jansatta column Rajpat about Bihar's CM Nitish Kumar and BJP - राजपाट: बौनेपन का डर - Jansatta
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राजपाट: बौनेपन का डर

नीतीश कुमार कमजोर पड़ रहे हैं। राजद को छोड़ पिछले साल भाजपा से नाता जोड़ा था। तब बड़ी उम्मीद लगाई थी कि प्रधानमंत्री बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे देंगे। अब यह उम्मीद खत्म सी हो चुकी है। प्रधानमंत्री ने तो कुछ नहीं बोला पर उनके कई मंत्री इसका संकेत दे ही चुके हैं।

Author June 2, 2018 4:31 AM
बिहार के मुख्‍यमंत्री नीतीश कुमार। (PTI File Pic)

नीतीश कुमार कमजोर पड़ रहे हैं। राजद को छोड़ पिछले साल भाजपा से नाता जोड़ा था। तब बड़ी उम्मीद लगाई थी कि प्रधानमंत्री बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दे देंगे। अब यह उम्मीद खत्म सी हो चुकी है। प्रधानमंत्री ने तो कुछ नहीं बोला पर उनके कई मंत्री इसका संकेत दे ही चुके हैं। खुद नितिन गडकरी ने भी साफ बोल दिया कि यह मांग पूरी करना संभव नहीं है। इसी से नीतीश उखड़े हैं। नोटबंदी का सबसे पहले समर्थन करने वाले नीतीश ने अब इस फैसले के औचित्य पर ही सवाल उठा दिया है। उन्हें नहीं लग रहा कि इस फैसले से देश का कोई फायदा हुआ। इस बीच गुरुवार को सूबे की जोकिहाट विधानसभा सीट के उपचुनाव के नतीजे ने भी उन्हें झटका दे दिया। राजद के उम्मीदवार से बुरी तरह हार गया यहां जद (एकी) का उम्मीदवार। तभी तो तेजस्वी यादव को हमला बोलने का मौका मिल गया कि नीतीश भी राजद के वोटों से ही जीते थे। उधर सूबे में जनाधार पर सवाल उठ रहे हैं तो दिल्ली में पुराने साथी शरद यादव भी उन्हें उखाड़ने में कसर नहीं छोड़ रहे। अपनी अलग पार्टी भी बना ली है। नीतीश के कहने पर शरद ने अपना अध्यक्ष पद पहले तो जार्ज फर्नांडीज को सौंपा था फिर दो साल पहले नीतीश को ही सौंप दिया। अब वे भी जद (एकी) के नेताओं में सेंध लगा रहे हैं। राजद के साथ है उनकी नई पार्टी। लगता है कि नीतीश भंवर में फंस गए है। लालू और शरद को छोड़ा था सियासी फायदे के लिए पर डर रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विराट व्यक्तित्व के आगे कहीं और बौने न बन जाएं।

कैसे गलेगी दाल

पश्चिम बंगाल के पर्वतीय क्षेत्र के प्रति अचानक उमड़ पड़ा है दीदी का मोह। दीदी यानी सूबे की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस इलाके के नए जिले कलिम्पोंग के लिए खजाने का मुंह खोल दिया है। इस हफ्ते कोलकाता की उमस भरी तपिश से राहत पाने ममता ने कलिम्पोंग की सर्द वादियों में अपना डेरा डाल दिया। सियासत से कन्नी काट पूरे पांच दिन आराम से बिताए। इससे पहले भी गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के दबदबे को खत्म करने के लिए ममता ने लेप्चा और भूटिया जैसी कई जनजातियों के लिए अलग-अलग विकास बोर्ड बनाए थे। फिर बीते साल कलिम्पोंग को जिला बना दिया। जबकि पहले यह इलाका दार्जिलिंग जिले का एक सब-डिवीजन था। कलिम्पोंग को जिला बनाने का जनमुक्ति मोर्चे की तरफ से विरोध भी हुआ था। बिमल गुरुंग ने तपाक से प्रतिक्रिया जता दी थी कि ममता फूट डालो और राज करो की सियासत कर रही हैं। यह बात अलग है कि पिछले एक साल से बेचारे गुरुंग भूमिगत चल रहे हैं। उनकी जगह ममता ने अपने चहेते विनय तामंग को जीटीए की कमान सौंप रखी है। इस बार पांच दिन के अपने प्रवास में दर्जनों विकास योजनाओं का एलान कर दिया कलिम्पोंग में। विश्वविद्यालय की स्थापना की पुरानी मांग को भी दिखा दी हरी झंडी। इस इलाके में लोकसभा की एक और विधानसभा की तीन सीटें हैं। जनमुक्ति मोर्चे के समर्थन से 2009 में भाजपा के जसवंत सिंह और 2014 में भाजपा के ही एसएस अहलुवालिया चुने गए थे सांसद। लगता है कि इस बार ममता यहां भी नहीं गलने देंगी भाजपा की दाल।

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