मूल्य क्षरण के इस दौर में

गांधी और शास्त्री जयंती को केवल एक और सार्वजनिक छुट्टी से अलग वह दिन बनाने की जरूरत है, जब हम नैतिकता और आदर्श पर बहस-मुबाहिसा कर भावी भारतीय समाज की परिकल्पना को यथार्थ बनाने की चेष्टा करें। अन्यथा इक्कीसवीं सदी में तो हम पिछली सदी के गांधी और शास्त्री सरीखे व्यक्तित्वों की नैतिक शुचिता और आदर्श का उदाहरण पढ़ा पा रहे हैं, बाईसवीं सदी में शायद आयातित उदाहरण नैतिक शिक्षा की कक्षा में पढ़ाने पड़ेंगे।

नवनीत शर्मा

नैतिकता और आदर्श को लेकर विमर्श दिन पर दिन जटिल होते जा रहे हैं। यह जटिलता दार्शनिक नहीं, समाजशास्त्रीय और राजनीतिक है। दो अक्तूबर का दिन हमें इन दो शब्दों का विवेचन और समसामयिकता में इन्हें खंगालने के लिए झकझोरता है। गांधी की नैतिकता और लालबहादुर शास्त्री के आदर्श, ताकशंद समझौते और प्रकरण की तरह अबूझ और रहस्यमय हो गए हैं। नैतिकता और आदर्शों का अध्ययन और अध्यापन परीक्षाओं और साक्षात्कारों तक सिमट कर रह गया है, ऐसा शायद इस सवाल के सदा अनुत्तरित रहने से भी है कि कौन-सी नैतिकता और किसका आदर्श।

इक्कीसवीं सदी के कक्षा-कक्ष में नैतिकता और आदर्शों का उदाहरण देने के लिए हम बीसवीं सदी के मोहताज हैं। इक्कीसवीं सदी में इनका अकाल क्यों है, यह एक और शोध का विषय है। साहित्य में नैतिकता और आदर्शों ने मुंशी प्रेमचंद के ‘नमक का दरोगा’ के नायक द्वारा रिश्वत लेने से साफ इंकार कर देने और उसके नतीजे भुगतने से लेकर हरिशंकर परसाई के ‘सदाचार का तावीज’ के नायक द्वारा महीने का आखिर होने का हवाला देते हुए रिश्वत स्वीकार कर लेने तक की यात्रा कर ली है। वैश्विक और वैयक्तिक नैतिकता के बीच के द्वंद्व में गांधी और शास्त्री की नैतिकता के प्रस्थान बिंदु मध्ययुगीन लगते हैं।

गांधी दो विश्व युद्धों के बीच में अहिंसा के पक्षधर्मी हैं और शास्त्री आजाद भारत की भव्यता के बीच सादगी की। गांधी किसी भी निर्णय पर पहुंचने से पहले पंक्ति के अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचने को कहते हैं और शास्त्री फटी धोती में थेगला लगा कर प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने का आदर्श प्रस्तुत करते हैं। दोनों उस जन-सामाजिक भ्रम को दूर करने की बात करते हैं कि हीरा तो लाल कागज में ही शोभायमान है। दोनों संघर्ष की उस गाथा के उदाहरण हैं, जहां एक सामान्य परिवार में जन्मे साधारण व्यक्ति एक असाधारण मुकाम तक न केवल पहुंचते, बल्कि सबको वहां पहुंचाने का ध्येय रखते हैं।

नैतिकता और आदर्शों पर आसन्न संकट राजनीतिक नेतृत्व में इसके अकाल के कारण ही नहीं, बल्कि यह एक सामाजिक और शैक्षणिक विमर्श का भी संकट है। तेजी से बदलते मूल्य और प्रतिमान न केवल आधुनिक और उत्तराधुनिक के बीच प्रतियोगिता का मामला है, साथ ही यह अस्मिता और उसकी निर्मिति की प्रक्रिया में नित संशोधन होने के कारण भी है। मनुष्य अपने आदर्शों का चुनाव कब कर लेता है और क्या ये किसी नैतिक दर्शन से प्रभावित होते हैं या बाल्यकाल में ही इन्हें गढ़ लेता और पूरे जीवन उनका परिपालन करता रहता है। गांधी दर्शन और शास्त्री सरीखे आदर्शों की अनुपस्थिति में हम अगली पीढ़ी को कौन-सा मॉडल परोस रहे हैं।

बालक कैसे निर्मित करता है कि ‘सच बोलना चाहिए’ एक आदर्श अवश्य है, पर पुस्तकीय ज्ञान है, रोजमर्रा उपयोग के लिए नहीं है। क्यों हम सार्वजनिक जीवन में एक पक्ष का चयन नहीं करते, चाहे वह हमें कर्ण सरीखा ही बना दे, दल-बदल के लिए कानून क्यों बनाना पड़ता है। चुने हुए प्रतिनिधियों को घेर कर अपने ही दल में बने रहने के लिए क्यों मजबूर करना पड़ता है।

हम नैतिकता के उस गांधीवादी मानदंड को खो चुके हैं, जिसके अंतर्गत किसी और को अधिक गुड़ न खाने का उपदेश देने से पहले खुद गुड़ खाने की आदत का त्याग करना पड़ेगा। इसके बरक्स हमने गुड़ खाए, गुलगुले से परहेज के पाखंड को नैतिक मानक बना दिया है। गांधी तो कहते थे कि मेरा जीवन ही मेरा उपदेश है, पर अब हम पढ़ाए जाने योग्य ज्ञान और अनुकरणीय ज्ञान में भेद करने लगे हैं, आदर्श और व्यावहारिक सत्य में अंतर करने लगे हैं। गांधी ने जिस दर्शन को चुना उसके साथ आजीवन डटे रहे, चाहे इसके लिए उनके समय में ही और उनके बाद भी कड़ी आलोचना हुई। गांधीवादी नैतिकता एक ऐसे नैतिक मनुष्य की परिकल्पना करती है, जो धर्मभीरु तो हो, धर्मांध नहीं।

