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नदियों में बहती विष की धाराएं

देश के विभिन्न राज्यों में बहने वाली अड़तीस प्रमुख नदियों की सफाई पर पिछले कुछ सालों मेें अरबों रुपए खर्च किए जा चुके हैं। नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की कई योजनाएं चल रही हैं। केंद्र सरकार ने गंगा को भी स्वच्छ और निर्मल बनाने की मंशा जताई, पर हजारों करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी गंगा मैली की मैली है। हरिद्वार से हुगली तक उसका पानी आचमन करने लायक भी नहीं रहा। नदियों के किनारे बसे शहरों और रसायन कारखानोंं द्वारा बहाए जा रहे दूषित पानी को साफ करने के लिए उपयुक्त शोधन संयंत्र तक नहीं हैं। प्रशासन और उनके अधिकारियों की हीला-हवाली से नदियों की जो दुर्दशा हो रही है उस पर नजर डाल रहे हैं-निरंकार सिंह।

जमीन के भीतर की ऊपरी सतह का जल भी प्रदूषण की चपेट में है।

देश की जिन नदियों में कभी निर्मल जल की धारा बहती थी, आज वहां दुर्गंध और सड़ांध के भभके उठते रहते हैं। इन नदियों का पानी प्रदूषण के खतरे की सभी सीमाएं पार कर चुका है। देश के बीस राज्यों में बहने वाली अड़तीस प्रमुख नदियों की सफाई पर पिछले बीस सालों में लगभग तीस अरब रुपए खर्च किए गए, लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। इन नदियों में यमुना, गंगा, गोमती, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, दामोदर, महानंदा, सतलुज जैसी बड़ी नदियां शामिल हैं। इनमें से एक-एक नदी की सफाई के लिए संबंधित राज्यों को सैकड़ों करोड़ रुपए दिए गए। न तो आबंटित रकम कम थी, न एक दशक का समय छोटा कहा जा सकता है। फिर भी इन नदियों का पानी स्वच्छ होने के बजाय कई जगह जहरीला हो गया। उनमें पाई जाने वाली मछलियां और अन्य जीव जंतु भी मर गए।

ये तथ्य इस बात की तरफ इशारा करते हैं कि पैसा जरूर पानी की तरह बहाया गया, पर वह निर्धारित मकसद में नहीं लगा। उसे कोई और डकार गया। अगर राजनेता और बड़े-बड़े अधिकारी योजनाओं की निगरानी भी नहीं कर सकते हैं, तो उनके होने न होने का क्या मतलब हो सकता है? केंद्र सरकार ने गंगा को स्वच्छ और निर्मल बनाने का संकल्प व्यक्त किया है। कुछ योजनाएं भी बनाई गई हैं, जिनके नतीजे आने में समय लगेगा। नदियों को प्रदूषण मुक्त बनाने की कई योजनाएं चल रही हैं। पर दो हजार करोड़ रुपए खर्च करने के बाद भी गंगा मैली की मैली है। हरिद्वार से हुगली तक उसका पानी आचमन लायक भी नहीं रहा। बीती तेरह मई को कन्नौज जिले में गंगा में हजारों की संख्या में मछलियां मरी पाई गर्इं। गंगा में तेजी से बढ़ते प्रदूषण के कारण किसी से छिपे नहीं हैं। सत्तर फीसद घरेलू मल जल कचरा, बीस फीसद कल कारखानों का गंदा पानी गंगा में गिरने में प्रदूषण बढ़ रहा है। दूसरी नदियों का हाल तो और बुरा है। यमुना के पुश्ते पर जो सब्जियां उगाई जाती हैं वे दोहरे प्रदूषण की शिकार हैं। उनमें जैविक और रासायनिक प्रदूषण की मात्रा बहुत ज्यादा है। देश के सत्तर प्रतिशत शहरों में आज भी पेयजल की आपूर्ति नदियों से ही हो रही है। लेकिन सत्तर प्रतिशत बीमारियां भी प्रदूषित जल के कारण हो रही हैं।

