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तीरंदाज: प्रेम न बाड़ी ऊपजै…

किसी अनाम जापानी दार्शनिक की बात कि प्रेम हमें घर ले जाता है, एक तरह से शाश्वत सत्य है, क्योंकि प्रेम की हूक उठने पर हम घर की ओर अनायास ही मुड़ जाते हैं।

Author Published on: August 25, 2019 4:39 AM
प्रतिकात्मक चित्र।

अश्विनी भटनागर

जिंदगी हमें कई अप्रत्याशित जगहों पर ले जाती है, मगर प्रेम हमें घर ले आता है। पर घर कहां है? और प्रेम कहां है? क्या प्रेम की वजह से घर बनता है या घर बनने से प्रेम उसमें स्वयं ही उपज आता है? प्रेम की परिभाषा और उसकी सत्यता क्या है?

किसी अनाम जापानी दार्शनिक की बात कि प्रेम हमें घर ले जाता है, एक तरह से शाश्वत सत्य है, क्योंकि प्रेम की हूक उठने पर हम घर की ओर अनायास ही मुड़ जाते हैं। हमेशा ऐसा लगता है कि जिंदगी में तमाम अप्रत्याशित मुकामों पर पहुंचने और उनके मेलों से गुजरने के बाद अगर हमें कहीं दिली चैन मिल सकता है, तो वह जगह सिर्फ घर है। हमारे लिए घर वह नर्म और आरामदेह दुशाला है, जिसमें दुबक कर बैठने का सुख हमारी कल्पना को सरस कर देता है।

दरअसल, घर गर्भस्थ अवस्था में लौट जाने की अतृप्त ललक का प्रतीक है। वह ममतामय पोषण की कल्पना का सजीव आकार है। ममता प्रेम की प्राण वायु है। ममता विहीन प्रेम स्थूल शरीर मात्र है, जो जल्दी ही सड़ जाता है। इसीलिए वह प्रेम जो ममता से ओतप्रोत नहीं है, कभी घर नहीं बना सकता और न ही वह स्थायी रह सकता है। उसमें जल्दी ही वासना, ईर्ष्या, प्रतिस्पर्धा, दंभ, स्वार्थ आदि के कीड़े पड़ जाते हैं। वह नष्ट हो जाता हैं।

ममतामय प्रेम का जरूरी कारक आपसी श्रद्धा है। इसको पारस्परिक सम्मान भी कहा जा सकता है। वास्तव में, प्रेम का बीज तभी अंकुरित होता है जब उसमें दूसरे के प्रति सम्मान निहित होता है। जिसकी हम इज्जत नहीं करते, उससे हम कभी प्रेम नहीं कर सकते हैं। हमारे दिल में किसी के लिए कोमल भावनाएं तभी फूटती हैं, जब उस व्यक्ति का कोई कृत्य हमें अच्छा लगता है। यानी जब उसके प्रति हममें श्रद्धा उत्पन्न होती है। इस इज्जत/ श्रद्धा भाव के आते ही प्रेम का पदार्पण होता है और उसकी आहट से ममता जाग उठती है।

प्रेम और घर की परिकल्पना मानव मानस के केंद्र में हमेशा से रही है। संत कबीर कहते हैं :

कबीर प्रेम न चक्खिया, चक्खि न लिया साव।
सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव॥

यानी जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उस अतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसे आता है, वैसे ही चला भी जाता है। वह कुछ प्राप्त नहीं कर पाता है। प्रेम की महिमा बखान करते हुए वे कहते हैं :

कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आइ।
अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराइ॥

यानी प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पड़ा, जिससे मेरी अंतरात्मा तक भीग गई है। इससे मेरा पूरा परिवेश हरा-भरा, खुशहाल हो गया है। यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है! हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते हैं? पर प्रेम को पाना आसान काम नहीं है। कबीर के अनुसार, प्रेम खेत में नहीं उपजता, न ही बाजार में बिकता है। चाहे कोई राजा हो या प्रजा- अगर उसको पाना है तो उसके लिए उन्हें आत्मबलिदान करना पड़ेगा। त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता है। प्रेम गहन भावना है, यह खरीदी-बेची नहीं जा सकती :

प्रेम न बाड़ी ऊपजै प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचे सीस देइ ले जाय॥

इस दोहे में सीस देने की बात कही गई है। आलंकारिक रूप में लें या शाब्दिक में, उनका कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि प्रेम करने के लिए साहस चाहिए। आत्मबलिदान साहसी व्यक्ति ही कर सकता है और इसीलिए प्रेम करना बुजदिल लोगों के बस की बात नहीं है। कायर व्यक्ति चूंकि खुद का सम्मान नहीं करता, इसलिए दूसरे का भी तिरस्कार करता है। अपनी बेकद्री करने की वजह से दूसरों की बेकद्री करने का भाव उसमें पनपता रहता है। उसमें ममता मर जाती है और वह प्रेम के अनुभव से वंचित रह जाता है। वह कू्रर हो जाता है। कू्ररता कायरता का स्वत: सिद्ध प्रमाण है।
पर प्रेम की तलाश सभी को रहती है और वह घर पर ही मिल सकता है। यह लालसा कायर की भी होती है और साहसी व्यक्ति की भी। दोनों में फर्क सिर्फ इतना है कि एक घर के लिए सामान जुटाता है, तो दूसरा जुटे हुए सामान को उजाड़ता है। शायद उजाड़ने वाले को बोध नहीं होता कि वास्तव में प्रेम और घर का रिश्ता क्या है और इस रिश्ते का महत्त्व क्या है। वह अप्रत्याशित जगहों, जहां उसे जिंदगी ले जाती है, में फंस कर रह जाता है। अपनी सूझ का इस्तेमाल नहीं करता है। प्रेम की कल्पना ही करता है, घर कभी नहीं पहुंच पाता।

वैसे घर और उसमें व्याप्त प्रेम की कल्पना जमीन और उससे जुड़े परिवेश से भी जुड़ी है। जमीन और परिवेश विहीन घर वास्तव में घर नहीं हो सकता है। अक्सर लोगों को अपनी जमीन किसी मजबूरी की वजह से त्यागनी पड़ती है। वह मजबूरी युद्ध हो सकती है या फिर रोजगार की तलाश। पर नए परिवेश में बसना बेहद मुश्किल काम है। वह एक कामचलाऊ व्यवस्था होती है, चाहे वह कितनी भी सुविधा से लैस क्यों न हो। घूम-फिर के घर और उसके परिवेश की टीस दिल और दिमाग में हिलोरें मारती रहती है। जड़ें वापस खींचती रहती हैं।

ऐसी स्थिति बड़ी असमंजस वाली होती है। व्यक्ति अपने से ही पराया होता जाता है। फलस्वरूप उसमें अपनों के लिए ही ममता का ह्रास होता जाता है। वह कठोर हो जाता है। उसमें प्रेम की कल्पना भी मर जाती है। उसके लिए घर का मतलब मकान हो जाता है। वह अट्टालिकाओं में कैद होने को अपना प्राकृतिक स्वभाव मानने लगता है। हर शाम, ताजिंदगी, घर की तरफ निकलता है और मकान तक ही पहुंच पाता है। प्रेम को तलाशता है, पर आभासी प्यार ही पा पाता है। इसीलिए आज जीवन क्रूर और नीरस है, और आदमी कायर। वह पूरी तरह से उजड़ चुका है। उसका आभासी प्यार सूने पेड़ पर उलटा लटका है- एकदम बेघर।

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