गांधी का नैतिक दर्शन हमें धर्मगत नैतिकता से इतर बिना ईश्वर के भयाक्रांत स्वरूप को निर्मित किए, हमें उनके अनुकंपायमान होने से भी नैतिक होना सिखाता है। कोई मनुष्य केवल इसलिए नैतिक न हो कि कोई (ईश्वर!) उसे देख रहा है। गांधी की सत्य और नैतिकता की परिकल्पना स्थूल नहीं है, जिसमें केवल कर्म को जांचा जाए, बल्कि मन-विचार में भी अनैतिकता न हो। अविकारी मनुष्य ही सर्वधर्म समभाव तक पहुंचेगा, अन्यथा कौन-सी धार्मिक नैतिकता श्रेष्ठ है और किसका ईश्वर अधिक फलदायी है, यह प्रतियोगिता सांप्रदायिकता को ही बढ़ावा देगी। गांधी का नैतिक मनुष्य निर्भीक और पारदर्शी होना अनिवार्य है, अहिंसा, हिंसा के मुकाबले अधिक साहस और निर्भीकता पर निर्भर है। औपनिवेशिक साम्राज्य से लड़ाई लड़ने को गांधी हथियारों के बरक्स सत्याग्रह, अहिंसा, सविनय, खादी, बकरी को अपना अस्त्र बनाते हैं। उनकी मान्यताओं के आलोक में यह दर्शन व्याप्त था, जिसमें स्वराज और स्वतंत्रता अमर्यादित अनैतिक उथल पुथल न होकर आत्म निर्देशित अनुशासन और लोकसेवा की भावना से परिपूर्ण होना है।

आजादी के लिए सौ वर्षों के आंदोलन में निर्मित नैतिक मूल्यों को हमने सत्तर वर्षों में ही भुला दिया। खादी के उजले लिबास में मनुष्य अब श्रद्धा की जगह उनकी धूर्तता से सचेत होने का संकेत देते हैं। सादगी को पिछड़ापन मान लिया गया है और सत्यनिष्ठा को मूर्खता। इक्कीसवीं सदी में अपरिहार्य होने के बावजूद गांधी अनावश्यक करार दिए जाने लगे हैं। शिक्षा विमर्श और कक्षाओं में तो यह संकट और भी गहरा जाता है जब एक प्रोफेसर यह दंभपूर्ण दावा करता है कि हम तो गोडसे को पूजने वाले लोग हैं।

शास्त्रीजी ने गांधी समझ के अनुरूप ही लालबहादुर वर्मा से लालबहादुर शास्त्री होना श्रेयस्कर समझा। मात्र छह दशक में ही, एक कार लोन के लिए संघर्ष करने वाले प्रधानमंत्री को संसद में सभी करोड़पति सदस्यों ने विस्थापित कर दिया है। राजधर्म और नैतिकता के जिस परिचय को देते हुए शास्त्रीजी ने अरियालूर की रेल दुर्घटना पर मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया था, वह इक्कीसवीं सदी की राजनीति में लुप्तप्राय है। दो धोतियों से प्रधानमंत्रित्व काल पूरा करने वाले शास्त्री के बरक्स अब नेतृत्व नई गाड़ियों और हवाई जहाजों की दौड़ में है। भारतीय समाज में यह पांच दशक पहले ‘अश्लील’ व्यवहार समझा जाता था। दुनिया के सबसे ज्यादा भूखग्रस्त आबादी वाले देश में अश्लील यह आज भी है, पर अब यह अश्लीलता देश सेवा करने का प्रतिफल मान कर जायज मान ली गई है।

गांधी और शास्त्री जयंती को केवल एक और सार्वजनिक छुट्टी से अलग वह दिन बनाने की जरूरत है, जब हम नैतिकता और आदर्श पर बहस-मुबाहिसा कर भावी भारतीय समाज की परिकल्पना को यथार्थ बनाने की चेष्टा करें। अन्यथा इक्कीसवीं सदी में तो हम पिछली सदी के गांधी और शास्त्री सरीखे व्यक्तित्वों की नैतिक शुचिता और आदर्श का उदाहरण पढ़ा पा रहे हैं, बाईसवीं सदी में शायद आयातित उदाहरण नैतिक शिक्षा की कक्षा में पढ़ाने पड़ेंगे।

गांधी के पुनर्पाठ और शास्त्री के अनुकरण के झंझावत में, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना ने लिखा- ‘घर के पिछवाड़े बंधी गांधी की बकरी मिमियाती है, इतने में कहीं से गोली चलने की आवाज आती है।’ दो अक्तूबर का दिन निकलने का संकेत है, न कि मध्यवर्गीय पलायन का, ‘क्योंकि अंधेरे में निकाल पड़ो तो अंधेरा, अंधेरा नहीं रहता’, और ‘कुछ कोयले सुलग जाएं तो बाकी गीले कोयले भी आग पकड़ लेते हैं’। हमें गांधी और शास्त्री के गीले पड़ चुके नैतिकता और आदर्श के अलाव को बस हवा देने की जरूरत है अन्यथा सांप्रदायिकता और बाजारवाद तो हमें लील लेने को आतुर तो हैं ही।

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