जमीन के भीतर की ऊपरी सतह का जल भी प्रदूषण की चपेट में है। सबसे बड़ी बात यह है कि इस प्रदूषण को रोकने या खत्म करने के लिए भारी भरकम बजट वाली योजनाएं तो बनी हैं, पर इन योजनाओं पर अरबों रुपए भी खर्च किए जा चुके हैं, लेकिन सफाई के मामले में इसकी हालत ज्यों की त्यों है। यह देख कर अचरज होता है कि आखिर हमारा सरकारी तंत्र करता क्या है? हर काम उसके नियंत्रण में है, लेकिन वह किसी कार्यक्रम या योजना के क्रियान्वयन के लिए जिम्मेदार नहीं है। नियंत्रक एवं महा लेखापरीक्षक यानी कैग की एक रिपोर्ट में इस तथ्य का खासतौर से उल्लेख किया गया है कि जल प्रदूषण और बर्बादी को रोकने के लिए 1974 में जो कानून बनाया गया था, उसे लागू करने के लिए शायद ही कुछ किया गया हो। हरियाणा में छह सौ से ज्यादा ऐसी औद्योगिक इकाइयां काम कर रही हैं, जो बिना किसी अनुमति के नदियों और जल स्रोतों को प्रदूषित कर रही हैं। हिमांचल प्रदेश में अट्ठावन नगर पालिकाएं मल-मूत्र नदियों में बहा रही हैं। कर्नाटक, महाराष्टÑ, ओड़ीशा, बिहार, उत्तर प्रदेश आदि प्रदेशों में भी कमोबेश यही हाल है। इन प्रदेशों से गुजरने वाली नदियां बड़े शहरों और बड़े-बड़े कारखानों के लिए गटर का काम कर रही हैं, जो इनका सारा कूड़ा-कचरा और रसायन अपने भीतर समेट लेती हैं। लेकिन हमारे पेय जल का स्रोत भी यही नदियां हैं और उनका ही जल भूमिगत जल स्रोतों में मिलता है। इन नदियों से या भूमिगत स्रोतों से जो जल पीने के लिए दिया जा रहा है, दरअसल वह पीने योग्य नहीं रह गया है।
सरकार और उसका तंत्र अगर अपनी जनता को पीने योग्य जल भी उपलब्ध नहीं करा सकता है, तो उसका होना न होना बराबर है। कानून के साथ हम जो छल करते हैं उसका नतीजा पूरे समाज और उसकी भावी पीढ़ियों को भी भोगना पड़ता है। यमुना को प्रदूषण से बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट को भी बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा। लेकिन फिर भी स्थिति में कोई आशाजनक सुधार नहीं हुआ है।

फैलती बीमारियां
गंगा, यमुना, गोदावरी, नर्मदा, सिंधु और कावेरी सहित कई दूसरी नदियां भी बुरी तरह प्रदूषित हो चुकी हैं। देश की तेरह प्रमुख नदियों का अस्तित्व खतरे में है। इनके पानी के बंटवारे के नाम पर समय-समय पर राज्यों के झगड़े भी होते रहते हैं, क्योंकि इनके पानी से ही शहरों और औद्योगिक क्षेत्रों की जरूरतें पूरी की जाती हैं। कई नदियों में तो पानी इतना कम हो जाता है कि गरमी में वे सिर्फ शहरी और कारखानों के कचरे का नाला बन कर रह जाती हैं। देश की तेरह प्रमुख नदियों के तटीय क्षेत्र के कस्बों में चर्म रोग पनप रहे हैं। इनमें पाई जाने वाली लाखों मछलियां मर चुकी हैं। इन नदियों का जहरीला पानी सिंचाई के काम आ रहा है। खाद्यान्नों पर इसका क्या असर पड़ रहा है, अभी तक ठीक-ठीक इसका पता नहीं लगाया गया है। कुल मिलाकर हमारी नदियां नगरों के कचरे और गंदे पानी से बीमारी और मौत का वाहक बनती जा रही हैं। अभी तक इनकी साफ सफाई की ओर खास ध्यान नहीं दिया गया है। नगरों की जनसंख्या वृद्धि के साथ-साथ यह समस्या गंभीर होती जा रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार प्रदूषित जल पीने के कारण भारत में प्रतिवर्ष पांच करोड़ व्यक्ति बीमार होते हैं। इनमें से बीस लाख व्यक्ति हर वर्ष मर जाते हैं। इन बीमारियों के इलाज पर पांच सौ करोड़ रुपए सालाना खर्च होते हैं।

