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कहानी: ललक

रजनी के रहने-सहने के ढंग देख कर, कास्मैटिक देख कर मेरा मन भी हुआ क्रीम-लिपस्टिक खरीदने का! अच्छा ही हुआ खरीद लिया। अपनी मनपसंद चीजें मॉल में देख कर किसका मन नहीं होगा खरीदने का। अब कोई मुंबई आए और खरीदारी न करे, यह क्या संभव है! यह सोच कर आई थी कि सोच-समझ कर खर्च करूंगी, पर ऐसा जरूरी तो नहीं... सुमन यह सब लिख रही थी कि राजीव पास आकर बैठ गया।

Author February 18, 2018 3:41 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

शर्मिला बोहरा जालान

बक्से में कपड़े डालते-डालते सुमन को कुछ याद आया- क्या वह अपने साथ डायरी और एक-दो पत्रिकाएं नहीं ले जाएगी? ठीक है, मुंबई में वह रजनी और विकास के साथ रहेगी, समय कहां मिलेगा कुछ भी पढ़ने-लिखने का? सभी लोग इकठ्ठा होंगे और सभी का मन होगा साथ बैठने, हंसने-बतियाने का। इस बीच क्या एकांत मिल पाएगा? हो सकता है, किसी दिन समय मिल जाए। हर्ज ही क्या है डायरी रखने में!

सुमन कुछ दिनों के लिए अपने पति राजीव के साथ मुंबई जा रही है। वहां उनके रिश्तेदार रजनी और विकास रहते हैं। राजीव की विकास से अच्छी पटती है, सो दफ्तर से मिली छुट्टियों में उसने सोचा और कहीं न जाकर मुंबई हो आएं। सुमन के मन में यह बात भी है कि कहीं ऐसा न हो कि दोनों का वहां मन ही न लगे। एक-दो परिचित हैं मुंबई में, जिनसे मिला जा सकता है। कुछ जगहों पर घूमा जा सकता है, पर उसके बाद भी इतना समय तो मिल ही जाएगा कि कुछ पढ़ना-वढ़ना हो पाए। मुंबई पहुंचने के बाद सुमन मुंबई कैसा शहर है, यहां के लोग कैसे हैं, देखने-सोचने लगी और उस दिन का दैनिक अखबार लेकर बैठी ही थी कि रजनी आ गई। बोली, ‘भाभी, यह सब छोड़िए, क्या अखबार लेकर बैठी हैं! कमरे में अलमारी का जो एक खाना खाली है, उसमें अपने कपड़े-लत्ते सामान वगैरह सजा लीजिए। अलमारी में सामान सुरक्षित रहेगा। आजकल घरों में काम करने वाली बाइयों का भरोसा नहीं। कब क्या गायब कर दें! आसपास अच्छे-अच्छे पार्क हैं, जहां से समुद्र दिखता है, बहुत अच्छी हवा चलती है देख आइए। आज का दिन आप अपनी तरह गुजार लीजिए, कल से तो मैं आपको घुमाने ही वाली हूं।’ रजनी की बात सुन सुमन ने पूछा, ‘कहां ले जाने वाली हो? एलिफैंटा या प्रिंस ऑफ वेल्स?’ रजनी हंसते हुए मुंह बना कर बोली, ‘क्या भाभी, आप कोई विदेशी टूरिस्ट हैं, जो इन सब जगहों पर जाएंगी! हम तो मॉल जाएंगे। फिल्म देखेंगे। यह एकदम मत सोचिएगा कि मुंबई में आपका मन नहीं लगेगा या कैसे लगेगा? मॉल हैं न! बस मॉल और मॉल। मॉल छोड़ और कुछ देखने-सुनने की जरूरत ही नहीं।’ ‘मॉल में क्या रखा है?’ सुमन बोली तो रजनी ने खूब हंसते हुए कहा, ‘सब कुछ। बहुत कुछ। आप बस देखती जाइए कैसा होता है मॉल का रंग। मॉल का जबर्दस्त जादू चढ़ेगा कि उतरेगा ही नहीं।’
सुमन ने डायरी में लिखा-

