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कविताएंः जैसे वह पीठ

जैसे वह यह क्या है, किस पहर का असर यह, कि यों उदास हुई जाती हूं, बस उदास, ऐसी कैसी उदासी !

Author March 13, 2016 1:45 AM

सविता सिंह

जैसे वह

यह क्या है
किस पहर का असर यह
कि यों उदास हुई जाती हूं
बस उदास
ऐसी कैसी उदासी !
व्यथित होने के लिए
और और क्षीण होती आत्मा के लिए
कौन सा पहर सही है
चुनूं कैसे वह समय
जिसमें गल जाए सारी की सारी प्रसन्नता
चित्त में बाकी थोड़ी भी
बचा रहे सूखा-सा दुख फटा-फटा

वह कोई पहर ही रहा होगा
होंठ जब महसूस करते थे होंठ
दोपहर अपना तापमान
सारी पृथ्वी नाचती होती थी जब अपनी वनस्पतियों संग
कौन सा पहर वह
जिससे निकल चुका है समय जैसे वह।

पिछले साल बारिश

इस समय पिछले साल
बारिश हो रही थी
बरामदे में पानी की मोटी-मोटी बूंदें गिरतीं
और नृत्य करती हुर्इं जैसे बिखर जातीं
इस समय पिछले साल मेरे पास प्यार था
कानों में कुछ-कुछ कहता
उलझा मेरे बालों में जंगली फूल किसी फूल-सा
अच्छी हवा थी एक संसार था उस समय
बादल थे और एक संभावना कि
यह संसार और सुंदर हो सकता है
कोई किसी की देह को आत्मा की तरह
प्यार कर सकता है।
पीठ

नींद से उठ कर
जब आंखें खोलीं
करवट बदली
तब देखा
पहले जहां पीठ थी दीवार सी सादी
वहां अब एक पहाड़ है मुश्किलों का
दिन का यों शुरू होना
उबाऊ लगा
और फिर एक ऊब से दूसरी तक
चलते चलते जो थकान पहले से ही
मन को तोड़ रही थी
उसके लिए यह नया उबाऊ पहाड़
बहुत ही बेवजह लगा

मैं क्या करती
दोबारा करवट बदल
पीठ पहली दिशा में खड़ी कर दी
एक दीवार जो मन और शरीर के बीच
जाने कब से थी
फिर से यों काम आ गई।
अपना ही इंतजार
उसके साथ वहां कुछ भी नहीं था
अपने अकेलेपन के सिवा
आसमान अपना रंग छिपा लगभग सलेटी हो चला था
जैसे कोई विशाल पठार पृथ्वी का ही हिस्सा
रुख बदल रहा हो
धरती पांवों के नीचे थी मगर कितनी कम ठोस
और समुद्र दूर कहीं जहां से सुनाई पड़ती थी
पत्थर पर उसके सिर पटकने की आवाज

धुंधलका छंट चुका था
अब तो बस अपना ही चेहरा उतार फेंकना था
वही जिससे संसार उसे जानता था
और चल देना था चीर कर प्रकाश के
अप्रतिम तेज को वहां
जहां इंतजार कर रहा था वह अपना ही।

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