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राजपाटः मिटा दी दूरी

मानव इतिहास की सबसे बड़ी महामारी के कारण अब लोगों की मनोदशा भी प्रभावित हो रही है। जर्मनी के वित्त मंत्री ने अपने देश की अर्थव्यवस्था के भविष्य की धुंधली तस्वीर के बारे में सोचकर आत्महत्या कर ली तो सारी दुनिया हैरान रह गई।

Author Published on: April 4, 2020 1:47 AM
भारत में कोरोना पर काबू पाने के लिए पूर्ण बंदी पर सख्ती से अमल के अलावा सबसे जरूरी लोगों की जांच है।

संकट हो तो मतभेद भुलाने में ही भलाई होती है। कोरोना विषाणु के प्रकोप से उपजा संकट तो विश्वव्यापी है। प्रकृति अपना विकराल रूप पहले भी दिखाती रही है। पर पिछले रिकार्ड बताते हैं कि कभी भी भौगोलिक दायरा किसी भी महामारी का इतना व्यापक नहीं रहा जितना कोरोना का। दुनिया का कोई देश शायद ही अछूता बचा हो। बहरहाल बात मतभेद मिटाने की हो रही थी। जान पर बनी हो तो शत्रु भी मित्र बन जाते हैं। फिर शत्रुता सियासी हो तो उसकी अवधि वैसे भी दीर्घकालिक नहीं होती। कोरोना ने राजस्थान कांग्रेस के दोनों खेमों की दूरी को अगर पूरी तरह पाटा भी नहीं तो कम तो जरूर किया है। इस सूबे में विदेशी पर्यटकों की आवाजाही बारह महीने रहती है। सो कोरोना का खतरा अपेक्षाकृत ज्यादा था। पर देश में जब इस वायरस की आहट ही सुनाई पड़ रही थी, मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने मोर्चा संभाल लिया था। सबसे पहले पूर्णबंदी का ऐलान भी उन्होंने ही किया था। पर मतभेद के चलते उनके उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट शुरू में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखा रहे थे सरकार की योजनाओं में। यह बात अलग है कि प्रदेश में कांग्रेस के सूबेदार अभी वे ही हैं। लिहाजा, पार्टी के स्तर पर तो सक्रियता मजबूरी थी। भीलवाड़ा की औद्योगिक नगरी में कोरोना पीड़ित ज्यादा हुए। सरकार ने समझदारी दिखाई और प्रकोप को ज्यादा नहीं बढ़ने दिया। सूबे के ज्यादातर जिले अभी तक इस विषाणु से दूर ही हैं। समस्या विकट होने लगी तो गुटबाजी को भूल सचिन पायलट भी जी-जान से जुट गए गहलोत के साथ समस्या से जूझने में। समन्वित प्रयासों के परिणाम भी अपेक्षा के अनुरूप ही आ रहे हैं। अपने नेताओं की देखा-देखी जमीनी स्तर पर भी दोनों के समर्थकों में सकारात्मक समन्वय बनने में देर नहीं लगी।

खट्टा-मीठा
कोरोना भी कमाल का रहस्यमयी और कहर ढाने वाला विषाणु है। गरीब और विकासशील ही नहीं दुनिया के तमाम विकसित देश भी इसका प्रकोप झेल रहे हैं। विज्ञान एवं तकनीक के इस अति उन्नत युग में तीन महीने बीत जाने के बाद भी मनुष्य इस महामारी की दवा नहीं बना पाया है। इसके विनाशकारी प्रभावों को लेकर भी अनुमान और आशंकाएं लगाई जा रही हैं। सबसे सबल राष्ट्र अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तो यहां तक कह चुके हैं कि दो लाख लोगों की जान लेकर भी यह वायरस अमेरिका का पीछा छोड़ दे तो गनीमत होगी। ट्रंप ने दो टूक कहा है कि उनकी पहली चिंता लोगों की जान बचाना है। अर्थव्यवस्था का क्या होगा, बाद में सोचेंगे। यानी दूरगामी प्रभाव तो अर्थव्यवस्था पर ही पड़ेगा। विश्व बैंक भी आगाह कर चुका है कि चीन और भारत पर कम मगर बाकी देशों पर ज्यादा असर होगा कोरोना का। अपनी विकास दर तो पहले से ही पिछड़ रही थी। देखने लायक बात होगी कि कोरोना के बाद का दौर कितना बड़ा संकट लाएगा और हमारी सरकार उसका मुकाबला कैसी कुशलता से करेगी। दिहाड़ी मजदूर तो अभी से त्रस्त होने लगे हैं। आशंकित उद्योग व व्यापार जगत भी कम नहीं है। सरकार को अपने तमाम वित्तीय प्रबंध और विकास योजनाएं नए संदर्भ में देखनी पड़ेंगी। गनीमत है कि आपदा के बीच फसल अच्छी होने की खबर है। यानी खाद्यान्न की कमी के संकट से तो देश बचा रहेगा। एक तरफ महामारी से आशंकाओं और अनिश्चय का वातावरण है तो दूसरी तरफ अनिष्ट के खतरों के बीच पूर्णबंदी के सकारात्मक परिणाम भी आ रहे हैं। ज्यादातर गतिविधियां ठप्प हैं तो पर्यावरण पर अनुकूल असर हुआ है। दस दिन में ही आबोहवा सुधरी है। इतना ही नहीं हर महीने सड़क दुर्घटनाओं में होने वाली औसतन सवा लाख मौतों पर भी ब्रेक लगा है।