पहला दिन : ‘मुंबई और एलिफैंटा’-
कल से हम मॉल घूमेंगे। पर करेंगे क्या। वही शॉपिंग। चलो अच्छा है, मजा आएगा। मन तो है ‘एलिफैंटा’, ‘प्रिंस ऑफ वेल्स’ देखने का। वह भी देख लेंगे। रजनी और विकास के साथ मॉल ही ठीक है। छह दिन हाथ में हैं। वैसे तो पांच दिन ही माना जाएगा। अंतिम दिन तो जाने की तैयारी में लग जाएगा। एकाध दिन मॉल देख लें, फिर म्यूजियम वगैरह हो लेंगे। और मिलने वालों से मिल लेंगे। सुमन डायरी छोड़ पैसों का हिसाब करने लगी। क्या-क्या खरीदना है और किन-किन लोगों के लिए। अगर समझ-बूझ कर खर्च नहीं किया तो सारे पैसे मिनटों में उड़ जाएंगे। कई लोग हैं, जो शहर से बाहर जाने पर सुमन के लिए कुछ न कुछ जरूर लाते हैं, सो उसे भी उन लोगों के लिए कुछ खरीदना चाहिए। पर सबके लिए कुछ-कुछ लेना, वह भी मॉल से! ना बाबा! सुमन अपने कपड़े-लत्ते अलमारी में रखने लगी कि ऊपर वाले खाने से हरहरा कर बहुत सारी चीजें उसके ऊपर गिरीं। यह…य… क्या है? क्या भरा पड़ा है? ये तो रजनी के कपड़े हैं। साथ हैं क्रीम, पाउडर, बायोटिक का कॉस्मैटिक सेट। पर्स। रजनी ने यह सब क्यों भर रखा है? सामान ज्यादा है या जगह कम, समझ में नहीं आ रहा। बाहर जो जूते-चप्पलों की अलमारी है वह भी ठसाठस भरी हुई है। ढेरों चप्पलें। इतनी चीजें! सब सामान को ठीक से रखना चाहिए। कीमती है। ऐसे तो सब खराब हो जाएगा! यह सब जो गिर पड़ा है उन्हें उठा कर रख दूं और नहा-धोकर तैयार हो जाऊं। यह स्नानघर! यह रजनी का नहीं है। रजनी का सोने का कमरा उस तरफ है और उसका स्नानघर भी उसी के साथ लगा हुआ है! फिर इस स्नानघर में इतने शैंपू-क्रीम-पाउडर क्यों रखे हुए हैं? सब विदेशी- क्रीम-टोनर, शैंपू, साबुन, नाइट क्रीम, पलकों पर लगाने वाले तरह-तरह के काजल, ढेर सारी मेकअप की ब्रशें। न जाने रजनी को इतनी क्रीम की जरूरत क्यों पड़ती है? अलग-अलग कंपनी की। शायद एक तरह की क्रीम लगा कर बोर हो जाती होगी। ओह! मैं इन्हीं सब में लगी रहूंगी, तो तैयार होने में देर हो जाएगी। ये गंदे कपड़े यहां इस खाने में डाल दूं। कपड़े धोने के लिए बाई आएगी, तो अंदर से ले लेगी। पर इसमें कुछ पड़ा है। ठसाठस भरा हुआ। इसमें कई तरह के पर्स रखे हुए हैं। किसी पर्स में कांच के टुकड़े लगे हुए हैं, तो कइयों में हाथ का काम किया हुआ है- फैन्सी, कीमती। मेरे पास कुल मिलाकर कितने बैग होंगे? तीन तो हैं ही। रजनी के पास? पंद्रह-बीस से कम क्या होंगे! हर पोशाक के रंग से मिलता एक पर्स। पर वह अपने सामान को ऐसे क्यों रखती है? लगता है ठूंस दिया हो। जहां-तहां पटक दिया हो। मन तो हो रहा है, पूरी अलमारी को, इस खाने को ठीक से सजा दूं। सारा सामान निकाल कर झाड़ कर रख दूं। पर रजनी को यह सब अच्छा नहीं लगेगा। उसका घर है और उसका सामान। जैसे चाहे रखे। सुमन तैयार होने लगी। उसने सोचा मॉल में जाने के लिए कुछ नए ढंग से तैयार होना चाहिए। पुराने-शुराने ढंग से नहीं चलेगा। मॉडर्न दिखना होगा। केशों को अलग तरह से सजा-संवार कर खुला छोड़ देना चाहिए। सुमन ने अपनी नई फैशन की सलवार-कमीज निकाली और एकदम नए ढंग से सजधज कर खड़ी हो गई। रजनी उसे देखते ही चहकी- वाउ! आप तो एकदम मुंबइया हो गई हैं। ‘फीनिक्स’ बहुत बड़ा है। रजनी ने सुमन से कहा, ‘एकदम विदेशी मॉल-सा है। बहुत बड़ा। बहुत खुला हुआ। हम यहां कॉर्न-चाट खाएंगे।’ सुमन, रजनी, विकास और राजीव मॉल में इधर-उधर बिखर गए। सभी अपने-अपने ढंग से अपने लिए कुछ-कुछ देखने-चुनने लगे। सुमन भी देख रही थी। सोच रही थी कि मित्रों-परिचितों-रिश्तेदारों के लिए क्या ले जाए? कुछ समझ में नहीं आ रहा। ब्रांडेड दुकानें। छोड़ो, यहां से ढोकर क्या ले जाना। जो देना है वह वहीं से खरीदकर दे देगी। इस सलवार-कमीज की डिजाइन बहुत अच्छी है। कितना प्यारा रंग है! अपने लिए ले लूं? कितना सुंदर काम किया हुआ है, छोड़ कर बेवकूफी करूंगी। फिर कहीं यह रंग, यह कढ़ाई मिले न मिले। थोड़ा महंगा है तो क्या हुआ! ले लेती हूं। इस तरह मन मसोस कर क्या रहा जा सकता है… खरीद लेती हूं।

