jansatta column Rajapat artical Jalwa Vasundhara's, The name suggested by Vasundhara for the Subedar does not approve the high command - Jansatta
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राजपाट : जलवा वसुंधरा का

कई दौर की बातचीत से भी पेच सुलझ नहीं पाया। उधर जयपुर में वसुंधरा खेमा पार्टी की बैठकों में परनामी को ही अध्यक्ष दिखा रहा है। जिससे पार्टी के संघी खेमे की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है।

Author June 9, 2018 4:17 AM
राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे। (Express Photo/Rohit Jain Paras)

पिछले दो महीने से राजस्थान में भाजपा का संगठन नेतृत्वहीन है। अशोक परनामी को आलाकमान ने अजमेर और अलवर लोकसभा चुनाव की हार के साथ ही सूबेदारी से वंचित कर दिया था। उनकी जगह केंद्रीय मंत्री गजेंद्र शेखावत को नया सूबेदार बनाने का फैसला भी कर लिया था आलाकमान ने। लेकिन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे को जैसे ही भनक लगी, वे विरोध पर उतारूं हो गर्इं। कई दौर की बातचीत से भी पेच सुलझ नहीं पाया। उधर जयपुर में वसुंधरा खेमा पार्टी की बैठकों में परनामी को ही अध्यक्ष दिखा रहा है। जिससे पार्टी के संघी खेमे की बेचैनी बढ़ना स्वाभाविक है। मुश्किल यह है कि परनामी की जगह वसुंधरा ने सूबेदार के लिए जो नाम सुझाए हैं, वे आलाकमान को मंजूर नहीं। आलाकमान में सूबे की नुमाइंदगी करने वाले ओम माथुर और भूपेंद्र यादव भी इस पचड़े में नहीं फंसना चाहते। दोनों ने ही साफ कर दिया है कि वे राजस्थान में दखल नहीं देना चाहते। उधर संघी खेमे ने नए सूबेदार के लिए प्रचारक सुनील बंसल का नाम पेश कर दिया है। जो पहले राजस्थान में ही पार्टी का काम देख रहे थे पर पिछले चार साल से उत्तर प्रदेश में हैं। मुख्यमंत्री योगी के बाद सबसे ताकतवर भूमिका बतौर संगठन महामंत्री आजकल उन्हीं की बताई जा रही है। बंसल को संघ के प्रचारक का चोला उतारना पड़ेगा।

हार का ठीकरा
ममता बनर्जी चुनावी नतीजों का विश्लेषण करने में कतई कोताही नहीं बरततीं। पिछले दिनों हुए पंचायत चुनाव में बेशक उन्हें भारी सफलता मिल गई पर उनकी बेचैनी जंगल महल इलाके के नतीजों ने कुछ ज्यादा ही बढ़ा दी है। कभी माओवादियों का गढ़ था यह इलाका। तृणमूल कांग्रेस को यहां खासा जनसमर्थन मिला। लेकिन पंचायत चुनाव में सब कुछ उलटा-पुलटा होने से ममता को कदम उठाने ही थे। भाजपा के बढ़ते प्रभाव को वे भला कैसे आसानी से पचा लेतीं। लिहाजा इन इलाकों की नुमाइंदगी कर रहे अपनी सरकार के तीन मंत्रियों की छुट्टी करने में देर नहीं लगाई। पार्टी के खराब प्रदर्शन का ठीकरा किसी के सिर तो फूटना ही था। और भी कई मंत्रियों के पर उनके विभाग बदल कर कतर दिए। जंगल महल का मतलब है-पुरुलिया, बांकुड़ा और पश्चिम मेदिनीपुर जिलों की आदिवासी आबादी। अब आदिवासी विकास मंत्रालय को ममता खुद संभालेंगी। चूड़ामणि महतो, जेम्स कुजूर और अवनी जोआरदार के इस्तीफे लिए तो सफाई यही दी कि ये लोग अब संगठन को मजबूत करेंगे। ममता को अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव की भी पूरी चिंता है। अब वे अगले एक साल तक केंद्र की राजनीति कर भाजपा को सत्ता से बेदखल करने में चाणक्य की भूमिका अदा करना चाहतीं हैं। तभी तो सूबे में सियासत और शासन दोनों ही स्तर पर सहयोगियों को ज्यादा जिम्मेदारी सौंप दी है।

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