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राजपाट : राज की बात

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल का शासन लगाने की नौबत क्यों आई? राज की बात बन गई है सूबे की सियासत

Author February 22, 2016 15:57 pm

जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल का शासन लगाने की नौबत क्यों आई? राज की बात बन गई है सूबे की सियासत। मुफ्ती मोहम्मद सईद के निधन के बाद उनकी स्वाभाविक वारिस उनकी बेटी महबूबा मुफ्ती के होने में किसको संदेह है। पार्टी की मुखिया तो महबूबा पहले ही बन गई थीं। भाजपा ने भी औपचारिक एलान तो यही किया कि पीडीपी जिसे मुख्यमंत्री चाहे, बना सकती है। भाजपा को एतराज नहीं होगा। महबूबा की तरफ से तो कोई सफाई नहीं आई, पर पार्टी के कुछ नेताओं ने जरूर कहा कि पिता के शोक समारोह से निपटने के बाद शपथ लेना चाहेंगी महबूबा। शपथ बेशक वे अपनी सुविधा से ले लेतीं, पर राज्यपाल उन्हें मुख्यमंत्री तो मनोनीत कर ही सकते थे। केंद्र सरकार को राष्ट्रपति शासन क्यों लगाना पड़ गया? जितने मुंह उतनी बातें। कोई फरमा रहा है कि पीडीपी के भीतर असंतोष है। भाजपा से तालमेल के मुद्दे पर कई बड़े नेता नाराज हैं। जानकार तो महबूबा तक के बारे में दावा कर रहे हैं कि वे भाजपा की बजाए कांग्रेस से तालमेल की पक्षधर थीं। ऊपर से रविवार को सोनिया गांधी मातम पुर्सी के लिए श्रीनगर जा धमकीं। महबूबा को भी उनके करीबियों ने भड़काया बताते हैं कि भाजपा उनकी जगह हसीब द्राबू को गठबंधन का मुख्यमंत्री बनवाने के फेर में है। महबूबा कांग्रेस से तालमेल करना भी चाहें तो आंकड़ा साथ कहां देगा। कांग्रेस के 12 विधायकों के साथ आने पर 87 सदस्यीय विधानसभा में 40 तक ही पहुंच पाएगा गठबंधन का आंकड़ा। इस मामले में भाजपा के रणनीतिकार राम माधव की चुप्पी भी हैरतअंगेज है।

मिशन लालू का
लालू यादव को सियासत में कोई नापसंद भले करे, पर उनकी अनदेखी नहीं कर सकता। बिहार की सियासत को एक नया आयाम दिया है लालू ने। गंवई दिखने वाले लालू सूझबूझ के मामले में तीस मारखाओं की भी बोलती बंद कर देते हैं। बिहार की सियासत में इस बार अपना दमखम दिखा ही दिया। उनकी पार्टी राजद सबसे ताकतवर बन कर उभरी है। राजद सुप्रीमो ने बिहार में पहले की तरह अपना खूंटा फिर गाड़ दिया। अब दिल्ली की तैयारी है। लेकिन इसके लिए छोटे भाई यानी नीकु का साथ भी जरूरी है। दोनों पिछड़े वर्ग के ठहरे। एक साथ रहेंगे तो पिछड़े भी एकजुट नजर आएंगे। यही है अब लालू की रणनीति। पिछड़ों को किसी भी कीमत पर बंटने नहीं देना है। इसी पर फोकस है अब लालू का। कभी-कभार अपनी पार्टी के नेताओं को समझाते भी हैं कि दुश्मन ने फूट डालने की कम कोशिश नहीं की। लेकिन फेल हो गए। आगे भी ऐसी साजिशों को नाकाम ही करना है। खुद ही होशियार रहना है। अपने छोटे भाई को लालू किसी भी सूरत में नाराज नहीं होने देना चाहते। मुख्यमंत्री बनाया तो उसका पूरा खयाल करते रहना है। अपनी पार्टी के नेताओं की पिछले दिनों बैठक की। उसमें अपने नेताओं को खूब हड़काया। कहा कि अनाप-शनाप न बोलो और न काम करो। ऐसा कोई बयान मत दो जिससे पार्टी और सरकार पर आंच आए। अब अपनी पार्टी सत्ता में है। सरकार अपनी ही है। गंभीरता जरूरी है। कुछ नेता अखबारों में छपने के चक्कर में ऊट-पटांग बयान दे देते हैं। ई सबसे बचना चाहिए। अपने ही नेताओं को हड़काना इसलिए पड़ा क्योंकि वे नीतीश और जद (एकी) की नाराजगी को ताड़ गए थे। नाराजगी दूर करना जरूरी था। सूबे में अचानक बढ़ गए अपराधों के बारे में राजद के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह के तीखे बयान से जद (एकी) में नाराजगी बढ़ गई थी। पर सयाने लालू चाहते हैं कि पार्टी का कोई भी नेता भटके नहीं। अभी तो दिल्ली में तख्ता पलट करने के अधूरे मिशन को अंजाम देना बाकी है।