शहरी गंदगी का प्रवाह
शहरों की आबादी का मुख्य जल स्रोत हमारी नदियां ही हैं, पर आज देश की नदियों का जल कुओं से ज्यादा खराब है। उसमें भारी प्रदूषण है। उसमें शहरों का ही मल-जल और कृषि एवं उद्योग धंधों का कूड़ा-कचरा बुरी तरह झोंका जा रहा है। कहीं-कहीं तो समुद्र तटीय नदी, मुहानों पर समुद्र जल की घुसपैठ से समस्या और भी अधिक जटिल हो गई है। भारत में कुल दो हजार चार सौ इकतीस नगरों में से केवल एक सौ छिहत्तर में मल-जल निकासी की व्यवस्था है। उनमें भी मल-जल के उपचार की तो नाममात्र की व्यवस्था है। यह सारा मल-जल सीधे नदियों में बहा दिया जाता है। दिल्ली के आसपास यमुना काली हो गई है। कलकत्ता में हुगली का पानी बुरी तरह से प्रदूषित है। मुंबई में मेहम की खाड़ी का जल गंदा हो गया है। कश्मीर की डल झील का पानी भी अब साफ नहीं है। शहरों के गंदे पानी का उपचार नहीं होने से ही नदियों का जल अधिक प्रदूषित हुआ है। इससे डायरिया, पेचिश, पीलिया और मियादी बुखार जैसी महामारियों का प्रकोप बढ़ा है। गरमी के दिनों में नदी-नालों में जल प्रवाह मंद हो जाता है, तब बीमारियां प्रचंड रूप धारण कर लेती हैं। देश की राजधानी का प्रमुख जल स्रोत यमुना है। केंद्रीय जल प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण बोर्ड के अध्ययन के अनुसार यमुना में प्रतिदिन जो गंदा पानी बह कर जाता है उसमें तीन लाख घन मीटर मल-जल और बीस हजार घन मीटर औद्योगिक कूड़ा-कचरा होता है। दिल्ली की कुछ बची हुई औद्योगिक इकाइयां अपना गंदा पानी यमुना में ही प्रवाहित करती हैं। नजफगढ़ नाला प्रदूषण का प्रमुख स्रोत है। उसमें औद्योगिक इकाइयां अपना गंदा पानी प्रवाहित करती हैं। जिस स्थान पर इस नाले का पानी यमुना में मिलता है, उस स्थान से लेकर ओखला तक यमुना का पानी सिंचाई के भी योग्य नहीं है। यमुना अब एक ‘जाम सीवर’ में तब्दील हो चुकी है, यह सच है।