मॉल में घूमते-घूमते समय का पता नहीं चला। सभी ने अपने लिए कुछ न कुछ देखा। पसंद किया। खरीद लिया। ढेर सारे पैकेट। पैकेट ही पैकेट। सभी को जोर से भूख लग गई थी। विकास बोला, ‘पहले कॉर्नसूप पीते हैं।’ सुमन राजीव को देखने लगी कि कॉर्न-वार्न सूप राजीव के वश की बात नहीं है। उसे तो बस चाय पिला दो। अभी वह मुंह बना कर बोलेगा, नहीं बाबा। इससे अच्छा है डिप टी कहीं से लें। ऐसा कुछ होगा, सुमन इसका अंदाज लगा रही थी कि राजीव की आवाज सुनाई पड़ी, ‘चलेगा कॉर्नसूप ही मैं भी तो कहने वाला था। कुछ हट कर होगा।’ खाने की सभी चीजें महंगी थीं, पर सभी ने कुछ न कुछ एक तरह से सब कुछ खाया। अंत में चारों सुर में सुर मिला कर बोले, पूरा दिन कहां उड़ गया, पता नहीं चला। सच, यह मॉल का मजा है। हम कल भी आएंगे।

रविवार : ‘अट्रिया मॉल-पूमा’।
पूमा। मुझे तो पूमा की टी-शर्ट खरीदनी है। राजीव ऐसे मचल उठा जैसे कोई बच्चा। दो पर एक मुफ्त। लेना तो है ही। छोड़ूंगा नहीं। सुमन ने राजीव को इस तरह मचलते पहली बार देखा था। सुमन साड़ियों की दुकान में घुस गई। मुंबई में साड़ियां महंगी हैं, तो क्या हुआ? कौन-सा हम रोज-रोज आते हैं। यहां जैसा प्रिंट मिलेगा वैसा कहीं और नहीं। पैसे? मेरे पास जो थे खत्म हो गए। राजीव से कहूं! राजीव को भी तो पता चले कि सुमन को भी पहनने-ओढ़ने का शौक है, और वह रोमांटिक मूड में भी है। ओह, ये झुमके! ये बहुत प्यारे हैं। सरवोत्सकी के हैं। ये भी ले लूं। इस मॉल में भीड़ दूसरे मॉल से कम नहीं। यह बात समझ में नहीं आ रही कि लोग बस सामान देखने आए हैं या खरीदने या सिर्फ समय काटने? रजनी मॉल आकर बहुत खुश है, ऐसी बात नहीं है। अक्सर आती है इसलिए ऐसे भाव नहीं है कि अनोखी जगह आई है। हां, ऐसा लग रहा है, अपनी मनपसंद जगह आकर उसे अच्छा लग रहा है। रजनी और विकास दोनों एमबीए हैं। दोनों तेज हैं, स्मार्ट भी। रजनी मन की अच्छी है। बच्चों-सी चंचल। तुरंत खुश हो जाती है, जोर-जोर से हंसने लगती है। कद-काठी शक्ल-सूरत से मॉडर्न लगती है। नौकरी कर रही है, करना चाहती है, पर तब तक जब तक कोई संतान नहीं होती। बच्चा होने पर झटपट छोड़ देगी। दोनों पति-पत्नी की अच्छी पटती है। दोनों घंटों बातें करते हैं। लगता है मॉल का चप्पा-चप्पा जानती है। झट से दुकानों में ले जाती है और चटपट सब कुछ देख-समझ आगे बढ़ जाती है।

