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शेष बचे चरणों में तृणमूल कांग्रेस के गढ़ में मुकाबला

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आखिरी तीन चरणों में 114 सीटों का चुनाव होना है। ये इलाके तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाते हैं।

Bengalसांकेतिक फोटो।

पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के आखिरी तीन चरणों में 114 सीटों का चुनाव होना है। ये इलाके तृणमूल कांग्रेस के गढ़ माने जाते हैं। छठे चरण में 43 सीटों पर 22 अप्रैल को, सातवें चरण में 36 सीटों पर 26 अप्रैल को और आठवें चरण में 35 सीटों पर 29 अप्रैल को मतदान होना है।

2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल और कांग्रेस-वामो गठबंधन के बीच टक्कर थी, भाजपा खाता तक नहीं खोल पाई थी। लेकिन ठीक तीन साल के बाद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस और वामो का सूपड़ा साफ हो गया। इस चुनाव में कांटे की टक्कर हुई थी, तृणमूल और भाजपा के बीच। इस आधार पर कह सकते हैं कि विधानसभा चुनाव के छठे चरण में तृणमूल और भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला होगा। सातवें कांग्रेस गठबंधन करिश्मा करने की कोशिश में है। आठवें चरण वाले क्षेत्रों में भाजपा को एक सीट मिली थी और इस दौर में भी तृणमूल व भाजपा के बीच कांटे का मुकाबला होगा।

आने वाले तीनों चरण दक्षिण बंगाल में हैं, जिसे ममता बनर्जी के तृणमूल का गढ़ माना जाता है, ये ठीक उसी प्रकार है जैसे उत्तर बंगाल को लोकसभा चुनाव के बाद से भाजपा का गढ़ माना जा रहा है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि ममता बनर्जी दक्षिण बंगाल में सबसे बड़ी पार्टी हैं लेकिन सवाल ये भी उठता है कि तृणमूल के बाद दक्षिण बंगाल में दूसरे नंबर की पार्टी कौन है? छठे चरण में चार जिलों की जिन 43 सीटों के लिए 22 अप्रैल को मतदान होना है, उनमें उत्तर दिनाजपुर की नौ सीटों में से ज्यादातर पर अल्पसंख्यक ही निर्णायक हैं, लेकिन भाजपा ने भी हाल में उस इलाके में बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान चलाया है और पार्टी के तमाम नेता इलाके में रैलियां कर चुके हैं।

यह जिला भी बांग्लादेश की सीमा से लगा है। दरअसल, इस चरण में पूर्व बर्दवान के अलावा बाकी तीनों जिलों की सीमा बांग्लादेश की सीमा से लगी है। उत्तर 24-परगना की 17 और नदिया जिले की नौ सीटों पर अल्पसंख्यकों के अलावा मतुआ समुदाय का भी खासा असर है। मतुआ समुदाय का समर्थन पहले तृणमूल कांग्रेस के साथ था, लेकिन बीते लोकसभा चुनाव में भाजपा ने इस वोट बैंक में सेंध लगाने में कामयाबी हासिल की थी। इस तबके को लुभाने की कवायद के तहत ही प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपने बांग्लादेश दौरे के दौरान मतुआ धर्मगुरु हरिचंद ठाकुर के जन्मस्थान पर गए थे और वहां बने मंदिर के दर्शन किए थे।

बांग्लादेश से लौटने के बाद उन्होंने उत्तर 24-परगना जिले में मतुआ समुदाय के गढ़ ठाकुरनगर में भी रैली की है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से लेकर पार्टी के तमाम नेता रैलियां और रोड शो कर चुके हैं। अमित शाह ने तो भाजपा के जीतने की स्थिति में नागरिकता कानून लागू कर मतुआ लोगों को नागरिकता देने का भी वादा किया। हालांकि उन्होंने लोकसभा चुनाव के समय भी यही वादा किया था। दूसरी ओर, ममता बनर्जी ने दावा किया है कि मतुआ समुदाय की बड़ो मां ने उनको पत्र लिखकर इस समुदाय के हितों की रक्षा की जिम्मेदारी सौंपी थी।

उत्तर 24-परगना के अलावा नदिया जिले में भी तृणमूल कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर है। पूर्व बर्दवान और उत्तर दिनाजपुर में तृणमूल कांग्रेस मजबूत नजर आ रही है। भाजपा ने सीमावर्ती इलाकों में बांग्लादेशी घुसपैठ और पशुओं की तस्करी को ही मुद्दा बनाया है। चुनाव अभियान के आखिरी दौर में पहुंचने के साथ ही दोनों दलों के बीच टकराव और निजी हमले तेज हो रहे हैं। कोरोना की वजह से माकपा, कांग्रेस और तृणमूल ने अपनी रैलियों और रोड शो में कटौती का एलान कर दिया है, लेकिन भाजपा ने अब तक ऐसा कुछ नहीं किया है।

उत्तर दिनाजपुर जिले की नौ विधानसभा सीटों पर एक तरफ वामो-कांग्रेस-आइएसएफ का संयुक्त मोर्चा अपना अस्तित्व बचाने उतरा है। वहीं भाजपा को मोर्चा और तृणमूल- दोनों से चुनौती मिल रही है। 2016 में इन नौ विधानसभा सीटों पर तृणमूल, वामो-कांग्रेस में ही सीधा मुकाबला था। तब तृणमूल को चार सीटें मिलीं थी और कांग्रेस को तीन। माकपा और फारवर्ड ब्लॉक को एक- एक सीट मिली थी। लेकिन 2019 लोकसभा चुनाव में इन सीटों का समीकरण अलग था। उत्तर बंगाल में एक तरफ गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के बिमल गुरुंग ने भाजपा का समर्थन किया था। इस बार गुरुंग के लिए ममता बनर्जी ने सीटें छोड़ी हैं। भाजपा एक और वर्ग से उम्मीद कर रही है। कोलकाता और दक्षिण बंगाल के औद्योगिक शहरों में तकरीबन 10 लाख की आबादी हिंदी भाषियों की है और इन्हें लुभाने में भाजपा ने कोई कसर नहीं छोड़ा है।

जब ममता बनर्जी भाजपा के नेताओं को ‘बाहरी’ कहती हैं तो भाजपा उनसे बाहरी की परिभाषा पूछकर उन्हें घेरने की कोशिश करता रहा है। तृणमूल कांग्रेस से भाजपा में आए दिनेश त्रिवेदी कहते हैं, ‘कोलकाता में हमेशा महानगरीय संस्कृति रही है। यही बंगाल की खूबसूरती भी है। हम सब यहां आकर बांग्ला संस्कृति से प्रेम करने लगे हैं। बंगालियों ने भी देश के विभन्न हिस्सों से आए लोगों को अपनाया।’

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