jansatta Story abou a village girl written by Anjali Deshpande - कहानी- हंसी - Jansatta
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कहानी- हंसी

मंच पर बैठा है दीपक, मोतियों की लड़ियां लटक रही हैं उसके चेहरे के दोनों ओर। ‘नको रे, तू ऊपर नको जा’, उसके साथ काम करने वाली औरतों ने उसे यहां आए देख कर रोका। पर जाह्नवी रुके कैसे? वहां तो उसे ही बैठना था दीपक के साथ। कम से कम चढ़ तो ले उस पर।

Author February 11, 2018 2:36 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

अंजली देशपांडे

वांदेपुर कस्बा था, शहर था या शहर का बीज था, जाने क्या था, मगर गांव वह निश्चित रूप से नहीं था। तभी तो कभी-कभार लड़कियां गजरा पहन, संकरी चमकीली किनारी की जापानी जॉर्जेट की साड़ियां लहराती परिवार की उदात्त सोच के पुरुषों के साथ बार में बैठ कर बीयर पी लेती थीं और कोई फब्ती नहीं कसता था। हां, खबर सबको हो जाती थी। एक दिन जाह्नवी दीपक के साथ शनिवार की दोपहर को निकल कर वांदेपुर से कुछ ही दूर बांध किनारे के रेस्ट हाउस के कमरे में चली गई, तो सबको पता चलना ही था, चल गया था। बांध क्या था, वांदेपुर का छोर था। नदी के ही पेट से निकाल कर पत्थरों से गढ़ी गई खूब मोटी दीवार थी, जिसके आगे वह जाना नहीं चाहती थी। वहां जाने का नदी का ही मार्ग जब रुक गया, तो उसको जाकर क्या करना? यहां तक आई वही गनीमत, वही दीपक की जीत। दीपक के साथ आना, कमरा खुलवाना, उसमें कुछ घंटे बिताना, यह सब करना मुमकिन था, यही उसे इस जगह की अद्भुत बात लगती थी। अपनी नहीं, वह दिल लुटा बैठी, तो बाकी क्या बचा लेती?

जाह्नवी जानती थी, नदी शहर की सीमा नहीं होती। वह शहर की पोषक भी होती है इसमें उसे शक था। जिसे रौंद कर, जिसके जिस्म से सारी दमक लूटने के हथियार इंसानों ने खोज निकाले हैं, नदी क्यों उन्हें पोसे? वह उन्हें एकबारगी लील नहीं जाती एक निवाले में, इसी में आश्चर्य है। रातों को वह उठ कर नदी की चीत्कार सुना करती थी। उस नदी की, जो उसके घर से बहुत दूर बहती थी, मगर उसे आवाज दिया करती थी। उसे न मालूम क्यों नदी ने ही सिखाया था, किनारे काटे जा सकते हैं। गहराइयों को कोई चुरा ले तो बाहें पसारी जा सकती हैं। कभी चौड़ी छातियां भी सिमट जाया करती हैं, कभी सीना फूले तो गुब्बारे की तरह फट जाया करता है। सब कुछ तुम्हारे भीतर है, वह नदी को कहते सुना करती थी। नदी की उछृंखलता ने ही शायद उसे सिखाया था कि जब जो मिले समेट लो, विस्तार पा लो। मां कहती आंचल ठीक से संवार कर चला करो तो वह अपनी खिलखिलाहट को भीतर दाबे-दाबे उछाला करती कि बिना उंगलियों के हिले ही आंचल खुद सरक ले। मां कहती थी, लड़कियों का इतना हंसना ठीक नहीं है। बाद में आंसुओं से कीमत चुकानी पड़ती है। पर हंसी का हिसाब मां रखे तो रखे, जाह्नवी ने कभी नहीं रखा। उसे तो दफ्तर में पेटी कैश का हिसाब रखना तक पसंद नहीं था। रोज ही लगता था किसी दिन घपला हो जाएगा। पाई, आना, रुपया, किसको दिया, किस मद में दिया, उसके साइन कराए कि नहीं, वाउचर भरवाया कि नहीं… ऐसे झमेले उसे नहीं भाते। वह तो शाम ढले फिल्में देखना चाहती। हेलेन की गहरी ऊंसांसें सुनना चाहती, गहरी प्यास की पुकार।