‘पांचवा दिन और कॉर्नसूप’
‘कहो राजीव आज किस मॉल का चक्कर लगाना है? क्या खरीदना है? क्या बात है राजीव, तुम बहुत सुस्त लग रहे हो? थक गए हो क्या?’ विकास की बात सुन राजीव बोला, ‘वैसी कोई बात नहीं। इतनी खरीददारी हो गई कि अब यह चिंता हो रही है सामान लेकर कैसे जाएंगे। सारे सूटकेस ठसाठस भर जाएंगे। लगता है दो-तीन और सूटकेस या बड़े बैग खरीदने होंगे। सुमन बोली, ‘हां, आज यह सब इंतजाम कर लें। मैं मॉल से बोर भी हो गई हूं।’ मॉल जाने से भी कोई भला बोर हो सकता है! वहां बच्चों से लेकर बूढ़ों तक का मन लगता है- कह कर रजनी और विकास दोनों दफ्तर के लिए घर से निकल गए। सुमन अपनी डायरी निकाल कर बैठ गई और देखने लगी कि उसने उसमें क्या बातें दर्ज की हैं और कैसे? उससे अपना लिखा हुआ ही पढ़ा नहीं गया। कुछ भी ठीक से नहीं लिखा। बस हर दिन की तारीख डाल मॉल की बात लिखी हुई है। वैसे इन पांच दिनों में दोनों ने किया भी क्या है सिवा मॉल घूमने के! सुमन आगे लिखने लगी, ‘क्या सोच कर मुंबई आई थी कि कुछ लोगों से मिलूंगी, ऐतिहासिक जगहों पर घूमूंगी, पर मॉल छोड़ कुछ नजर नहीं आया। कई लोगों के लिए उपहार लेने थे, पर कुछ नहीं खरीदा। जो खरीददारी हुई, वह सिर्फ अपनी। राजीव ने अपने लिए ढेर सारा सामान खरीदा। न जाने कैसे? पैसे तो इतने नहीं लाया था। हो सकता है, ले आया हो और मुझे न बताया हो। रजनी के रहने-सहने के ढंग देख कर, कास्मैटिक देख कर मेरा मन भी हुआ क्रीम-लिपस्टिक खरीदने का! अच्छा ही हुआ खरीद लिया। अपनी मनपसंद चीजें मॉल में देख कर किसका मन नहीं होगा खरीदने का। अब कोई मुंबई आए और खरीदारी न करे, यह क्या संभव है! यह सोच कर आई थी कि सोच-समझ कर खर्च करूंगी, पर ऐसा जरूरी तो नहीं… सुमन यह सब लिख रही थी कि राजीव पास आकर बैठ गया। सुस्त था। सुमन ने डायरी बंद कर दी और पूछने लगी, ‘क्या हुआ? कोई बात है क्या? तबीयत तो ठीक है न? मैंने कल रजनी से कॉर्नसूप बनाना सीख लिया है। जाती हूं सूप बना लाती हूं, ताकि तुम्हारा आलस भाग जाए।’

