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राजपाट: नेता-हाथी एक समान

नीतीश कुमार के साथ एकबारगी बंटवारे की गुत्थी को सुलझा हुआ मान भी लें पर बाकी दोनों सहयोगियों उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की प्रतिक्रिया में कोई उत्साह अभी तक तो दिखा नहीं है। पासवान जहां खामोशी से हालात का मूल्यांकन कर रहे हैं, वहीं कुशवाहा पैंतरेबाजी से चूक नहीं रहे।

Author November 3, 2018 6:37 AM
रामविलास पासवान और नीतीश कुमार।

ऊपर से बेशक भाजपा यही जताने की भरसक कोशिश कर रही है कि बिहार में सहयोगी दलों के साथ लोकसभा सीटों के बंटवारे को लेकर कोई मतभेद नहीं है। लेकिन हकीकत एकदम उलट लगती है। नीतीश कुमार के साथ एकबारगी बंटवारे की गुत्थी को सुलझा हुआ मान भी लें पर बाकी दोनों सहयोगियों उपेंद्र कुशवाहा और रामविलास पासवान की प्रतिक्रिया में कोई उत्साह अभी तक तो दिखा नहीं है। पासवान जहां खामोशी से हालात का मूल्यांकन कर रहे हैं, वहीं कुशवाहा पैंतरेबाजी से चूक नहीं रहे।

कभी कहते हैं कि मोदी को दोबारा प्रधानमंत्री बनाना ही उनका लक्ष्य है तो कभी सीटों के बंटवारे के लिए तमाम सहयोगी दलों की साझा बैठक नहीं बुलाने पर भाजपा की परोक्ष आलोचना भी कर डालते हैं। कहें बेशक न पर केंद्र में राज्यमंत्री की अपनी हैसियत से भी संतुष्ट कहां होंगे कुशवाहा। होते तो गाहे-बगाहे बिहार में यादवों के दूध में कुशवाहा समाज के चावल को मिलाकर स्वादिष्ट खीर पकने की कल्पना क्यों करते? दिल्ली में भाजपा आलाकमान और नीतीश की बैठक के दिन लालू के बेटे तेजस्वी से गुफ्तगू क्यों करते? जबकि सियासत में हर बात के निहितार्थ होते हैं। न होते तो नीतीश और आलाकमान यह खुलासा नहीं कर देते कि इतनी-इतनी सीटों पर लड़ेंगे दोनों? बस इतना कहा कि बराबर होगी दोनों की सीटों की संख्या। जिन्हें अनुमान लगाना हो वे लगाते रहें।

चालीस हैं बिहार में कुल सीट। कोई सोलह-सोलह का आकलन कर रहा है तो कोई सत्रह-सत्रह की अटकलों में उलझा है। तो क्या पिछली दफा सात सीटें पाने वाले पासवान इस बार चार सीटों पर ही सहमत हो जाएंगे? इसी तरह चार सीटें लेने वाले कुशवाहा को महज दो सीटों पर संतोष करना पड़ेगा। पासवान फैसले के लिए सटीक घड़ी का इंतजार करते हैं तो कुशवाहा लगे हाथ जताने में यकीन रखते हैं कि वे कमजोर नहीं हैं। बिहार में सियासत जातीय खांचों से मुक्त नहीं है। कुशवाहा का गणित भी इसी सोशल इंजीनियरिंग पर टिका है। वे खुलेआम दावा करते हैं कि वे कुशवाहा समाज के इस समय बिहार के सबसे बड़े नेता हैं और नीतीश की जात यानी कुर्मी समाज की तादाद कुशवाहा समाज की तुलना में काफी कम है। साफ है कि सियासत में हाथी की तरह नेताओं के दांत भी खाने के अलग होते हैं और दिखाने के अलग।

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