नदी किनारे मां ने ही कह कर पिता से प्लाट खरीदवाया था, वह वहां बैठना चाहती। तब नहीं जब ठेकेदार र्इंट गारा लाकर वहां कीचड़ मचा दे, पर तब जब अभी मकान न बने हों, घास ऊंची हो और खरगोशों की सरगर्मियां शाम ढले बढ़ जाती हों। वहां से बांध बहुत दूर तो नहीं था, पर वह वहां नहीं जाती थी, उसके किनारे की ऊंची किलेनुमा प्राचीर पर चहलकदमी करने। नदी बंधे, जाह्नवी का दिल डूबे। नहीं, वह तो हंसने आई थी इस पृथ्वी पर। नदी से उसका रिश्ता गहरा था। तैरना वह नहीं जानती थी। जरूरत भी क्या थी? साड़ी उलझ न जाती कदमों से? लपेटे में लेकर जांघों को रोक न लेती उसके कदमों को? नदी की आगोश में हो तो यों भी हाथ-पैरों को सुर ताल की तरह मेल बिठा कर चलाना याद भी कहां रहने वाला था? वांदेपुर शहर तो था नहीं कि जीन्स ही पहन लेती, बिकिनी कैसे पहने और पहने भी तो मिले कहां, किस बाजार में? दीपक ही रखने लगा था हिसाब उसका। वह उसकी बेहिसाब हंसी को भी समेटने लगा था। अपनी मुस्कुराहटों में। नजरबंद करने लगा उन्हें। ‘एक दिन घर ले जाऊंगा’, उसने कहा था। जाह्नवी हंस दी थी। वह जानती थी एक नदी है उनके बीच। वे कभी मिल नहीं सकते। मां ने ताकीद की थी न, मत लाना उसको यहां, कोई फायदा नहीं। वह कुणबी, तू क्या है रे? जाह्नवी क्या है? वह तो बस जाह्नवी है। कहते होंगे लोग, दफ्तर के रजिस्टर में भी लिखा है, जाति ‘पड़ीत’ पर उसके आजोबा तो कभी नदी पर नहीं न लेके गए कपड़े धोने को, तो फिर जाह्नवी पड़ीत कैसे हुई? नहीं हुई न? कुणबी हैं तो क्या, दीपक कभी बैल के पीछे गया क्या खेत को? नहीं न? वह जानती थी एक नदी है उनके बीच। मुसलसल बहती चली आई है इतनी सदियों से। इसे ऋषियों ने मंत्रबल से शायद धरती से खींच निकाला होगा उस जमाने में जब वनों में विचरती कन्याएं गंधर्व विवाह के सूत्र में बांध लेती थीं राजाओं को। दीपक राजा नहीं है। क्लर्क है न उसी की तरह, यहीं रेलवे में। वह नदी पार नहीं कर सकता, वह गंधर्व की परंपरा अंगीकार नहीं कर सकता।

दीपक के घर तांता लगा था, कुंवारी लड़कियों के मां-बापों का। वह खुद तो किसी को देखने गया नहीं। कैसे मालूम हो उन लड़कियों में हंसी के गहरे कुएं हैं या नहीं? ऐसी हंसी जो कमरे में बंधे रस्से पर टंगे, दिन में पहने शाम को उतारे शर्टों और पैंटों को सराबोर कर के उनकी सिलवटें अदृश्य कर दे? जो छत से लटके पंखे पर बरसों जमी गर्द की महक उड़ा ले जाए? जो तवे से उतरती रोटी को फुला कर फुग्गे-सा हल्का कर डाले? नहीं, वह नहीं जानता मगर उसे मालूम है कि होती है ऐसी हंसी, सुनी है उसने, अपने दफ्तर के कमरों में गूंजती, और वह उसे घर में समेटना चाहता है। देखे बिना ही वह मां की बताई हर लड़की को ना करता रहता है, बांध किनारे रेस्ट हाउस में तली मछली के साथ हंसी को हथेलियों पर सजाता रहता है। सब जानते हैं। जाह्नवी वहां जाती है, दीपक के साथ। सिर्फ जाह्नवी की मां नहीं जानती। उसके पिता नहीं जानते। शक है उनको, पर वे जानते नहीं हैं। सबको इतनी तमीज है कि उनकी बदनामी का चस्का तो लें, पर उनके मां-बाप को खबर किए बिना। वांदेपुर गांव नहीं है न, इसलिए। दीपक की भी तो मां है। उसने सुन लिया है। दीपक ने ही बताया है उसे। रेस्ट हाउस के आलस भरे दिनों के बारे में, जाह्नवी की हंसी के बारे में। नदी के बारे में। तारा बाई ने साफ मना कर दिया था। मां की नहीं सुनेगा? सुनेगा न, दीपक सुनेगा मां की, नौ महीने पेट में रख्खी न। दूध पिलाई न? कैसे नहीं सुनता? कुणबी नहीं भी होती तो चलता। नहीं है। चलो, कोई वांदा नहीं। पण यह क्या, पड़ीत कैसे चलेगी रे? दीपक का ब्याह है।