उलटबांसी
रामविलास पासवान को जब भी मौका मिलता है, लालू प्रसाद और नीतीश कुमार की आलोचना करने से चूकते नहीं। पत्रकारों से बतिया रहे थे तो अचानक बोल गए कि बिहार में मध्यावधि चुनाव होगा। ऐसी भविष्यवाणी करने का आधार भी बता दिया। कहा कि लालू और नीतीश में ज्यादा दिन तक नहीं पटने वाली। बेचारे दलित नेता बोल तो जरूर जाते हैं, पर हो जाता है उलटा। पहले कहा था कि महागठबंधन खड़ा ही नहीं हो पाएगा। लेकिन महागठबंधन तो खड़ा हो गया। फिर फरमाया कि महागठबंधन चुनाव के दौरान ही टूट जाएगा। यह भी गलत साबित हुआ। चुनाव में टूटने के बजाए जीत कर सत्ता में आ गया। इसके उलट जिस राजग की ताकत को लेकर पासवान ज्यादा ही इठला रहे थे, वह बुरी तरह हार गया। उनकी अपनी पार्टी लोजपा की तो मिट्टी पलीद हो गई। अब भविष्यवाणी की है कि महागठबंधन की सरकार कार्यकाल पूरा नहीं कर पाएगी। मध्यावधि चुनाव होगा। पासवान की ऊट-पटांग बयानबाजी विरोधियों को ही नहीं, उनकी पार्टी के भी कुछ नेताओं को अखरती है। पर चुप रहने का सुझाव देने की हिम्मत भी तो नहीं कर पाते। कुछ अपनी धारणा उनके बेटे चिराग तक जरूर पहुंचा देते हैं। वे जानते हैं कि पासवान बेटे की बात सुनते हैं। उस पर अमल भी करते हैं। पासवान के बारे में ऐसा सरोकार बेवजह नहीं है। ये नेता पासवान को राष्ट्रीय स्तर के दलित नेता के तौर पर देखते हैं। इसलिए उनकी छवि बिगड़े, यह उन्हें अखरता है। इसीलिए जताते हैं पासवान के बेतुके बयानों पर अपनी चिंता।