‘नहीं, मुझे नहीं पीना।’ राजीव मुंह बना कर बोला।
‘क्यों नहीं? वहां तो कह रहे थे ‘कॉर्नसूप… हां, कुछ हट कर है। कुछ अलग-सा है। वही पिऊंगा।’
‘मुझे थोड़ी चाय बना दो।’
‘नहीं चाय नहीं, कॉर्नसूप।’
‘मैंने कहा चाय।’
‘मैंने कहा सूप।’
राजीव गुस्से में बोला, ‘तुम्हें पता है, मुझे कॉर्न-फार्न पसंद नहीं।’
‘तो मॉल में विकास के साथ कैसे पी रहे थे? लगता था उसके अलावा कुछ और पसंद नहीं।’
‘हां पी रहा था। वह सब करना पड़ता है। क्या समझोगी? तुम कुछ नहीं समझती। क्या तुम्हें यह समझ में आ रहा था कि इतनी खरीददारी नहीं करनी चाहिए थी।’
‘हां, नहीं करनी चाहिए थी। तुम भी कर रहे थे और तुम्ही मुझे उकसा रहे थे कि जो मन में आए लो।’
‘यहीं तो मैं कह रहा हूं कि तुम कुछ नहीं समझती। तुम्हें पता है हमें घर जाकर विकास को रुपए भेजने पड़ेंगे।’
‘रुपए! क्यों? किसलिए!’ सुमन चौंकी।
‘तो क्या तुम समझती हो यह सारी खरीदारी उन पांच-सात हजार रुपए में हो गई, जो हम लाए थे?’
नाराज क्यों रहे हो? कौन-सा मैंने कहा था मॉल जाकर सामान खरीदने के लिए।’
‘पर इनकार भी तो नहीं किया था?’
‘तुम्हारा क्या मन नहीं था?’
‘तुम दुकान के सामने से हटती ही नहीं थी। वहीं खड़ी हो जाती थी।’
सुमन जोर से बोली, ‘हां, मैं हूं ही ऐसी?’
राजीव उससे ज्यादा जोर से बोला, ‘विकास के सामने मैं क्या कहता! सब तुम्हारा दोष है। औरतें होती ही ऐसी हैं। दुकानें देख कर उनका मन बेकाबू हो जाता है। पैसों का हिसाब नहीं रहता।’
‘देखो राजीव, तुम बिना मतलब मुझ पर आरोप लगा रहे हो। यह सब तुम्हारा किया-धरा है। मैंने तो कहा था कि एक दिन एलिफैंटा चलें और एक दिन प्रिंस ऑफ वेल्स। नीना आंटी और रघु मामा से मिलने चलेंगे। पर तुम हर दिन मॉल जाने के लिए तैयार होने लगते थे।’
‘हां-हां मैं ही ऐसा हूं, तुम तो एकदम ठीक हो।’
‘छोड़ो राजीव, आपस में इस तरह करके कुछ नहीं होगा। मैंने सचमुच बहुत अच्छा कॉर्नसूप बनाना सीखा है। थोड़ा-सा पियो। देखो अच्छा लगेगा।’
‘कितनी बार कहा ये कॉर्न-वार्न मैं नहीं पिऊंगा। तुम पियो और अपने भाई को बुला लो, उसे दो।’
‘भाई की बात कहां से आ गई?’
‘जैसी तुम वैसा तुम्हारा भाई! दो दिन के लिए मेरे साथ अमदाबाद गया और न जाने कितने-कितने सामान खरीद लाया! मुझसे छोटा है, सो मुझे उसे एक स्मार्ट फोन दिलाना पड़ा। तुम लोगों को खरीदने का पागलपन है।’
‘क्या कहा तुमने, यही न कि तुम्हें उसे खरीदवाना पड़ा। जबकि उस समय तो कह रहे थे कि आज तक तुमने अपने ससुराल वालों के लिए कभी कुछ नहीं खरीदा, सो चलो अच्छा हुआ मयंक को कुछ दिला दिया।’
‘यही तो कहता हूं कि तुम कुछ नहीं समझती। तुम जैसी, तुम्हारे मायकेवाले भी वैसे।’
‘देखो राजीव, मैं कहती हूं तुम मेरे मायके वालों का नाम मत लो।’
‘क्या कर लोगी? तुम क्या कर सकती हो, कुछ नहीं कर सकती। तुममें न आत्मसम्मान है और न ही सामर्थ। अगर तुममें कुछ होता तो तुम अपने मायके से पैसे लाकर विकास का भुगतान कर देती।’

‘अब यही बाकी रह गया है। तुम इस तरह सोच सकते हो? उफ्फ! कैसे हो गए हो तुम। ऐसी घटिया बात तुम्हारे दिमाग आई भी कैसे?’ ‘हां। हां। घटिया आदमी हूं न, इसलिए घटिया बात आई। अब पूरी जिंदगी तुम्हें एक घटिया आदमी के साथ गुजारनी होगी। हां, एक फालतू आदमी एक घटिया बेकार आदमी के साथ…’ राजीव विक्षिप्त आदमी की तरह बातें करने लगा। सुमन कभी राजीव को देख रही थी, कभी मॉल से लाए कमरे में पसरे सामान को। राजीव को संभाले की सामान को! कैसे क्या हो गया! राजीव अजीब-अजीब बात कर रहा है। तभी दरवाजे की घंटी बजी। रजनी थी। खूब खुश, उत्साह से भरी हुई बोली, ‘भाभी, आज का दिन बहुत अच्छा है। विकास को बोनस मिला है। उम्मीद से ज्यादा। पर, आप दोनों को क्या हुआ? परेशान हैं? क्या कॉर्नसूप पी रहे थे? नहीं? चलिए मिल कर बनाते हैं और सेलिब्रेट करते हैं।’

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