लापरवाही का तंत्र
दिल्ली के अलावा हरियाणा और उत्तर प्रदेश के बीस शहर इसके किनारों पर बसे हैं और उनमें रहने वाली करीब छह करोड़ की आबादी इस नदी को सार्वजनिक कूड़ाघर के तौर पर इस्तेमाल कर रही है। उत्सर्जित अपशिष्ट पदार्थों से लेकर हर किस्म का जैव और रासायनिक कचरा उसमें बहाया जा रहा है। लेकिन प्रदूषण के प्रति उदासीनता का आलम यह है कि इनमें से पचहत्तर फीसद के पास अब कचरे के शोधन की सुविधा नहीं है। खुद दिल्ली सरकार का अपना शोधन संयंत्र अभी तैयार नहीं हुआ है। वर्ष 1993 में यमुना एक्शन प्लान शुरू किया गया था, लेकिन उसके तहत डेढ़ हजार करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च होने के बाद भी प्रदूषण घटने के बजाय बढ़ ही रहा है। आज भी हजारों लोग यमुना में स्नान करते हैं और पर्व-त्योहारों पर उसी में देव प्रतिमाएं विसर्जित करते हैं। आज भी राजधानी दिल्ली और कई दर्जन कस्बों में मुख्यत: यमुना जल को ही साफ करके पेयजल के रूप में घरों तक पहुंचाया जाता है। दिल्ली का भू-जल भी बहुत अधिक प्रदूषित है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान की आणविक अनुसंधान प्रयोगशाला ने अपने अध्ययन में पाया है कि दिल्ली के तैंतीस प्रतिशत भू-जल में नाइट्रेट सामान्य से ज्यादा है। पानी में नाइट्रेट की ज्यादा मात्रा से मानवीय स्वास्थ्य पर खतरनाक प्रभाव सामने आते हैं।

आगरा और कानपुर की दशा भी चिंताजनक है। लखनऊ में भी करोड़ों रुपए खर्च करने के बाद भी गोमती का पानी गंदा ही है। तीन लोक से न्यारी कही जाने वाली काशी में भी नगर की नालियों और नालों का गंदा पानी गंगा में गिरने और मणिकर्णिका घाट पर राख, सुलगते अंगारों, अधजली लाशों, लकड़ियां अन्य प्रदूषकों के कारण गंगा का पानी काला पड़ गया है। करीब ढ़ाई हजार किलो मीटर तक बहने वाली इस नदी में हर दिन चौदह करोड़ लीटर से ज्यादा कचरा बहाया जा रहा है। इससे इस नदी के आसपास रहने वाले चालीस करोड़ लोगों का जीवन खतरे में पड़ गया है। अब इस नदी की सफाई के लिए सरकार ने सात हजार करोड़ की नई योजना तैयार की है। पश्चिम बंगाल में हुगली पर सौ किलोमीटर क्षेत्र में किए गए अध्ययन से पता चला है कि तीन सौ तिरपन नाले प्रतिदिन करीब इक्कीस सौ लीटर कूड़ा-कचरा फेंक रहे हैं। कलकत्ता-दुर्गापुर, आसनसोल में दामोदर नदी के तट पर आठ बड़े इस्पात, कोक, रसायन और उर्वरक के उद्योग अपना सारा गंदा पानी इसी नदी में डालते हैं। इस गंदे जल में साइनाइड और फिनोल जैसे विषाक्त पदार्थ भी होते हैं, जिनसे प्रदूषण और भीषण हो जाता है।