खतरे की घंटी
राजस्थान की वसुंधरा सरकार की शिकायतों से अब भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व परेशान हो चुका है। मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों की कार्यशैली से पार्टी के ज्यादातर नेता और कार्यकर्ता खफा हैं। शिकायतें बढ़ीं तो पार्टी अध्यक्ष अमित शाह को खुद मोर्चा संभालना पड़ा। सूबे के तमाम मंत्रियों के कामकाज की जांच करेंगे शाह। बेलगाम हो चुके भाजपाई मंत्री नौकरशाही से मिल चांदी कूट रहे हैं। और तो और, राजधानी जयपुर तक में प्रशासनिक अमले का बुरा हाल है। कलक्टर, पुलिस कमिश्नर और जयपुर विकास प्राधिकरण के मुखिया तीनों ही आरोपों के घेरे में हैं। जबकि आम आदमी का ज्यादा वास्ता इन्हीं दफ्तरों से पड़ता है। बिना घूस दिए किसी का यहां कोई काम होता ही नहीं। तभी तो पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मौका मिल गया है। सबूतों के साथ तीनों दफ्तरों के आला अफसरों पर आरोप जड़ दिए। हैरानी की बात तो यह है कि जयपुर शहर के तीनों भाजपा विधायक इस समय सरकार में मंत्री हैं। लेकिन उनकी बोलती बंद है। गृहमंत्री गुलाब चंद कटारिया और नगर विकास मंत्री राजपाल सिंह शेखावत ने तो कह भी दिया था कि पुलिस को जमीनों की दलाली का धंधा बंद करना चाहिए। जबकि कटारिया जेडीए को जयपुर विकास प्राधिकरण के बजाए जयपुर डाकू एसोसिएशन बता चुके हैं। पर बेईमान अफसरों की मुख्यमंत्री तक पहुंच होने से मंत्री उनके मुकाबले बौने साबित हो रहे हैं। भाजपा के सूबेदार अशोक परनामी भी जयपुर शहर से ही विधायक हैं। पर वे भी मौन हैं। उधर लोग खुलेआम कह रहे हैं कि जहां पूरी सरकार मौजूद हो, वहीं अगर भ्रष्टाचार का यह हाल है तो बाकी जिलों का अंदाज आसानी से लगाया जा सकता है। चूंकि घनश्याम तिवाड़ी को असंतुष्ट माना जाता है। लिहाजा वे कुछ भी शिकायत करते हैं तो आलाकमान भी तवज्जों नहीं देता। अमित शाह से कुछ उम्मीद है भाजपा कार्यकर्ताओं को अन्यथा वे मान कर चल रहे हैं कि अगले चुनाव में राजस्थान भी दिल्ली और बिहार की राह ही जाएगा।

रिश्तों का रसायन
राजनीति में न दोस्ती स्थायी होती है और न दुश्मनी। वक्त के साथ बनते-बिगड़ते रहते हैं सियासी रिश्ते। पश्चिम बंगाल भी अपवाद नहीं है। ममता बनर्जी और उनके पुराने सहयोगी मुकुल राय के रिश्ते बानगी हैं। सारदा घोटाले में सीबीआइ की पूछताछ के बाद हाशिए पर चल रहे थे मुकुल राय। लेकिन अचानक उनकी घर वापसी हुई है। एक दौर था जब तृणमूल कांग्रेस में मुकुल राय की तूती बोलती थी। ममता के बाद सबसे ताकतवर उन्हीं को माना जाता था। पर एक बार दीदी की नजरें टेढ़ी हुर्इं तो पूरी पार्टी ने ही किनारा कर लिया मुकुल राय से। पार्टी के तमाम पदों से भी छुट्टी हो गई थी उनकी। पर वक्त ने करवट ली और फिर ममता व मुकुल के मतभेद दूर हो गए हैं। अगले विधानसभा चुनाव में पार्टी को दो तिहाई बहुमत मिलने का दावा भी कर दिया है मुकुल राय ने। जाहिर है कि विधानसभा चुनाव से पहले ममता उन्हें पार्टी में फिर अहम जिम्मा दे सकती हैं। हाशिए पर थे तो बीच-बीच में कांग्रेस या भाजपा में शामिल होने की अटकलें भी खूब उछली मुकुल राय के बारे में। लेकिन नए साल के पहले ही दिन कोलकाता में ममता के घर जाकर उन्होंने संकेत दे दिया कि अनबन अब अतीत की बात बन चुकी है। ममता भी क्या करें? सियासी प्रबंधन का हुनर तो है ही मुकुल के पास। ममता से रूठ कर वे भी कहीं जा नहीं पाए। यानी दोनों के रिश्ते अंतत: ‘तो को और न मो को ठौर’ वाले ही साबित हो गए।

