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संपादकीय: सरोगेसी की सीमा

पिछले कुछ सालों के दौरान भारत के चिकित्सा बाजार में सरोगेट मदर का धंधा जिस कदर फल-फूल रहा था, उसमें चुपचाप पल रहे कुछ अमानवीय पहलुओं की अनदेखी हो रही थी। विडंबना यह है कि एक कारोबार की शक्ल ले चुके होने के बावजूद कानूनी स्तर पर फिलहाल ऐसी व्यवस्था नहीं है कि अगर इसमें […]

Author August 26, 2016 01:08 am
शायद कोई भी एक ऐसी स्थिति के पक्ष में खड़ा नहीं होगा कि दूसरे के गर्भ से बच्चा पैदा करने की यह समूची प्रक्रिया किसी के शोषण का औजार बने।

पिछले कुछ सालों के दौरान भारत के चिकित्सा बाजार में सरोगेट मदर का धंधा जिस कदर फल-फूल रहा था, उसमें चुपचाप पल रहे कुछ अमानवीय पहलुओं की अनदेखी हो रही थी। विडंबना यह है कि एक कारोबार की शक्ल ले चुके होने के बावजूद कानूनी स्तर पर फिलहाल ऐसी व्यवस्था नहीं है कि अगर इसमें कोई पीड़ित पक्ष है तो वह अपने हक में कानून का सहारा ले सके। इसलिए सरकार ने ‘किराए की कोख’ के नियमन का जो फैसला लिया है, उसे एक सकारात्मक पहल कहा जा सकता है। बुधवार को ‘सरोगेसी (नियमन) विधेयक, 2016’ को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी, जिसके तहत कई ऐसे प्रावधान किए गए हैं जो न सिर्फ इस पद्धति से बच्चा चाहने वालों का दायरा तय करते हैं, बल्कि इसके एक कारोबार के रूप में चलने पर भी पाबंदी लगाते हैं।

इस विधेयक के प्रावधानों के मुताबिक विदेशियों और विदेशी भारतीय नागरिक का कार्ड रखने वाले एनआरआइ और पीआइओ दंपति, अविवाहित और लिव-इन में रहने वाले जोड़े, एकल अभिभावक और समलैंगिक व्यक्ति सरोगेसी के जरिए बच्चा हासिल नहीं कर सकेंगे। इसके अलावा, कई ऐसी शर्तें तय की गई हैं जो इसके व्यवसाय बनने की गुंजाइशों को खत्म करती हैं। मसलन, विवाहित जीवन का कम से कम पांच साल गुजार चुके भारतीय दंपतियों को ही इस तरीके का इस्तेमाल करने की इजाजत होगी। सरोगेट मां बनने वाली महिला बच्चा चाहने वाले दंपति की करीबी रिश्तेदार ही हो सकेगी, जो बिना किसी राशि के सिर्फ एक बार ऐसा कर सकेगी। कई अन्य सख्त प्रावधान भी हैं। कानून के उल्लंघन पर दस साल की कैद और दस लाख रुपए तक के जुर्माने की व्यवस्था है।

दरअसल, भारत में सरोगेसी का जो ढांचा बन गया है उसमें किसी दंपति के लिए इस पद्धति से बच्चा हासिल करना इतना आसान और कम खर्च में संभव हो रहा था कि इस मकसद से विदेशों से यहां आने वाले लोगों की तादाद हर साल बढ़ती जा रही थी। लेकिन जब सरोगेसी का नियमन नहीं होने की सबसे ज्यादा मार सेरोगेट मदर पर पड़ने की बात उठाई जाती थी, तो यह दलील देकर वह दबा दी जाती रही कि इससे गरीब महिलाओं की कुछ मदद हो जाती है। यह अपने आप में एक संवेदनहीन तर्क है कि किसी की मजबूरी और त्रासदी का हल कुछ रकम अदा करना भर मान लिया जाए।

इसके बचाव में लगे तमाम लोग इस सवाल से बचते रहे कि सेरोगेसी की पद्धति से अगर कोई दंपति बच्चा हासिल करता है तो उसके लिए उससे कितनी रकम वसूली जाती है और सेरोगेट मदर बनने वाली महिला को उसमें से कितने पैसे दिए जाते हैं। फिर, दंपति के संबंध से लेकर सरोगेसी से पैदा बच्चे की जिम्मेदारी तक से जुड़े कई सवाल हैं। इन सवालों के हल के लिए कई जरूरी प्रावधान प्रस्तावित विधेयक में किए गए हैं। हालांकि आज के समय की जरूरत और चिकित्सा पर्यटन से भारत को होने वाली आय का हवाला देकर प्रस्तावित कानून को कठघरे में खड़ा करने की कोशिश की जाएगी। लेकिन शायद कोई भी एक ऐसी स्थिति के पक्ष में खड़ा नहीं होगा कि दूसरे के गर्भ से बच्चा पैदा करने की यह समूची प्रक्रिया किसी के शोषण का औजार बने।

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