी लेता था, पर अब वह किससे बात करे। भैया भाभी के ठहाकों की आवाज उसके मन को चोटिल करती ।
कुछ ही दिनों में बाबू ने भी खाट पकड़ ली। दवा-दारू में खर्च भी किया, पर वे भी चल बसे। अम्मा-बाबूजी के चले जाने के बाद अब उसका दर्द बांटने वाला कोई नहीं था। बड़े भैया के दोनों बेटों की भी शादी हो गई। शादी में लक्ष्मण ने पूरी जमा पूंजी खर्च कर दी।
बहुओं के आते ही भैया-भाभी ने घर का बंटवारा कर लिया। कच्चा मकान लक्ष्मण को मिला और पक्का मकान भैया-भाभी ने लिया। अकेले आदमी हो कहीं भी रह जाओगे, हमारे तो दो-दो बहुएं है, उन्हें रहने के लिए अलग कमरे चाहिए, ये कहकर भाभी ने सफाई पेश की। वह चुप ही रहा, बोलकर करता भी क्या। उसकी आंखों पर तो भाई-भाभी के प्यार की पट्टी पड़ी हुई थी। धीरे-धीरे भैया-भाभी, बच्चे जो रात-दिन उसके पीछे घूमते रहते थे, वे दूर होते गए। कभी खाना मिल गया तो ठीक है,वरना चूल्हे में उसे खुद ही खाना बनाना पड़ता ।

चिंता और तनाव ने उसे अंदर ही अंदर तोड़ दिया। अलग होने के बाद भाई-भाभी ने खेत को बेचकर एक प्लॉट खरीद लिया और मकान बनवा लिया। पुराना मकान किराए पर दे दिया। अब लक्ष्मण को धीरे धीरे कुछ कुछ बात समझ में आई। वह सोचने लगा, मैं कैसा बदनसीब और मूर्ख हूं कि पूरे परिवार के प्रति पूरा जीवन समर्पित करता रहा और अपने बीवी-बच्चों को जरा भी सुख नहीं दे पाया। एक पिता पति की क्या जिम्मेदारी होती है, उसने कभी निभाने की कोशिश भी नहीं की। जिसके लिए अपनों को छोड़ा वही अब उसे छोड़ कर चले गए। अब तो वह अकेला ही रह गया है, इस वीरान से घर में ।
किससे बात करें, किसके पास बैठे। जिस आंगन में पूरे दिन चहल पहल रहती थी ? वह अब सूना हो चला है। सब कुछ उजड़ गया, लंबी वीरान-सी जिंदगी कैसे बिताएगा अकेला। अब उसे पछतावा हो रहा था, पूरा जीवन समर्पित करने के बाद भी उसे क्या मिला इस स्वार्थी संसार से। काष! उसे परख होती, तो वह इस कदर अपनो से ही नहीं लुटता।
तभी एक ही झटके में विचारों का सैलाब टूट गया। बाहर आगंन में चिड़ियों की आवाज तेज हो गई । कुछ ही पलों में दूर मन के कोने में आशा की एक धुधंली-सी किरण उसे नजर आने लगी।
उसने बैग में अपने कपड़े रखे और अपनी पत्नी उर्मिला के पास जाने के तैयारी में लग गया। उसे पूरी विश्वास था कि उर्मिला उसे जरूर माफ कर देगी। वह अब उर्मिला को जरूर अपने साथ ही लेकर आएगा। उससे तबादला कराने को कहेगा। उसे पूरा विश्वास है कि वह जरूर वापस आएगी। सुबह का भूला अगर शाम को घर वापस आ जाए तो उसे भूला नहीं कहते। वह जी-जान से मेहनत करेगा, अपनी उर्मिला के अधूरे सपनों को पूरा करेगा।
पांच वर्षों के लंबे अंतराल के बाद वह अपने बेटे मनु और उर्मिला को ढेरों खुशियां देकर पूरा करेगा। उसकी आंखो में पछतावे के आसू थे। उसने बैग उठाया और चल पड़ा उर्मिला से मिलने। अपनी गलतियों और भूलों का प्रायश्चित करने। ०

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