सिर मुड़ाते ओले
उत्तराखंड के नए भाजपा सूबेदार अजय भट्ट के साथ तो सिर मुड़ाते ओले पड़ने वाली बात हो गई। हरिद्वार में हुए जिला पंचायत चुनाव में उनकी पार्टी की बुरी गत हुई है। पंचायत की 47 में से महज तीन सीटों पर ही सिमट गई भाजपा। जबकि लोकसभा में हरिद्वार सहित सूबे की पांचों सीटें भाजपा के ही कब्जे में ठहरी। पिछली दफा भी पंचायत में सात सीटें जीती थीं पार्टी। लेकिन बेचारे अजय भट्ट पहले ही सियासी इम्तिहान में फेल हो गए। यह बात अलग है कि अच्छा प्रदर्शन सत्तारूढ़ कांग्रेस भी कहां कर पाई। उसके खाते में भी तो महज 12 ही सीटें आई हैं। इस मामले में बाजी तो 16 सीटों के साथ बसपा ने मारी है। हरिद्वार एक दौर में बसपा का गढ़ रह चुका है। इस तरह अपनी खोई जमीन वापस पाई है मायावती की पार्टी ने। पार्टी के पूर्व विधायक मोहम्मद शहजाद को दिया जा रहा है श्रेय। इस जीत ने मायावती को भी संजीवनी दे डाली। तभी तो बयान दिया है कि उत्तर प्रदेश ही नहीं, उत्तराखंड में भी बसपा इस समय सबसे बड़ी पार्टी है।

रिटर्न गिफ्ट
नंदकुमार चौहान फिर मध्यप्रदेश भाजपा के सूबेदार बन गए। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने मैनेज किया यह चुनाव। चौहान चौतरफा चुनौतियों से घिरे हैं। ऐसे में जेबी अध्यक्ष उनके लिए राहत की बात है। पहले झाबुआ लोकसभा उपचुनाव और फिर शहरी निकाय चुनाव में भाजपा की पराजय होने से पार्टी आलाकमान चौहान पर दबाव बढ़ा सकता है। प्रभात झा या प्रहलाद पटेल सूबेदार बन गए होते तो शिवराज का तनाव बढ़ जाता। कहने को नंदू भैया का चुनाव आम राय से हुआ। लेकिन परदे के पीछे तो तिकड़म और जोड़-तोड़ का खेल खूब चला। सूबे से 260 मतदाताओं की सूची बनाई गई। इसी से तिकड़म सामने आ गई। प्रभात झा, कैलाश विजयवर्गीय और फग्गन सिंह कुलस्ते जैसे धुरंधरों के नाम नदारद थे। सफाई दी गई कि जिन जिलों से इन नेताओं का नाम आना था, वहां संगठन चुनाव की प्रक्रिया पूरी ही नहीं हो पाई। नंदू भैया को फिर सूबेदारी थमा कर शिवराज चौहान ने अपना वर्चस्व बरकरार रखा है। नंदू के पदभार संभालने के मौके पर कैलाश विजयवर्गीय और प्रहलाद पटेल नदारद थे। अलबत्ता सुषमा स्वराज ने रोचक नसीहत दे डाली। फरमाया कि संगठन में जरा भी दरार आए तो उसे तत्काल दुरुस्त करें। कपड़े में अगर छोटा सा छेद हो जाए तो उसे वक्त पर रफू करने से कपड़ा बच सकता है। संगठन बड़ा हो तो गिलवे-शिकवे भी हो सकते हैं। पर शिकवे-शिकायतों को धैर्यपूर्वक निपटाना चाहिए। सुषमा की इस नसीहत को पार्टी के अंदरूनी असंतोष और नेताओं की आपसी खींचतान से जोड़ कर देखा जा रहा है तो इसमें बेतुका क्या है? खास बात यह है कि अपनी ताजपोशी के मौके पर नंदू भैया ने भी शिवराज चौहान को रिटर्न गिफ्ट देने में देर नहीं लगाई। एलान कर दिया कि 2018 का अगला विधानसभा चुनाव भी पार्टी शिवराज के नेतृत्व में ही लड़ेगी।