‘कल तक जो लाखों का दहेज दे रहे थे, आज उन्होंने बस शादी और मंगलसूत्र पर टाल दिया देखो। खुद होके गए मांगने को लड़की, तो काय को देते कुछ? यह एक घड़ी और एक सूट। इतने के ही लायक था क्या अपना पोट्टा?’ तारा बाई फुंकार भरी। पर पोट्टे को पड़ीत की पोट्टी से बचा लिया इसका संतोष है। लड़की भी जानती ही रही होगी। सुना होगा उसने भी कि बांध के किनारे है एक रेस्ट हाउस। उसे पूरा यकीन है वह वहां कभी नहीं जाएगी। कभी नहीं लेकर जाएगा वह उसे वहां जहां कई बार खुले कमरों में आती गीली रोशनी और ताजी हवा नदी का पता देती है। वांदेपुर शहर था या नहीं, क्या मालूम मगर जो भी था, लड़की की हंसी का हिसाब उसे मांगना आता था। ‘तो क्या हुआ? मां ही तो नहीं बोली न? अपन तो तैयार हैं। मां बाद में मान जाती’, उस कमरे में गूंज रही है यह बात। जाह्नवी कभी समझ नहीं सकी कि कैसे उसकी हंसी और उसका प्यार भी दीपक में वह साहस नहीं जगा सका, जो खुद उसमें था। वह तो तैयार थी ना? फिर दीपक क्यों तैयार नहीं था? ‘इसलिए कि तेरे में क्या रक्खा है अब?’ उसकी मां ने बाल पकड़ कर बात उसके दिमाग में घुसाना चाहा। मां को जाह्नवी ने बता ही दिया वह, जो सारा वांदेपुर जानता ही था। पर जाह्नवी समझ नहीं पाई। जब वह जानता था कि उसमें क्या है, तो हमेशा उसे पाते रहने का लालच उसमें क्यों नहीं जागा जैसे खुद उसमें जागा था? ‘अरे मर्द ऐसेईच होते। इसीलिए न उनको शादी से पहले ज्यादा कुछ करने नहीं देने का’, उसकी सखी ने कहा था। ‘सब जान लेते न, तो छोड़ीच देते देखो। सोचने, करने को अभी बचा ही क्या?’ पर जाह्नवी जानती थी। बहुत कुछ बचा था। अपनी मर्जी से घर लेना बचा था। शर्ट पर बटन लगाना बचा था। साथ में टिफिन लेकर, साथ में बस पकड़ कर आॅफिस आना बचा था। सुबह उठ कर बाथरूम के इस्तेमाल के लिए झगड़ना बचा था। साथ-साथ जाकर मंदिर के पास से दो मीटर गजरा खरीदना बचा था। मुसे बालों में कंघी घसीट कर उसमें गजरा फंसाना बचा था। अभी तक तो उसे नन्ही किलकारियां सुनाई नहीं दी थी ख्वाब में भी, वह ख्वाब पैदा करना बचा था। कितना कुछ बचा था, जो उस कमरे में थोड़े न हो सका था, जहां नदी की आवाज ये सब कहानियां सुनाया करती थी? जहां एक बार भी ऐसी साड़ी नहीं उतरी थी जो दीपक ने दी हो अपने पैसों से लाकर। ऐसी साड़ी खरीदना बचा था। उसकी हंसी तो बची ही थी। वही हंसी जिसे कभी खत्म न करने का वादा किया था उसने। तरह-तरह की, हर तरह की हंसी उसे सुनाना बचा था न। उसमें क्यों नहीं था साहस उस हंसी को सुनने का, अपनी मां के आंसू देखने का? जाह्नवी ने अपनी सखी से कहा, ‘वह तो सब जानता था। जानते हुए के साथ ही तो रहना चाहिए ना?’ ‘तू पुरानी हो गई रे’, सखी ने कहा। ‘जिससे वह शादी कर रहा है वह भी दूसरी सुबह पुरानी हो जाएगी’, जाह्नवी ने कहा। फिर वह हंस दी।

उसकी सहेलियों ने जरी की साड़ियां पहनी थीं, पुरानी। उसने भी पर्स से निकाला, निमंत्रण पत्र। उसका नाम नहीं था कार्ड पर। दीपक का तो था। जाना उसे भी है इस शादी में। उसने हंसी बटोरी, थैली में डाली, साथ ले चली, एक नई साड़ी बांध कर नए कोरे कागज के टुकड़े में। नई दुल्हन के लिए नया उपहार। दावत है। उसकी हंसी भी है। मां कहती है बेशर्मी है यह। उसने कहा था, मत जाना। लेकिन नदी बहना कैसे छोड़ दे? मंच पर बैठा है दीपक, मोतियों की लड़ियां लटक रही हैं उसके चेहरे के दोनों ओर। ‘नको रे, तू ऊपर नको जा’, उसके साथ काम करने वाली औरतों ने उसे यहां आए देख कर रोका। पर जाह्नवी रुके कैसे? वहां तो उसे ही बैठना था दीपक के साथ। कम से कम चढ़ तो ले उस पर। उसने झुक कर दूल्हा बने दीपक को देखा और कान पास ले जाकर कहा, ‘यह कल पुरानी हो जाएगी, तब?’ दीपक का चेहरा लाल हो गया। बगल में बैठी उसकी दुल्हन का चेहरा वह हल्दी दिखा गया, जो कल तक पोती गई है उस पर। दुल्हन ने चेहरा घुमा लिया। जाह्नवी ने उसका चेहरा हाथों में लेकर कहा, ‘चल हंस तो दे! मेरे साथ।’ वह हंस दी खिलखिला कर। नदी कब पुरानी हुई है रे?
वांदेपुर में लोग अब तक बातें करते हैं जाह्नवी की। कैसी निर्लज्ज थी, प्रेमी के दुल्हन का माथा चूमी, उसके संग हंसी। देखे क्या ऐसी निर्लज्ज औरत कभी?

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