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कहानीः संकल्प

छुट्टी होते ही सभी बच्चे स्कूल से ऐसे भागे जैसे किसी पिंजरे से निकल पक्षी खुले आकाश में घूमने जा रहे हों। धीरे-धीरे पूरा स्कूल खाली होता गया।

Author March 13, 2016 2:23 AM
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छुट्टी होते ही सभी बच्चे स्कूल से ऐसे भागे जैसे किसी पिंजरे से निकल पक्षी खुले आकाश में घूमने जा रहे हों। धीरे-धीरे पूरा स्कूल खाली होता गया। धवल भी अपनी बैसाखी के सहारे बाहर निकलने लगा तो नकुल फिर आदतन उसे छेड़ते हुए बोला, ‘क्यों बे लंगड़े, अपने आपको बड़ा होशियार समझता है। इस स्कूल में आलराउंडर सिर्फ मैं हूं। पढ़ाई के साथ-साथ खेलकूद में भी अव्वल। चाहे तू पढ़ाई में कितना ही अव्वल रहे, लेकिन इस जन्म में आलराउंडर कभी नहीं बन सकता। तू बिना बैसाखी के चल जो नहीं सकता । दौड़ेगा क्या खाक.. ।’ वह फिर हीं हीं कर हंसने लगा।
धवल हर चीज में अव्वल था सिवाय खेल-कूद के।
धवल का पिता शंकर रोड पर चाय की दुकान लगाता था और जी-तोड़ मेहनत कर धवल के पैर के आॅपरेशन के लिए रुपए जमा कर रहा था। धवल की मां पार्वती भी शंकर के साथ ही पकौड़े तलती थी।
उस दिन स्कूल से आते ही धवल अपने एक कमरे की कोठरी में बैसाखी एक ओर रख पलंग पर लेट गया। आज नकुल की बातों से वह बहुत आहत हो गया था। इसी बीच पार्वती उसे खाना देने के लिए आई तो उसने मां को आते देख कर अपने आंसू झट से पोंछ लिए। भला, मां से कोई बात कैसे छिप सकती है? वह धवल को उदास देखकर बोली, ‘बेटा, क्या बात है?’ मां के बहुत जोर देने पर भी धवल ने पार्वती को अपनी उदासी का कारण नहीं बताया। सोचते-सोचते उसने एक निश्चय किया और फिर सो गया।
सुबह पार्वती ने धवल को बिस्तर पर नहीं पाया तो वह परेशान हो गई और बदहवास सी होकर शंकर से धवल के बारे में बताया। काफी खोजबीन के बाद भी धवल न मिला । तभी कोठरी में धवल की बैसाखियों की ठक-ठक की आवाज आई तो दोनों ने सिर उठाकर देखा तो पाया कि धवल बैसाखियों के सहारे उनके पास खड़ा था। पार्वती ने उसे झकझोरते हुए उसके गायब होने की बात जाननी चाही। मां की बुरी हालत देखकर धवल बोला कि वह तो सुबह की सैर पर गया था। अब वह रोज सुबह सैर के लिए जाएगा और व्यायाम और योग करेगा।
इस प्रकार धवल ने अपने संकल्प को पूरा करने और विजय पाने का अभ्यास शुरू कर दिया। सैर पर जाते-जाते उसे छह माह बीत गए। अब वह पार्क में पहुंचते ही बैसाखियों को एक ओर रख बिना सहारे के चलने का प्रयास करता। बाकी सब उसके संकल्प और प्रयास से अंजान थे।
इसी बीच उसकी परीक्षाएं भी हो गर्इं। धवल प्रथम था और नकुल द्वितीय। अब धवल सातवीं कक्षा में आ गया था। वह बिना बैसाखियों के थोड़ा-थोड़ा चलने लगा था। एक दिन पार्वती धवल से बोली, ‘बेटा, आजकल तो घर में तू सिर्फ अपने स्कूल का होमवर्क करने या फिर खाना खाने ही आता है। तू दिनभर क्या करता रहता है?’
मां की बात सुनकर धवल पार्वती के कंधों पर हाथ रखते हुए बोला कि मां, बस तुम अपने बेटे पर विश्वास रखो।
अब धवल आठवीं कक्षा में आ गया था। स्कूल में खेल-दिवस का आयोजन जोर-शोर से किया जा रहा था। पूरे स्कूल को हैरानी इस बात की थी कि इस बार प्रतियोगिता में एक नया प्रतिभागी था और वह कोई और नहीं बल्कि धवल था।
बैसाखियों के सहारे धवल कैसे दौड़ेगा? दौड़ के प्रशिक्षक नवीन जोशी पहले तो धवल का नाम देने को तैयार ही न थे। लेकिन जब धवल ने यह कहा कि वह उनका नाम नहीं डुबोएगा और फिर प्रतियोगिता अभी केवल स्कूल स्तर के विद्यार्थियों में ही तो होनी है। इसलिए उसे मौका देने में कोई नुकसान नहीं है। वे मान गए थे।
प्रतियोगिता वाले दिन धवल ने अपने माता-पिता को भी स्कूल में आमंत्रित किया। प्रतियोगिता से कुछ मिनट पहले धवल ने अपनी बैसाखी एक ओर रखी तो नकुल के साथ-साथ सभी हैरान हो गए। दौड़ प्रारंभ हुई तो सभी ने यह देखकर दांतो तले उंगुली दबा ली कि धवल बिना बैसाखी के दौड़ रहा था। जैसे-जैसे निर्णायक मोड़ आता गया तो न सिर्फ प्रशिक्षक नवीन जोशी, नकुल, धवल के माता-पिता बल्कि पूरे स्कूल को ऐसा महसूस हुआ जैसे जमीन ऊपर और आसमान नीचे आ गया हो।
नकुल को पछाड़ कर एक नया विजेता सामने आया था और यह था-धवल। नकुल को खोए देख धवल उसे चिकुटी काटते हुए बोला, ‘मेरे दोस्त, यह सपना नहीं हकीकत है। अब तो तुम मान गए न कि मैं इसीं जन्म में आलराउंडर हूं। आखिर इतने सालों के चैंपियन को मैंने दूसरे स्थान पर जो पहुंचा दिया है।’
पूरा स्कूल धवल के जुनून को सलाम कर रहा था। ०

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