ताज़ा खबर
 

भागवत उवाच

कारोबारी वर्ग भाजपा समर्थक माना जाता रहा है, इसलिए उसकी नाराजगी को लेकर भाजपा और संघ की चिंता स्वाभाविक है।

Author October 2, 2017 6:07 AM
RSS चीफ मोहन भागवत

अर्थव्यवस्था में जान फूंकने का प्रयास कर रही नरेंद्र मोदी सरकार के लिए संघ प्रमुख मोहन भागवत का ताजा बयान एक तरह से नई चेतावनी है। उन्होंने कहा कि नीति आयोग और राज्यों के नीति सलाहकारों को घिसे-पिटे विचारों से बाहर आकर अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए नए सिरे से नीतियां बनाने की जरूरत है। उन्होंने किसानों और छोटे कारोबारों-उद्योगों की दशा सुधारने पर खास जोर दिया। यह अकारण नहीं है। नोटबंदी और फिर जीएसटी लागू होने के बाद अर्थव्यवस्था का रुख नीचे की ओर हो गया है। इसे लेकर विपक्ष तो सरकार पर अंगुलियां उठा ही रहा है, भाजपा के भीतर से भी विरोध के स्वर उभरने लगे हैं। नोटबंदी के चलते लाखों छोटे कारोबारियों के धंधे पर प्रतिकूल असर पड़ा। किसानों की परेशानी बढ़ी, लाखों दिहाड़ी मजदूरों का रोजगार छिन गया। उसके बाद रही-सही कसर जीएसटी ने पूरी कर दी। इसमें व्यावहारिक कदम न उठाए जा सकने के कारण सबसे बुरा प्रभाव छोटे कारोबारियों पर पड़ रहा है। उनमें केंद्र सरकार की नीतियों को लेकर असंतोष दिखने लगा है। कारोबारी वर्ग भाजपा समर्थक माना जाता रहा है, इसलिए उसकी नाराजगी को लेकर भाजपा और संघ की चिंता स्वाभाविक है।

भाजपा अभी से अगले आम चुनाव की रणनीति बनाने में जुट गई है। मगर फिलहाल साढ़े तीन साल के नरेंद्र मोदी सरकार के कामकाज में ऐसा कुछ उल्लेखनीय नजर नहीं आ रहा, जिसे वह भुना सके। विकास के नारे के साथ नरेंद्र मोदी ने सत्ता की कमान संभाली थी, मगर तमाम प्रयासों के बावजूद न तो प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ाया जा सका है और न रोजगार के नए अवसर पैदा किए जा सके हैं। आर्थिक नीतियों में व्यावहारिकता न होने की वजह से विकास दर लुढ़कनी शुरू हो गई है और लाखों लोगों के रोजगार छिन गए हैं। किसान बीमा जैसी महत्त्वाकांक्षी योजनाएं लूट का साधन बनती नजर आने लगी हैं। ऐसे में आने वाले आम चुनाव में भाजपा को अनेक अप्रिय सवालों का सामना करना पड़ेगा। चूंकि भाजपा का संचालन अब स्पष्ट रूप से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ करने लगा है, कमजोर अर्थव्यवस्था के चलते किसानों और छोटे कारोबारियों पर पड़ने वाले प्रतिकूल असर को दूर करने को लेकर उसकी चिंता बढ़ गई है। अभी आम चुनाव में डेढ़ साल बाकी हैं, अगर सरकार प्रयास करे तो इस चिंता को काफी हद तक दूर किया जा सकता है। पर इसके लिए जिस रणनीति की जरूरत है, वह सरकार के पास नजर नहीं आती।

संघ प्रमुख भागवत ने नीति आयोग और नीति सलाहकारों को नए ढंग से सोचने पर इसलिए भी बल दिया है कि यह लगातार निष्क्रिय पड़ा रहा है। योजना आयोग को बदल कर नीति आयोग बनाने के पीछे विकास की रफ्तार बढ़ाने का जो खाका खींचा गया था, वह सपना अधूरा है। किसानों की दशा में कोई सुधार नहीं आया है। खेती-किसानी से जुड़ी अनेक समस्याएं हैं, जिनका स्थायी समाधान किसी सरकार के पास नजर नहीं आता। इसी तरह केंद्र सरकार का बड़े औद्योगिक घरानों की तरफ अधिक ध्यान होने की वजह से छोटे कारोबार उपेक्षित होते गए हैं, जबकि हकीकत यह है कि छोटे और मंझोले कारोबार सबसे अधिक रोजगार का सृजन करते हैं। इसके अलावा महंगाई पर काबू पाना अब भी सरकार के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है। ऐसे वातावरण में केंद्र सरकार भागवत के सुझावों पर कितना अमल और अगले आम चुनाव तक लोगों के असंतोष को कितना कम कर पाएगी, देखने की बात है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App