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हमारी याद आएगी: जब मूंछों के दम पर महफिल लूट ली…

कन्हैयालाल कैमरे के सामने खड़े होकर हाथ नचाते, आवाज के उतार-चढ़ाव के साथ संवाद बोलते थे तो सामने खड़ा कलाकार प्रतिक्रिया करना भूल कर बस उनके सहज, स्वाभाविक अभिनय में खो जाता था। उनके साथी कलाकारों का मानना था कि कैमरे के सामने कभी लगा नहीं कि कन्हैयालाल एक्टिंग कर रहे हैं। ‘मदर इंडिया’ के बाद तो कन्हैयालाल के सह कलाकार उनके दीवाने बन गए थे। कन्हैयालाल ने ‘गंगा जमना’, ‘उपकार’, ‘गोपी’, ‘धरती कहे पुकार के’, ‘हम पांच’ जैसी सौ से ज्यादा फिल्मों में अपना हुनर दिखा कर सिनेमाप्रेमियों के दिलों में अपनी जगह बनाई थी।

Author नई दिल्ली | Published on: August 16, 2019 4:18 AM
सांकेतिक तस्वीर।

गणेशनंदन तिवारी

मेकअप फिल्मों का अभिन्न हिस्सा है और कलाकारों को ज्यादातर उस पर निर्भर रहना पड़ता है। आज तो कलाकार बिना मेकअप कैमरे के सामने खड़े होने की कल्पना भी नहीं कर सकते। मगर कन्हैयालाल को महबूब खान निर्देशित ‘औरत’ (1940) में सुक्खीलाला की भूमिका बिना मेकअप के करनी पड़ी थी। फिल्म की निर्माता कंपनी नेशनल स्टूडियो (जिसमें सागर मूवीटोन कंपनी समाहित हो गई थी, जो देश की पहली बोलती फिल्म ‘आलमआरा’ बनाने वाले आर्देशीर ईरानी ने चिमनलाल देसाई और अंबालाल पटेल की साझेदारी में शुरू की थी) का मेकअपमैन दूसरे कलाकारों का मेकअप तो खुशी-खुशी करता था, मगर कन्हैयालाल की उपेक्षा करता था। तब कंपनी का मेकअपमैन ही सारे कलाकारों का मेकअप करता था।

मजबूरी में बिना मेकअप के कन्हैयालाल को कैमरे के सामने खड़ा होना पड़ता था। मेकअप के नाम पर उनके चेहरे पर मूंछ भर होती थी, जो वह खुद अपने हाथ से चिपका लेते थे। उन्होंने अपनी मजबूरी कैमरामैन फरदून ईरानी को बताई तो ईरानी ने कन्हैलाल को आश्वस्त किया कि वे सब संभाल लेंगे। फरदून ने ज्यादातर रोशनी कन्हैयालाल के चेहरे पर फोकस की और उन्हें बिना मेकअप के ही फिल्माया। ‘औरत’ सफल रही और बिना मेकअप के ही कन्हैयालाल ने महफिल लूट ली, क्योंकि मुंबई फिल्मजगत में हर कोई कन्हैयालाल के काम की ही चर्चा कर रहा था।

इसके 17 सालों बाद… महबूब खान ने खुद की कंपनी खोली ली थी। उन्होंने ‘औरत’ के रीमेक अधिकार खरीदकर 1957 में उसे ‘मदर इंडिया’ नाम से बनाया। ‘औरत’ कर्ज में दबे एक किसान परिवार की पीड़ा और परेशानियों को उभारती थी जबकि ‘मदर इंडिया’ का फोकस औरत के सशक्तीकरण (और नरगिस) पर ज्यादा था। ‘औरत’ के कलाकारों और तकनीशियनों में से सिर्फ तीन लोगों का चुनाव ही ‘मदर इंडिया’ के लिए हुआ था। लेखक वजाहत मिर्जा, कैमरामैन फरदून ईरानी और कन्हैयालाल। ‘मदर इंडिया’ में राजकुमार वाला किरदार ‘औरत’ में गोविंदा के घुंघराले बालों वाले पिता अरुण (अरुण कुमार आहूजा) ने निभाया था।

‘मदर इंडिया’ ने न सिर्फ बॉक्स आॅफिस पर सफलता का परचम लहराया था, इसे आॅस्कर पुरस्कारों की विदेशी फिल्म श्रेणी में नामांकन के लिए भारत की ओर से भिजवाया गया था। फिल्म के बाद तो मानो कन्हैयालाल पर मुनीम और लाला की भूमिकाएं चिपक ही गईं। बनारस में पैदा हुए कन्हैयालाल के पिता की अपनी नाटक कंपनी थी। सिनेमा के आने के बाद नाटक कंपनियों की हालत खस्ता होने लगीं। कन्हैयालाल को पिता ने नाटकों की दुनिया से दूर रखने की बहुत कोशिश की, मगर सफल नहीं हुए। कन्हैयालाल ने पहले नाटकों का लेखन शुरू किया, बाद में छोटी-छोटी भूमिकाएं भी करने लगे।

पिता ने निधन के बाद मुंबई आए कन्हैयालाल ने अपना लिखा हुआ नाटक ‘15 अगस्त’ मंचित किया था। वह मुंबई लेखक-निर्देशक बनने आए थे मगर उन्हें किसी ने फिल्म का निर्देशन नहीं सौंपा। छिटपुट भूमिकाएं करने के बाद कन्हैयालाल वापस वाराणसी चले गए। कुछेक सालों के बाद कन्हैयालाल चिमनलाल देसाई (सागर मूवीटोन) के बेटे वीरेंद्र देसाई की मदद के लिए वापस मुंबई आए। इस बार निर्देशन का भूत दिमाग से उतार कर अभिनेता के रूप में काम शुरू किया। ‘मदर इंडिया’ में सुक्खीलाला की भूमिका के बाद तो लोग कन्हैयालाल के मुरीद बन गए थे।

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