नए खतरे
मानव इतिहास की सबसे बड़ी महामारी के कारण अब लोगों की मनोदशा भी प्रभावित हो रही है। जर्मनी के वित्त मंत्री ने अपने देश की अर्थव्यवस्था के भविष्य की धुंधली तस्वीर के बारे में सोचकर आत्महत्या कर ली तो सारी दुनिया हैरान रह गई। हमारे देश में भी इस महामारी का खौफ लोगों के सिर पर सवार होने लगा है। वायरस है भी ऐसा ही। एक तो अभी इसकी दवा न होने की बात रोगी के दिमाग पर असर डालती है कि वह भगवान भरोसे है। दूसरे अलग-थलग होने (कोरेंटाइन) के कारण भी मानसिक तनाव बढ़ता है। चिकित्सा स्टाफ भी संक्रमित होने के डर से दूरी बनाता है। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में 19 मार्च को एक पीड़ित ने खुदकुशी की थी। गुरुवार को यूपी के शामली में सरकारी अस्पताल में एक युवक ने पंखे से लटक कर खुदकुशी कर ली। तीन दिन पहले अस्पताल में भर्ती हुए इस युवक में संक्रमित होने के अभी लक्षण ही दिखे थे। जांच रिपोर्ट का इंतजार था कि मानसिक रूप से परेशान होकर उसने खुदकुशी कर ली। प्रशासन के दावों की भी पोल खुल गई कि वहां डाक्टर, नर्स और गार्ड तैनात थे। इसी दौरान सहारनपुर में भी एक सरकारी कर्मचारी आदेश ने कोरोना से भयभीत होकर सुसाइड नोट लिखा और बुधवार शाम को अपने दफ्तर में खुदकुशी कर ली।

अस्पतालों की व्यवस्था से उजागर हुआ कि चाक चौबंद बंदोबस्त के ज्यादातर सरकारी दावे हवाई है। दिल्ली के आनंद विहार बस अड्डे पर जुटी यूपी के मजदूरों की भीड़ से खुलासा हुआ ही था कि केंद्र और यूपी सरकार में तालमेल नहीं था। केंद्र के पूर्णबंदी के बावजूद उत्तर प्रदेश सरकार ने बसें चला कर दिल्ली-नोएडा के मजदूरों को उनके जिलों तक पहुंचाने का ऐलान किया था। नतीजतन अफरातफरी फैली और संक्रमण का खतरा भी बढ़ा। सरकारी लापरवाही निजामुद्दीन में मरकज में जुटे जमातियों के मामले में भी दिखी। कोई पूछे कि विदेशी बिना वीजा अपने देश में कैसे आ सकते हैं? सरकारी एजंसियों को पूर्णबंदी के ऐलान से भी पहले उन पर निगरानी रखनी चाहिए थी। निजामुद्दीन मरकज में पूर्णबंदी के बाद भी हजारों की भीड़ जमा थी, तो क्या यह दिल्ली पुलिस और सरकार के खुफिया तंत्र की लापरवाही नहीं है। अब देशभर से तबलीगी जमातियों को खोजा जा रहा है। स्वाभाविक है कि संक्रमण रोकने के लिए एहतियातन ऐसा करना जरूरी है। पर सोशल मीडिया और कुछ टीवी चैनलों पर इसे लेकर भी सियासत शुरू की जा चुकी है। जिससे सांप्रदायिक वैमनस्य का खतरा है। जबकि इस महामारी के मुकाबले के लिए सारे देश, धर्म और संप्रदायों की एकता और एकजुटता जरूरी है। साथ ही सरकारी एजंसियों का समन्वय भी।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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