टोटा काडर का
मैहर विधानसभा उपचुनाव की घोषणा तो हुई नहीं, पर सियासी घमासान जरूर तेज हो गया है। कांग्रेस ने इस उपचुनाव को पूरी ताकत से लड़ने की रणनीति बनाई है। मैहर के बसपा नेता मनीष पटेल शुक्रवार को कांग्रेस के सूबेदार अरुण यादव की मौजूदगी में उनकी पार्टी में शामिल हो गए। 2013 के चुनाव में इस सीट पर 40 हजार वोट पाए थे पटेल ने हाथी की सवारी करके। हालांकि पारिवारिक पृष्ठभूमि कांग्रेसी ठहरी। उनके नाना रामसेवक 1968 में कांग्रेस के विधायक थे। जबकि दादा भी 1972 और 1985 का विधानसभा चुनाव कांग्रेस के उम्मीदवार की हैसियत से ही जीते थे। पटेल पर डोरे भाजपा भी डाल रही थी। भनक लगते ही कांग्रेसी सक्रिय हो गए। जाहिर है कि अब वे कांग्रेस के उम्मीदवार बनेंगे। भाजपा का दारोमदार नारायण त्रिपाठी पर है जो कांग्रेस छोड़ कर आए हैं। सतना लोकसभा सीट पहले अर्जुन सिंह और फिर उनके बेटे अजय सिंह की रणभूमि रही है। लेकिन मनीष पटेल पार्टी में आए तो अजय सिंह को खबर तक नहीं दी गई। हैरानी की बात है कि दोनों राष्ट्रीय दलों को उपचुनाव में दल-बदलुओं का आसरा रहेगा। शिवराज चौहान की साख का सवाल है सो, तीन बार इलाके का दौरा कर चुके हैं वे अब तक।

राजा का डंका
पंचायत चुनाव के जरिए कांग्रेस ने हिमाचल में वापसी की है। लोकसभा चुनाव में भाजपा ने चारों सीटें जीती थीं तो कांग्रेस की उलटी गिनती शुरू होने के निहितार्थ निकाले गए थे। सूबे के दस जिलों में से छह में कांग्रेस की जिला पंचायत बनने जा रही हैं। भाजपा को कुल्लू, ऊना, हमीरपुर और किन्नौर की जिला पंचायतें ही मिल पाएंगी। हमीरपुर ठहरा प्रेम कुमार धूमल का इलाका। बहुमत भले पा गई हो भाजपा, पर यहां सीटें तो उसकी घट गईं। ऊना में भाजपा का प्रदर्शन भले अच्छा रहा हो, पर सूबेदार सतपाल सिंह सत्ती अपने घर की सीट कांग्रेस से बचा नहीं पाए। भाजपा के कद्दावर नेता महेंद्र सिंह की बेटी और दामाद दोनों हार गए। केंद्रीय मंत्री जगत प्रकाश नड्डा के बिलासपुर जिले में भी भाजपा का बेड़ा गर्क हो गया। भाजपा के लिए खतरे की घंटी हैं पंचायत के ये नतीजे।

थोथे दावे
नए लोगों को मौका देने की भाजपा की नीति की हिमाचल में हवा निकल गई। सतपाल सिंह सत्ती लगातार तीसरी बार पार्टी के सूबेदार बने तो संदेश यही निकलेगा कि गुटबाजी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं आ पा रही है भाजपा। जगत प्रकाश नड्डा और प्रेम कुमार धूमल की खींचतान का ईनाम पा गए हैं सत्ती। दोनों से बराबर की दूरी ठहरी। दोनों ही अपने-अपने पसंदीदा नाम बढ़ा रहे थे। टकराव हुआ तो सहमति सत्ती के नाम पर ही बनानी पड़ गई। धूमल खेमे ने अलबत्ता रणधीर शर्मा और शांता कुमार समर्थकों ने सांसद राम स्वरूप का नाम बढ़ाया था। नड्डा खुल कर तो मैदान में नहीं आए पर परदे के पीछे से जोड़-तोड़ कर सत्ती को ही फिर बनवा दिया सूबेदार। नए लोगों को अवसर देने का अब किस मुंह से दावा कर सकती है हिमाचल में भाजपा।

