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राजपाट: निहितार्थ

अतीत में भी लालू कई मौकों पर काम आए अपने इस छोटे भाई के। फिर जरूरत पड़ेगी तो न क्यों करेंगे? भले उनका बेटा तेजस्वी हाथ धोकर अपने चाचा के पीछे क्यों न पड़ा हो? आखिर उसे उपमुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा तो खफा होना स्वाभाविक है। अब तो मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देखता होगा।

Author June 30, 2018 03:17 am
लालू प्रसाद यादव के साथ बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (File Photo)

सियासत में सयाने कभी संवाद नहीं तोड़ते। लालू हों या नीतीश, सयानेपन में कतई पीछे नहीं। तभी तो नीतीश ने फोन कर लालू से उनकी मिजाजपुर्सी की। अभी विरोधी खेमों में हैं तो क्या, रिश्ता तो छोटे-बड़े भाई का ही रहा है उनका। पर सियासी हलकों में तो हर बात का निहितार्थ निकलता है। अब यही चर्चा चल पड़ी बिहार में अचानक कि नीतीश फिर लालू के करीब आना चाहते हैं। अतीत में भी लालू कई मौकों पर काम आए अपने इस छोटे भाई के। फिर जरूरत पड़ेगी तो न क्यों करेंगे? भले उनका बेटा तेजस्वी हाथ धोकर अपने चाचा के पीछे क्यों न पड़ा हो? आखिर उसे उपमुख्यमंत्री पद से हटना पड़ा तो खफा होना स्वाभाविक है। अब तो मुख्यमंत्री पद का ख्वाब देखता होगा। उम्र कम है तो क्या? कम उम्र में भी प्रफुल्ल कुमार महंत असम के मुख्यमंत्री बने ही थे। तेजस्वी अब क्यों चाहेगा कि उसे चाचा की शरण में जाना पड़े। गठबंधन की नौबत आए भी तो नेतृत्व नीतीश का कतई स्वीकार्य नहीं होगा आहत तेजस्वी को। यह बात अलग है कि अभी तो लालू को ही बेटे की काबीलियत पर भरोसा नहीं होगा। दरअसल भाजपा के साथ रहते हुए भी नीतीश ने अपने तेवर बदले हैं। केंद्र की सरकार ही नहीं भाजपा पर भी दबाव बनाने के लिए कई मांगें उठा कर पैतरेबाजी शुरू कर दी है नीतीश ने। वे चाहते हैं कि भाजपा उनका सम्मान करे। लोकसभा चुनाव में भी अहमियत कम न हो। फिलहाल तो गठबंधन में सब सामान्य ही दिख रहा है। पर सियासत में विकल्प तो हर कोई सारे ही खुले रखता है। फिर नीतीश तो यों भी दूरदर्शी कहे जाते हैं। समर्थक यही बात सम्मान के साथ कहते हैं तो विरोधी तंज कसते हुए। और हां, अगर दूरदर्शी न होते तो भला पंद्रह साल तक मुख्यमंत्री बने रहने का नया कीर्तिमान कैसे कायम कर पाते।

खुश हुए आका

त्रिवेंद्र सिंह रावत का आत्मविश्वास अचानक बढ़ गया है। संघ के मुखिया मोहन भागवत और पार्टी आलाकमान दोनों ही अगर मुक्त कंठ से प्रशंसा कर जाएं तो भला आत्मविश्वास क्यों न बढ़े? अमित शाह ने देहरादून में पार्टी कार्यकर्ताओं के सम्मेलन में उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को न केवल अपना मित्र बताया बल्कि उनके कामकाज को भी कसीदे लगा दिए। इसी तरह हरिद्वार के संत सम्मेलन में मोहन भागवत आए तो रावत ने भी बजाई वहां जाकर उनकी हाजिरी। मकसद पार्टी में अपने विरोधियों की बोलती बंद करना भी जरूर होगा। संघ के मुखिया ने भी संतों के सामने अपने इस पुराने प्रचारक पर स्नेह की बौछार कर दी। फिर तो हर संत गाता नजर आया रावत के सरल स्वभाव के गीत। विरोधियों को तो इसके बाद से सांप सा सूंघ गया है।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

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