जहरीले रसायन
हमारे नगरों में पेयजल के अनेक स्रोतों में जस्ते, क्रोमियम, सीसे, निकेल और कैडमियम जैसे विषाक्त धातुएं पाई गई हैं। उनमें नाइट्रेट, फ्लोराइड, फास्फेट तथा अन्य लवणों तथा खनिजों की मात्रा मनुष्य की सहन सीमा से अधिक पहुंच गई है। इस समय हमारे पेयजल में कई कार्बनिक विष, कीटनाशक, अति विषाक्त पोलीक्लोरीनेटेड बाइफेनिल्स (पीसीबी) और डिटरजेंट आ गए हैं। इन प्रदूषकों के कारण कई स्थानों पर नदियों में मछलियां भी मर गर्इं। कई नदियों की मछलियां अब खाने योग्य नहीं रह गई हैं। अगर ऐसी मछलियां खाई जाएंगी तो लोगों के जिगर में घाव, वजन में कमी, पीलिया, आंतों में सूजन, पेट दर्द, कैंसर, प्रजनन और चर्म संबंधी रोग हो सकते हैं। औद्योगिक नगरों के आसपास के जल में पॉली साइक्लिक-एसोमैटिक हाइड्रोकार्बन (पीएएच) पाए जाते हैं। ये कैंसर जनक होते हैं। इनका जन्म उन दहन प्रक्रियाओं से होता है, जो बिजलीघरों, रिफाइनरियों और आटोमोबाइल से निकले घनीभूत अवशेषों को सड़कों से बहा कर पास की नदियों में ले जाता है। मुंबई के क्लोरो एल्कली के कारखाने एक टन क्लोरीन तैयार करने में आधे से लेकर एक पौंड तक पारा फेंक रहे हैं। इस पारे का सत्तानबे प्रतिशत भाग नाले और नालियों में बह कर समुद्र में जा रहा है। इसमें समुद्र का तटवर्ती जल प्रदूषित हो गया है और उनके आसपास की मछलियां भी खाने योग्य नहीं रह गई हैं। बड़ौदा में कई औद्योगिक इकाइयां उर्वरक और पेट्रो रसायन बनाती हैं। ये पेट्रोलियम साफ करती हैं और रंजक द्रव्य बनाती हैं। इनका गंदा पानी माही नदी में जाता है, जो खंबात की खाड़ी में गिरती है। खंबात नगर को जो पानी सप्लाई किया जाता है उससे सीसे की मात्रा सीमा से आठ गुना अधिक पाई जाती है। सूरत के आसपास के कुछ गावों में रेफ्रिजरेशन गैस उत्पादक कारखाने से निकले फ्लोराइड से मिढ़ोला नदी का पानी प्रदूषित हो गया है। इस पानी के पीने के कारण बच्चों के दांतों में जख्म हो गया और उनकी हड्डियां खराब हो गर्इं।

कल-कारखानों के कचरे के पानी में मिल जाने के कारण पानी में क्लोरीन डाल कर उसे साफ करने का तरीका अब बेकार ही नहीं घातक हो गया है। एक तो क्लोरीन अमीबा पेचिस के जीवाणु को नष्ट नहीं कर सकती। दूसरे, यह औद्योगिक कचरे में मौजूद कार्बनिक रसायनों के साथ मिल कर छह कैंसरजनक तत्त्व पैदा करती है। इसलिए अगर नदियों में औद्योगिक कल-कारखानों और शहरों की आबादी का गंदा पानी डालने की परंपरा बंद नहीं हुई, तो देशवासियों का जीवन अगले तीस-चालीस वर्षों के भीतर ही घनघोर संकट में पड़ जाएगा। आज भारत में कोई नदी ऐसी नहीं है, जो प्रदूषित न हो। वास्तव में इतना अधिक विदेशों से कर्ज लेने के बाद भी भारत अपने नागरिकों को पीने का साफ पानी भी उपलब्ध नहीं करा सका है। देश के नगरों में जगह-जगह शराब की दुकानें तो खुल गई हैं, पर साफ पानी की हम व्यवस्था नहीं कर सके हैं। बल्कि पानी को गंदा कर हमने शराब तैयार की है। इस समस्या से बचने का एक ही रास्ता है कि नागरिक उठ खड़े हों और जल स्रोतों को गंदा करने वाले कल-कारखानों के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दें। वे प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों को इस बात के लिए विवश करें कि वे प्रदूषण फैलाने वाले उद्योग धंधों का लाइसेंस रद्द कर दें, जब तक वे गंदे पानी की सफाई और निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं कर लेते हैं। पर्यावरण की सुरक्षा आज इस देश की सबसे बड़ी समस्या है। अब आज और कल के मनुष्य का अस्तित्व इसी पर निर्भर है। संतोष की बात है, इस संदर्भ में न्यायालय महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन यह जनता का भी काम है कि वह अपनी नदियों को साफ-सुथरा रखने के लिए सरकार और बिना ट्रीटमेंट प्लांट लगाए चलने वाले औद्योगिक कारखानों पर दबाव बनाए, तभी इस पर लगाम लगेगी।

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