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राजपाट: साइबर जंग

सोशल मीडिया का चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करने में दोनों ही पक्ष अभी से एक दूसरे को पछाड़ने पर आमादा हैं। पिछले चुनाव में सूबे की 42 लोकसभा सीटों में से 34 अकेले ममता बनर्जी ने जीती थीं। मोदी की आंधी के बावजूद भाजपा को दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।

Author September 8, 2018 6:09 AM
तस्वीर का इस्तेमाल प्रतीक के तौर पर किया गया है।

लगता है कि पश्चिम बंगाल में लोकसभा चुनाव में साइबर जंग होगी। सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस और विपक्षी भाजपा दोनों की तैयारियों से तो यही संकेत मिल रहे हैं। सोशल मीडिया का चुनावी लाभ के लिए इस्तेमाल करने में दोनों ही पक्ष अभी से एक दूसरे को पछाड़ने पर आमादा हैं। पिछले चुनाव में सूबे की 42 लोकसभा सीटों में से 34 अकेले ममता बनर्जी ने जीती थीं। मोदी की आंधी के बावजूद भाजपा को दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा था। इस बार भाजपा अध्यक्ष ने 22 सीटें जीतने का लक्ष्य दिया है अपने कार्यकर्ताओं को। सो, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ेंगे दोनों खेमे। तृणमूल कांग्रेस ने तो अपनी आइटी सेल की कमान ममता के सांसद भतीजे अभिषेक बनर्जी को सौंपी है। अभिषेक अकेले नहीं हैं। राज्यसभा सांसद और प्रवक्ता डेरेक ओ ब्रायन भी सोशल नेटवर्किंग साइटों पर पूरा साथ दे रहे हैं उनका।

यहां तक कि दस सितंबर को पार्टी ने कोलकाता में बाकायदा डिजिटल सम्मेलन आयोजित कर दिया है। भावी रणनीति पर मंथन और फैसला तो होगा ही। सरकार की उपलब्धियों का सोशल मीडिया के जरिए प्रचार-प्रसार भी होगा। उधर भाजपा भी फरमा चुके हैं कि युवा कार्यकर्ता सोशल मीडिया पर अपनी मौजूदगी बढ़ाएं। सरकार और सत्तारूढ़ पार्टी के खिलाफ सोशल मीडिया को प्रमुख हथियार की तरह इस्तेमाल करें। हर मतदान केंद्र के लिए अलग फेसबुक पेज और व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाने की तैयारी है। अपने माकूल मुद्दों को उठा कर जनमत तैयार होगा सोशल मीडिया की मदद से। भाजपा तो अपने आधुनिक सुविधाओं से लैस आइटी सेल के लिए एक बड़े दफ्तर की टोह में भी बताई जा रही है।

दोहरा पैमाना

हाल बेहाल है उत्तराखंड में नौकरशाही का। आइएएस और आइपीएस दोनों ही सेवाओं के अफसरों की अपनी-अपनी लाबी ठहरी जो खुल कर एक-दूसरे का विरोध कर रही है। उधम सिंह नगर जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग-74 के घोटाले की जांच कर रहे पुलिस अफसरों के रवैए से यह झगड़ा सार्वजनिक बन गया। एसआइटी ने दो आइएएस अफसरों पंकज पांडेय और चंद्रेश यादव को नोटिस थमा दिए। दो और आइएएस को जल्दी नोटिस थमाने की तैयारी है। इस कार्रवाई ने आइएएस लाबी में हड़कंप मचा दिया है। हरीश रावत की सरकार के वक्त उधम सिंह नगर के कलक्टर थे पांडेय और यादव। तभी हुआ था यह घोटाला। घोटाला दरअसल जमीन अधिग्रहण और उसके मुआवजे से जुड़ा है। पांडेय के सरपरस्त एक आला आइएएस अफसर इन दिनों मुख्यमंत्री सचिवालय में तैनात है। बिहार से नाता है इस आला अफसर का।

इसी गुट के कुछ आइएएस अफसरों ने पिछले दिनों अपर मुख्य सचिव ओम प्रकाश से मिलकर आइपीएस लाबी के दबाव की शिकायत की थी। मुश्किल यह है कि सूबे के पुलिस महानिदेशक अनिल रतूड़ी और एसआइटी के मुखिया सदानंद दाते दोनों ही अपने अलग मिजाज के आइपीएस ठहरे। सियासी दबाव आसानी से नहीं मानते। आइएएस अफसरों को भी क्षेत्रवाद के हिसाब से लाबी बन गई हैं। मसलन, एक बिहारी लाबी है तो दूसरी मैदानी। पहाड़ी लाबी तो होती ही। मुश्किल में फंस गए हैं मुख्यमंत्री। काम तो अफसरों से ही लेना पड़ता है। पर कई लाबियों से संतुलन कैसे बिठाएं। राजमार्ग घोटाले में फंसे पीसीएस अफसरों पर चाबुक चलाने में तो मुख्यमंत्री ने देर नहीं लगाई थी पर आइएएस अफसरों के मामले में उनकी तत्परता गायब है। जिसे उंगली उठानी हो उठाए। जाहिर है कि सबसे ज्यादा मलाल तो आइपीएस और पीसीएस लाबी को ही होगा मुख्यमंत्री के इस दोहरे मापदंड से।

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