दूध के जले
भाजपा के लिए चंडीगढ़ से अच्छी खबर आई। पंद्रह साल के वनवास के बाद नगर निगम में उसका डंका बजेगा। यह बात अलग है कि इस चक्कर में पापड़ कम नहीं बेले पार्टी के नेताओं ने। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल से लेकर पंजाब के अकाली मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल तक की भूमिका रही। हरियाणा सरकार ने एक मनोनीत पार्षद अरुणा गोयल को मैनेज करने के लिए उनके बेटे इंद्रेश गोयल को अतिरिक्त महाधिवक्ता बनाने से भी गुरेज नहीं किया। चंडीगढ़ के नगर निगम की हारजीत का खास सियासी नफा-नुकसान भले न हो पर हारते तो विरोधी इसे भी मोदी के घटते जादू का नतीजा करार देते।

मुफ्त का माल
पंजाब में आम आदमी पार्टी की सक्रियता अचानक बढ़ी है। लोकसभा चुनाव में चारों सीटें अरविंद केजरीवाल की पार्टी को इसी सूबे ने दिलाई थी। पर चुनाव के बाद गुटबाजी से बिखर गई उनकी पार्टी। अब विधानसभा चुनाव करीब आ रहे हैं तो कांग्रेस और अकाली दल दोनों की ही नींद उड़ गई है। दोनों दलों से बाहर आ रहे नेताओं की पसंद केजरीवाल की पार्टी ही बन रही है। तभी तो खुद मुख्यमंत्री बादल को कहना पड़ गया कि आप की सारी हवा हवाई है, जमीनी नहीं। कई पूर्व विधायक पिछले एक पखवाड़े में केजरीवाल की शरण में आ चुके हैं। कांग्रेस और अकाली दल के बागियों की बदौलत विधानसभा चुनाव में अच्छी सफलता की उम्मीद संजो रही है पार्टी।

सपना साकार
नया साल युवराज ने मिजाज के मुताबिक भले यूरोप में मनाया हो, पर उनकी मां सोनिया गांधी को उत्तराखंड भा गया। वे पहाड़ों की रानी मसूरी पहुंच गईं। पर पार्टी नेताओं के लिए परिक्रमा की मनाही के साथ। मसूरी का न्योता गांधी परिवार के करीबी कुंवर बिजेंद्र सिंह की तरफ से आया था। सो, उन्हीं के महल में उन्हीं की मेजबानी में मनाया कांग्रेस अध्यक्ष ने नया साल। दखलअंदाजी नहीं करने की सोनिया की हिदायत का असर भी कमाल का दिखा। पार्टी के छुटभैए नेताओं की तो बिसात क्या थी, मुख्यमंत्री हरीश रावत और पार्टी के सूबेदार किशोर उपाध्याय तक भी हिम्मत नहीं जुटा पाए खलल डालने की। रेलगाड़ी से पहुंची थीं सोनिया देहरादून। वापसी भी रेलगाड़ी से ही करना पसंद किया। चकराता के लाखा मंडल स्थित प्राचीन मंदिर में भी गईं वे। मंदिर के पुजारी को मकसद बताने से भी नहीं चूकीं। दरअसल उनके पति राजीव गांधी चाहते थे इस मंदिर में पूजा-अर्चना करना। उनका सपना अधूरा ही रह गया। पति के सपने को मौका मिला तो पूरा करने से क्यों गुरेज करतीं सोनिया। बकौल पुजारी पति की अधूरी इच्छा का खुलासा करते वक्त भावुक हो गई थीं कांग्रेस अध्यक्ष।

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